एक आधुनिक और सभ्य समाज में विचारों की आजादी से बड़ा दूसरा कोई मूल्य नहीं। ये लोकतंत्र की बुनियाद है। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्यूज चैनलों से इस आजादी को छीन लेने की कोशिश हुई तो लोगों को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। केबल नेटवर्क रेग्युलेशन एक्ट में संशोधन की कोशिश ने चैनलों को चाहे जितना परेशान किया हो, भारतीय समाज में कोई आलोड़न नहीं हुआ। किसी को नहीं लगा कि इमरजेंसी लगने वाली है या फिर वैसा खतरा सामने है जैसा बिहार प्रेस बिल के आने पर दो दशक पहले महसूस किया गया था।
वैसे मीडिया की नकेल कसने की चाहत तो कम-ज्यादा सभी रंग की सरकारों में होती है। और न्यूज चैनलों ने तो नाक में दम ही कर रखा है। उनकी वजह से ही लोगों ने देश की एक बड़ी पार्टी के मुखिया को रिश्वत लेते देखा, घूस लेकर सांसदों को सवाल पूछते देखा, हथियार खरीदने की ख्वाहिश पर मचा तहलका देखा...कानून को अंगूठा दिखाने वाले बददिमाग रईसजादों को जेल जाते देखा ..पैसे लेकर फतवा देने वाले मजहबी दुकानदारों की पोल खुलते देखा...वगैरह...वगैरह....जाहिर है उसके अच्छे कामों की लंबी फेहरिस्त है। सत्तातंत्र के खुला खेल फर्ऱुखाबादी को बेपर्दा करने की उसकी ताकत बार-बार जगजाहिर हुई है। इसीलिए मुंबई हमले के बहाने इस 'दुश्मन' को निशस्त्र करने की कोशिश की गई। स्वाभाविक था कि न्यूज चैनल इसका जमकर विरोध करते। और फिर प्रधानमंत्री ने मुस्कराते हुए आश्वास्त किया कि सरकार मीडिया की आजादी को कहीं से कम नहीं करना चाहती। गोया उन्हें अपने सूचना प्रसारण मंत्री की उन कोशिशों की जानकारी नहीं थी, जिन्होंने मीडिया को मरणासन्न कर देने वाले दिशा निर्देश तैयार कराए थे। खैर, अंत भला तो सब भला।
लेकिन इस पूरी लड़ाई में न्यूज चैनल जिस तरह अकेले नजर आए, वो चौंकाने वाला है। विपक्ष के नेताओं ने कैमरे के सामने जरूर चिंता जाहिर की लेकिन न बुद्धिजीवियों, न ही देश भर में फैले मानवाधिकार या सामाजिक संगठनों को लगा कि लोकतंत्र खतरे में है। कहीं लोगों को ये तो नहीं लगता कि न्यूज चैनलों के आजाद या गुलाम होने से लोकतंत्र पर कोई फर्क पड़ने वाला है। ये वो बिंदु है जिस पर न्यूज चैनलों को आत्मनिरीक्षण की जरूरत है क्योंकि खतरा सिर्फ टला है, खत्म नहीं हुआ है।
दरअसल, मीडिया की आजादी का भारत के संविधान में कहीं अलग से उल्लेख नहीं है। ये देश के सभी नागरिकों को मिली बोलने की आजादी का ही विस्तार है। मीडिया को महान और पवित्र गाय मानने के पीछे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित हुए मूल्य हैं। मीडिया की आजादी को इस अपेक्षा के साथ महत्वपूर्ण समझा गया कि वो पूंजी और सत्ता के दबाव को दरकिनार करके सत्य के संधान का जरिया बनेगा। भारत को वास्तविक अर्थों में लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी गणतंत्र बनाने के मिशन से भटकने वालों का पर्दाफाश करेगा। और इस कसौटी पर न्यूज चैनलों को कसते ही लोगों की बेजारी की वजह साफ हो जाती है।
