सितंबर, 2008
प्यारे भगत सिंह, आज तुम्हारा एक सौ एकवां जन्मदिन है। 28 सितंबर 2008, दिन रविवार। ये बात मुझे तब पता चली जब मैं अपनी कुछ पुरानी किताबे कबाड़ी वाले को बेचने जा रहा था। हमने तय किया था कि इस वीकएंड पर पिज्जा खाने के लिए पैसे का इंतजाम पुरानी किताबें बेचकर किया जाए। दरअसल महीने का आखिरी है और मेरे क्रेडिट कार्ड की लिमिट पहले ही पार हो चुकी है। ऐसे में फिजूलखर्ची करना समझदारी नहीं। तमाम किताबें और आल्मारी तो पहले ही बेच चुका था.. पर पत्नी ने कुछ किताबें फिर भी रख ली थीं। खासतौर पर ,जिन्हें खरीदने के बाद मैंने दस्तखत करके तारीख डाली थी, और उसे उपहार में दिया था। ये शादी के पहले की बात है। लेकिन अब दिल्ली के छोटे से फ्लैट में रहते हुए उसे भी समझ में आ गया है कि किताबें जगह काफी घेरती हैं। बच्चों को सन्डे-सन्डे....
"भाषा में भदेस हूं, इतना कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं...". धूमिल की दशकों पहले लिखी गईं इन पंक्तियों की कई तरह से व्याख्या होती है, पर रुपहले पर्दे के महानायक अमिताभ बच्चन के माफीनामे ने जैसे इसे और मौजूं बना दिया है। जया बच्चन ने एक समारोह में यही कहा था कि वे हिंदी में बोलेंगी.. और राज ठाकरे की सेना टूट पड़ी। नारे लगे, पोस्टर फटे, पुतले फुंके, और फिर सामने आए महानायक, ऐसी विनम्र मुद्रा में कि पूरा देश फिदा हो गया। राज ठाकरे का भी दिल पिघल गया और उन्होने अभयदान दे दिया। अमिताभ ने फिर साबितत की अहिंसा की ताकत। भृगु ऋषि से लात खाने के बाद भगवान विष्णु के कहे वचन याद आ गए-आपको चोट तो नहीं लगी मुनिवर! पर ये विनम्रता थी या मजबूरी। एंग्री यंगमैन बतौर महानायकत्व का दर्जा हासिल करने वाले अमिताभ की पहचान यही थी न कि वे अन्याय....









