जून, 2009
जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है... शैलेंद्र प्यारे.... मुझे यकीन है कि मुमकिन होता तो अपनी जलती चिता के साथ हो रही कार्यवाहियों को देखकर तुम गालिब का यही शेर दोहराते और ठठाकर हंस पड़ते। निगम बोध घाट पर तुम्हारी चिता को दूर से तकते हुए मेरे कान में तुम्हारी वो मलंग हंसी लगातार बज रही थी जो 17 जून की आधी रात तुम्हारे और मेरे बीच बात-बात में खिल उठती थी। जीवन से भरी कव्वालियां सुनते-गाते हुए हमें ये अहसास होता भी कैसे कि मौत उसी कार की पिछली सीट पर पंजे खोलने को बेताब बैठी है जहां तुम्हारी गीता, रामायण और शिवपुराण रखे हुए थे । तब शायद दो दोस्तों की मुलाकात की गर्मी के बीच दाखिल होने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी। उसने तुम्हारे अकेले होने का इंतजार किया औऱ माकूल बहाना मिलते ही....
पं.नेहरू के बाद पहली बार कोई प्रधानमंत्री पांच साल पूरा करने के बाद दोबारा गद्दी पर बैठा है। जाहिर है, कांग्रेस को जश्न मनाने का पूरा हक है। लेकिन सफलता की तुलना में जश्न का गुब्बारा कई गुना बड़ा है। बाजार जिस तरह इस गुब्बारे में हवा भरने में जुटा है, उससे इसके फूटने का खतरा साफ नजर आ रहा है। ऐसा लग रहा है कि जब सेंसेक्स डूबा था तो मनमोहन सिंह नहीं, कोई और प्रधानमंत्री था। गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, मंदी, आतंकवाद, किसानों की आत्महत्या आदि ऐसे मुद्दे थे, जिन पर किसी भी सरकार की बलि चढ़ सकती थी । लेकिन मनमोहन की गद्दी बरकरार रही तो इसलिए कि जो विकल्प देने वाले नायक होने का दावा कर रहे थे, वे जनता की नजर में महज विदूषक थे। ये विकल्पहीनता लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। दरअसल, गैरकांग्रेसवाद के सारे पुरोधा उन्हीं बीमारियों के शिकार हो गए जिनके....