भारत में न्यूज चैनलों के विकास के साथ-साथ ये बात बहुत जोर देकर कही जाने लगी कि पत्रकारिता मिशन नहीं प्रोफेशन है। यहां प्रोफेशनल होने का अर्थ दक्षता तक सीमित होता, तो कोई बात नहीं थी, लेकिन इसका मतलब ये निकला कि ये भी साबुन या तेल बनाने जैसा कोई धंधा है जिसमें मुनाफा कमाना बुनियादी बात है। ऐसे में, न्यूज चैनल घाटे का सौदा क्यों करते। उन्होंने खुद को कुछ महानगरों तक सीमित कर लिया जहां विज्ञापनदाताओं को प्रतिसाद देने वाला अच्छा-खासा उपभोक्ता वर्ग मौजूद था। नतीजा ये हुआ कि टी.वी.का पर्दा चकमक रोमांचलोक में तब्दील हो गया जहां सत्य के संधान से ज्यादा जनप्रिय होना महत्वपूर्ण हो गया। 'क्या' 'क्यों', 'कहां', 'कैसे', 'कब' और 'किसने' के जवाब से लोगों को लैस करने की बुनियादी जिम्मेदारी भुला दी गई। भारत में अपेक्षाकृत इस नए माध्यम को खबरों के लिहाज से साधने की जरूरत थी लेकिन चैनल मनोरंजन के मेले में तमाशगीर बनकर बैठ गए। लोगों ने भी इसका भरपूर मजा लिया। फिल्मों में टी.वी.रिपोर्टर मजाक की चीज बनकर प्रकट होने लगे, और टी.वी.पर छाई राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल एंड कंपनी ने जैसा और जितना चाहा, उनका चुटकुला बनाया।
लोकतंत्र में बहुमत का महत्व है, लेकिन ये बहुमत न्यूज चैनलों के लिए कोई मतलब नहीं रखता। दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियां और अल्पसंख्यक समुदाय मिलकर बहुमत का निर्माण करता है। पर इस बहुमत को मथने वाले सवाल न्यूज चैनलों में तभी जगह पाते हैं जब मामला हिंसक हो उठे। न्यायपालिका और विधायिका ने जिस आरक्षण को सामाजिक परिवर्तन का वाहक करार दिया है उसके प्रति चैनलों में हिकारत का भाव साफ नजर आता है। करोड़ों की तादाद में आदिवासियों को जंगल और जमीन से विस्थापित किया गया पर चैनलों की नजर उन पर शायद ही जाती हो। सत्ता उनके संघर्ष को महज नक्सलवादी हिंसा बताकर उलझा देती है और चैनल मुंह मोड़ लेते हैं। दलित-पिछड़ों का राजनीति में बढ़ा प्रभाव उनकी नजर में महज 'जातिवाद' है। इन मुद्दों पर गहरे उतरने के लिए उनके पास वक्त नहीं।
इसमें शक नहीं कि चैनलों ने आमतौर पर सांप्रदायिक सद्भाव के पक्ष में आवाज उठाई है, लेकिन ये भी सच है कि भड़काऊ बयान देने वालों को वे भरपूर स्पेस देते हैं। माहौल को उत्तेजक बनाए रखना इस धंधे का उसूल है। इसके अलावा न्यूज चैनलों ने जिस तरह सुबह-शाम ज्योतिषियों, बाबाओं और हिंदू व्रत-पर्व-त्योहारों को महत्व देना शुरू किया, उससे अल्पसंख्यकों के बीच उन्हें लेकर पराएपन का अहसास बढ़ा है।
