सितंबर, 2009
सलमान खान को 'दस का दम' में जब पहली बार 'कितने प्रतिशत भारतीय' कहते देखा, तो जरा चौंका था। आजकल जिस तरह तत्सम् शब्दों के प्रति हिकारत का भाव है, उसे देखते हुए 'फीसदी' और 'हिंदुस्तानी' कहना कहीं बेहतर होता। लेकिन फिर विचार करने पर लगा कि कार्यक्रम निर्देशक का ये सुचिंतित फैसला होगा। वो चाहता है कि 'दस का दम' गैर हिंदी क्षेत्र में भी सराहा जाए। और इसमें क्या शक कि तत्सम् शब्दों की पहुंच तद्भव की तुलना में ज्यादा है, क्योंकि तमिल जैसे अपवाद को छोड़ दें तो ज्यादातर क्षेत्रीय भाषाएं संस्कृत से उपजी हैं। तमाम दूसरे लोगों की तरह मैं भी उर्दू-हिंदी के मेल से बनी हिंदुस्तानी का शैदाई हूं। ये जुबान कानों में मिठास घोलती है। लेकिन अगर ये 'कान' मेरा न होकर लखनऊ, अलीगढ़, इलाहाबाद के घेरे से बाहर रहने वाले किसी शख्स का हो तब? क्या उसमें भी ऐसी ही मिठास घुलेगी?..जाहिर....
इतिहासविद् ई.एच.कार ने इतिहास की परिभाषा दी है- इतिहास भूत और वर्तमान के बीच अविरल संवाद है। अरसा पहले इलाहाबाद विश्विवद्यालय के मध्य एवं इतिहास विभाग के उस नीमअंधेरे लेक्चर थिएटर में युवा शिक्षक श्री हेरंब चतुर्वेदी ने इस परिभाषा को बताते हुए पहला पाठ पढ़ाया था। बी.ए.का पहला दिन था। इंटर के बाद विज्ञान छोड़ आर्ट्स पढ़ने आए मेरे जैसे तमाम विद्यार्थी ये देख कर परेशान थे कि यहां इतिहास को विज्ञान बताया जा रहा था। हम तो विज्ञान से पिंड छुड़ाकर आए थे और यहां भी! धत् तेरे की। बहरहाल इलाहाबाद स्कूल आफ हिस्ट्री में कूट-कूट कर भरा गया कि इतिहास वही है जो दस्तावेजों या अन्य सुबूतों से प्रमाणित किया जा सके। बाकी गल्प। हुआ भी यही। जल्दी ही मन की दुनिया में नायकों की तरह इतराती तमाम हस्तियों के दामन दागदार नजर आने लगे और घोषित खलनायकों के अच्छे कामों की फेहरिश्त भी सामने....









