अगस्त, 2008
संसद में लहराती नोटों की गड्डियों ने उन लोगों का दिल जरूर तोड़ दिया होगा जिन्हें संसदीय लोकतंत्र में पूरी आस्था है। सोमनाथ चटर्जी ने इसके पहले ही संसद को न्यूनतम स्तर पर जाने की बात कही थी, लेकिन ये तो सतह से भी नीचे गिरने का दृश्य था। लेकिन उस दिन एक घटना और घटी जिसने बताया कि मसला सिर्फ लोकतंत्र और नैतिकता का नहीं, बल्कि देश के बने रहने का है। भारत जिन संकल्पनाओं पर एक आधुनिक लोकतंत्र होने चला था, उसका खुलेआम मजाक उड़ाया गया। हालांकि इस घटना पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। ये घटना थी रेलमंत्री लालू प्रसाद का भाषण जिसके जरिये शासक वर्ग ने अपनी खतरनाक मंशा सामने रख दी। अंदाज जरूर मजाकिया था लेकिन इरादा समझ में आ जाए तो रूह कांप जाए। जी हां, विकासपुरुष बनने को बेकरार लालू ने उस दिन अपने भाषण में दो नाम लिए जो विकास....