इसके अलावा कभी वे नाग-नागिन, भूत-प्रेत के आगे दंडवत होते हैं तो कभी एलियन और साईंबाबा के चमत्कारों पर निहाल होते हैं। जबकि लोगों ने देखा है न्यूज चैनल के पुरोधा एस.पी.सिंह को, जिन्होंने गणेश मूर्तियों के दूध पीने के उन्मादी प्रचार के बीच मोची की निहाई पर दूध को जज्ब होते दिखाया था। जब लोगों को वैज्ञानिक कारण का पता चला तो उन्माद झाग की तरह बैठ गया। लोगों को न्यूज चैनल की ताकत का पता चला और एस.पी. को भरपूर सराहना मिली जो जानते थे कि टेलीविजन महान वैज्ञानिक प्रयास का नतीजा है। इसका इस्तेमाल अंधविश्वास मिटाने के लिए होना चाहिए।
जिस संविधान की दुहाई देकर न्यूज चैनल मीडिया की आजादी की दुहाई देते हैं, वो समाजवादी भी है। हालांकि ये शब्द 1976 के संशोधन में जोड़ा गया लेकिन संविधान निर्माताओं में इस बात को लेकर कोई मतभेद नहीं था कि आजाद भारत में गैरबराबरी खत्म करना बड़ा लक्ष्य होगा। पर 60 साल बाद अरबपतियों की लिस्ट में भारतीय नामों में इजाफा हुआ है तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही, अस्सी करोड़ लोग 20 रुपये रोज पर गुजारा करते हैं। जाहिर है गैरबराबरी बढ़ाने वाली नीतियों को कठघरे में खड़ा करना न्यूज चैनलों की बड़ी जिम्मेदारी थी लेकिन उन्होंने पूरी तरह आंख मूंद ली। यही नहीं वे शेयर बाजार के लालचतंत्र के प्रचारक भी बन बैठे। अगर वे सजग रहते तो शायद पूंजीतंत्र को लूटतंत्र बनने से रोका जा सकता था। लेकिन उन्होंने 'संदेह' के पुरातन हथियार को त्याग दिया और 'सत्यमों' की सफलता को ढिंढोरची की तरह पीटने लगे। नतीजा, वे बुरी तरह चूके और रामलिंगा राजू के गुनाह कबूलने के बाद ही जान पाए कि वे सत्यम नहीं, झूठम पर बलिहारी थे।
साफ है कि जिन वजहों से पत्रकार और पत्रकारिता को सम्मान की नजरों से देखा जाता था... मीडिया की आजादी को जरूरी माना जाता था, वे बुरी तरह छीजीं हैं। न्यूज चैनल भूल गए कि मनोरंजन महान कला हो सकती है पर ये उनका काम नहीं है। मीडिया की आजादी के नाम पर अंधविश्वास फैलाना कानून के प्रति और युद्धोन्माद फैलाना इंसानियत के प्रति गुनाह है। खासतौर पर जब मसला भारत-पाक जैसे दो परमाणु हथियारों से लैस देशों का हो।
हालांकि सभी चैनलों को एक ही तराजू पर तौलना ठीक नहीं। उनके तरीके और इरादे में फर्क जरूर है। पर ये फर्क परिदृश्य नहीं बदला पाता। कुछ संपादकों का कहना है कि टी.वी.अभी बच्चा है..धीरे-धीरे परिपक्व होगा। लेकिन वे भूल जाते हैं कि जब बच्चा बिग़ड़ता है तो मां-बाप पिटाई करते हैं, रिश्तेदार लानते भेजते हैं और पड़ोसी अपने बच्चों को दूर रहने की सलाह देते हैं। न्यूज चैनलों के साथ फिलहाल यही हो रहा है।
इसलिए इतना कहने से बात नहीं बनेगी कि चैनल आत्मनियंत्रण से काम लेंगे। जरूरी ये भी है कि जो वे नहीं कर रहे हैं, उसके बारे में भी गौर करें। उन्होंने देश के बहुमत को खारिज किया तो बहुमत उन्हें भी खारिज कर देगा। मीडिया की आजादी का सीधा संबंध, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत की मजबूती से है। एक के बिना दूसरे की गुजर नहीं।














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