अजब हंगामा बरपा है। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाने की बात क्या कही गई, तूफान मच गया। उन अंगरेजी अखबारों को तो छोड़िए, जिन्होंने 1857 के संग्राम को खुलेआम विरोध किया था या भारत की आजादी की खबर इस अंदाज में छापी थी जैसे कोई अनहोनी हो गई, हिंदी मीडिया का भी एक तबका छाती पीट रहा है। जैसे अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करना गैरकानूनी बात हो, या पहली बार कही जा रही हो। बाकी हिंदी समाज में भी इस हमले को लेकर एक खास तरह की उदासीनता है। दिमागी गुलामी का इससे बेहतर उदाहरण मिलना मुश्किल है।
इसमें शक नहीं कि मुलायम सिंह यादव हिंदी के लिए उतने ही प्रतिबद्ध हैं जितने कि समाजवाद के लिए। तीन बार देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद दोनों ही मसलों पर उनकी ओर से कोई ऐसी रचनात्मक और सकारात्मक पहलकदमी नहीं हुई जिससे कोई गुणात्मक फर्क पड़ता। लेकिन हिंदी का मसला उनका भी है जो मुलायम की राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। क्योंकि अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करके मातृभाषा को स्थापित करने की लड़ाई भावना का नहीं, जनतंत्र का प्रश्न है।
अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाना दरअसल संविधान का संकल्प है। आजादी के आंदोलन के दौरान हिंदी को अखिल भारतीय संपर्क और राजकाज की भाषा बनाने का सपना इसलिए देखा गया था क्योंकि गुलामी सिर्फ भौगोलिक और शारीरिक नहीं होती, सांस्कृतिक भी होती है। और आजाद भारत में हिंदी इसी सांस्कृतिक आजादी की अभिव्यक्ति के लिए चुनी गई थी। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये हिंदी पहले से मौजूद नहीं थी। बल्कि लगातार बनाई जा रही थी। हिंदी क्षेत्र में भी मातृभाषा तो अवधी, भोजपुरी, मगही, बघेली, बुंदेली जैसी बोलियां थीं जिन्हें पीछे छोड़ हिंदी की प्रतिष्ठा की जानी थी। ये स्वाभिमान का प्रश्न था। इसीलिए आजादी के बाद महात्मा गांधी ने बीबीसी के संवाददाताओं से अंग्रेजी में बात करने से इंकार करते हुए कहा था-दुनिया से कह दो, गांधी को अंग्रेजी नहीं आती। बाद में अरसे तक डा.लोहिया हिंदी को लेकर जूझते रहे और अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करना समाजवादी आंदोलन की प्रमुख मांग बनी रही
जाहिर है, आज जो अंग्रेजी की ओर उंगली उठने पर बौखला रहे हैं वे मन ही मन गांधी जी और डा.लोहिया को भी मूर्ख मानते होंगे। ये तबका बेहद शातिर है। उसने बड़ी चालाकी से अंग्रेजों की अनिवार्यता हटाने के वाक्य से 'अनिवार्यता' शब्द को गायब कर दिया। और बताने लगे कि अंग्रेजी हटाने की बात करना 21वीं सदी में मूर्खता है। इससे देश पीछे चला जाएगा या फिर मुलायम के अपने बच्चे क्यों अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े,वगैरह-वगैरह। वैसे तो, महात्मा गांधी और डा.लोहिया ने भी विदेश जाकर अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई की थी। क्या इस तर्क पर हिंदी के बारे में उनके विचार गलत ठहराए जा सकते हैं।
दरअसल, ये सारे तर्क मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए हैं। बात सिर्फ इतनी है कि करीब 50 करोड़ हिंदी भाषी, अंग्रेजी न जानने के बावजूद कैसे तरक्की कर सकें। कैसे डाक्टर, इंजीनियर, मैनेजर बन सकें। जिन्हें अंग्रेजी पढ़ना हो पढ़ें, पर जिन्हें अंग्रेजी न आती हो, उन्हें खामियाजा न भुगतना पड़े। आखिर रूस, चीन, जर्मनी, जापान, फ्रांस, स्पेन जैसे देश बिना अंग्रेजी के तरक्की कर सकते हैं, तो हिंदी वाले क्यों नहीं। ये हक हिंदी ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं को मिलना चाहिए।
