मई, 2009
वे चार दोस्त थे। गले में टाई, हाथ में बैग। किसी मेडिकल या सेल्स रिप्रेसेन्टेटिव जैसी हुलिया वाले ये नौजवान एक चाय के ठेले पर \'लंच\' करने जुटे थे। ऊपर से पुराने पर हरियाये नीम का स्नेह बरस रहा था, सो गरमी से राहत थी। पसीना सूखते-सूखते उनका खिलंदड़ापन वापस आ गया था और वे हंसी-मजाक मे जुट गए थे। पास ही बेंच पर एक अखबार पड़ा था जिसके पहले पन्ने पर खबर छपी थी कि तालिबान ने सिखों पर जजिया लगाया। एक ने ये खबर जोर से पढ़ी और फिर दूसरे की ओर मुखातिब होकर बोला- साले, यहां तुम लोगों पर भी जजिया लगा दिया जाए, तो पता चलेगा। साफ था कि कहने वाला हिंदू और सुनने वाला मुसलमान था। जवाब में एक खिसियाई हंसी के साथ मुस्लिम दोस्त ने भी जवाब दिया--अबे तालिबान का उखाड़ो जाकर, मुझसे क्यों भिड़ते हो। खैर, बात ज्यादा नहीं बढ़ी। न कहने वाला....
एक विवाह समारोह में शामिल होने काशी गया था। रास्ते में इलाहाबाद पड़ा। वहां शास्त्री ब्रिज से गुजरते हुए गंगा का हाल देख दिल धक से रह गया। मुख्य शहर के किनारे को छोड़, किलोमीटर भर फैली रेत के बाद झूंसी के करीब गंदले पानी की किसी छोटी नहर जैसी लग रही थी। संगम से महज कुछ फर्लांग पहले गंगा का ये हाल था। इसी शहर में मेरा दूसरा जन्म हुआ था। संगम में सरस्वती के लोप की भरपाई जिस विश्वविद्यालय ने की थी, उसी गुरुकुल में दुनिया को देखने की नई दृष्टि मिली थी। गंगा के किनारे रसूलाबाद घाट पर बरसों बिताए थे। महादेवी के साहित्कार संसद वाले टीले के नीचे, चंद्रशेखर आजाद की समाधिस्थल के पास रात को एक-दो बजे मित्रों के साथ भूतों को चिल्ला-चिल्लाकर बुलाने का खेल खेला था। पास ही चिताएं सुलगा करतीं थीं, पर कभी डर नहीं लगा, जैसे बच्चे मां के करीब होने....









