दिसंबर, 2008
मैं हूं सदी 21 का गुजरता हुआ आठवां बरस
मैं गवाह हूं हिंदोस्तां की किस्मत का
रंग गिरगिट का दिखाती हुई सियासत का
उजले परदों के तले स्याह सब इरादों का
मैंने देखा है दहशत का खौफनाक मंजर
पानी की तरह बहता खून सड़कों पर
जिस्म को चिथड़ा बनाते, बारूदी दिमाग
दिल को चीरती चीखें और भड़कती आग
और जो जान दे बचा गए कई जानें
उनकी जांबाजी और हौसले के अफसाने
मैंने देखा है हिमालय को जार-जार रोते
उसके आंसू से लबालब हुईं नदियों का कहर
और शमशान में बदली हुई गौतम की जमीं
जश्न दिल्ली में मना देख के पटना की गमी
पी गए सब,उठी इमदाद की फिर जो भी लहर
लाल बत्ती में नजर आए सब घड़ियाल, मगर
मैंने देखे हैं पसीने में तर ब तर बच्चे
गमे रोजी पे न्योछावर जवानी की कसक
तेज रफ्तारी का दम निकालती हुई मंदी
सांय-सांय करती,लेबर....
क्या मीडिया उस तरह से राष्ट्रवादी हो सकता है, या उसे होना चाहिए, जैसा चालू अर्थों में किसी राष्ट्रवादी से उम्मीद की जाती है। या फिर मीडियाकर्मी के लिए पेशे के प्रति प्रतिबद्धता राष्ट्रवाद से बड़ा मूल्य है। इधर भारत के बाहर दो ऐसी घटनाएं घटी हैं जिनकी वजह से ऐसे सवाल भारत के मीडियाकर्मियों को मथ रहे हैं। पहली घटना पड़ोसी पाकिस्तान में घटी। जिओ टी.वी. ने स्टिंग आपरेशन के जरिये खुलासा किया कि मुंबई हमलों का गुनहगार अजमल कसाब दरअसल पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में दीपालपुर कस्बे के पास फरीदकोट गांव का रहने वाला है। दूसरी घटना इराक की है, जहां एक टी.वी.पत्रकार ने दुनिया के सबसे ताकतवर समझे जाने वाले आदमी, अमेरिकी राष्ट्रपति पर जूते फेंके। पाकिस्तान में कथित राष्ट्रीय हित पर वहीं के चैनल ने चोट पहुंचाई तो इराक में राष्ट्रवाद का जुनून पेशे की मर्यादा पर भारी पड़ा। जाहिर है, दोनों के सही- गलत....
हे अखिल ब्रह्मांड के स्वामी, हे परमपिता परमेश्वर, हे करुणा के सागर, हे दयानिधान परमात्मा, कहां हो...कहां हो भगवान! जल में, नभ में, धरा पर, पाताल में, किस लोक में, किस जगह लगाए बैठे हो समाधि? सो रहे हो किस शैया पर...तोड़ो निद्रा, बाहर निकलो, देखो! देखो खून की नदी, देखो मांस के लोथड़ों में तब्दील हो गए बच्चे, बूढ़े, जवान, किशोरियां, युवतियां, स्त्रियां, देखो कैसा होता है भुना हुआ इंसानी गोश्त! देखो इसका रंग, महसूस करो गंध, आओ...आते क्यों नहीं...?. इतने कठोर कैसे हो गए तुम। आतंकियों के निशाना बने हर शख्स ने सिर्फ तुम्हें पुकारा, मरने के पहले सिर्फ तुम्हारा नाम उनके ओंठ पर था। पर तुम नहीं आए। क्या गुनाह था उनका ?..यही न कि वे एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां इंसानी जिंदगी की कोई कीमत नहीं। यही न, कि वे ऐसे नेताओं का जयकारा लगाने को अभिशप्त हैं जो इंसान कहलाने के लायक....