वैसे भी, सिर्फ अंग्रेजी जानना ही विकास की गारंटी होती तो अमेरिका में लाखों लोग खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर नहीं होते। इक्कीसवीं सदी का एक चेहरा ये भी है कि अंग्रेजी जिस आर्थिक व्यवस्था के केंद्र में थी, वो दिवालिया हो गई है और जिस आउटसोर्सिंग का फायदा उठाने के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी माना जाता था, उसे बंद करने के लिए अमेरिका में जुलूस निकल रहे हैं। यानी, मनमनोहन सिंह का अंग्रेजी सिखाने के लिए आक्सफोर्ड जाकर अंग्रेजों को शुक्रिया कहना बेकार जा सकता है। वैसे भी, अंग्रेजी का सारा तूमार गलत तथ्यों के आधार पर बांधा गया है। अंग्रेजी पूरी दुनिया की नहीं, सिर्फ इंग्लैंड, अमेरिका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया और आधे कनाडा की भाषा है। यानी साढ़े चार देश। बाकी इन देशों के पूर्व उपनिवेशों के एक-आध फीसदी लोग इस भाषा का व्यवहार करते हैं।
दिमागी गुलामी को स्वर्ग का सुख मान रहे वर्ग की चिंता ये है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता हटते ही करोड़ों-करोड़ आम लोग तेजी से कुलीनतंत्र के शामियाने में घुसने की कोशिश करेंगे। तब आम और खास का फर्क ही मिट जाएगा। शासक वर्ग भी इस फर्क को बनाए रखना चाहता है। उसकी चिंता देश के दो-चार करोड़ अंग्रेजी जानने वालों को लेकर ही रहती है। ये वर्ग मुखर है और सत्ता प्रतिष्ठान के हर कोने में कब्जा जमाए हुए है।
आग और पहिये के बाद भाषा मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है। और दुनिया भर के शिक्षाशास्त्री बताते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा से ही मेधा निखरती है। मौलिक अभिव्यक्तियां मातृभाषा में ही संभव होती हैं। जनतंत्र का तकाजा ये है कि जनता और शासन की भाषा एक हो, पर हिंदी समाज में मुंसिफ और मुल्जिम, मुवक्किल और वकील, डाक्टर और मरीज, अफसर और क्लर्क की भाषा अलग है। अंग्रेजी में निष्णात होने के प्रयास में हिंदी वाला पैर में पत्थर बांधकर दौड़ता है और अक्सर पिछड़ जाता है। ऐसे में जरूरत नए महाप्रयास की है। ये सही है कि ज्ञान-विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में हिंदी किताबें उपलब्ध नहीं हैं। पर ये कोई मुश्किल काम नहीं है। अगर ठान लिया जाए तो पांच साल में दुनिया का सारा ज्ञान हिंदी में उपलब्ध हो सकता है। वैसे भी, आईआईटी,कानपुर के वैज्ञानिक ऐसा साफ्टवेयर विकसित करने के करीब पहुच गए हैं जो बटन दबाते ही सटीक अनुवाद पेश करेगा। यानी तकनीक भी काम आसान कर रही है। जरूरत है, इरादे की। याद करिए, तुर्की के कमाल पाशा को। उसने विद्वानों से पूछा कि तुर्की लागू करने के लिए कितना वक्त चाहिए। जवाब मिला-दस साल। कमाल पाशा ने कहा-समझ लो दस साल इसी वक्त खत्म हो गए, और तुर्की भाषा लागू हो गई।
कवि त्रिलोचन शास्त्री कहते थे कि हिंदी वालों में अपनी भाषा को लेकर अनुराग नहीं है। बात सही है। अनुराग होता तो समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र पर अंग्रेजी की बात पर न कांग्रेस आलोचना करने की हिम्मत करती, न बीजेपी। लेकिन उन्हें पता है कि हिंदी के नाम पर वोट नहीं पड़ते। जाति और धर्म के नाम पर पड़ते हैं। सोचिए, हिंदी का मजाक उड़ाने वाले मराठी की बात आते ही कैसे मिमियाने लगते हैं। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां रातो-रात अपने बोर्ड मराठी में कर लेती हैं और मैकडानल्ड की दुकानों में बटाटा बड़ा बिकने लगता है। क्योंकि उन्हें राज ठाकरे जैसों के लट्ठ का डर है। पर हिंदी को न राज ठाकरे चाहिए न जूता चलाने वाले जरनैल। उसे तो जामवंतों की जरूरत है जो हिंदी वालों को उनकी ताकत का अहसास करा सके। 50 करोड़ जाग्रत हिंदी भाषियों के बाजार में घुसने के लिए तो ओबामा भी हिंदी सीख लेंगे।














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