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पंकज श्रीवास्तव
Tuesday , May 12, 2009 at 16 : 35

चुनावी मौसम में जजिया


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वे चार दोस्त थे। गले में टाई, हाथ में बैग। किसी मेडिकल या सेल्स रिप्रेसेन्टेटिव जैसी हुलिया वाले ये नौजवान एक चाय के ठेले पर \'लंच\' करने जुटे थे। ऊपर से पुराने पर हरियाये नीम का स्नेह बरस रहा था, सो गरमी से राहत थी। पसीना सूखते-सूखते उनका खिलंदड़ापन वापस आ गया था और वे हंसी-मजाक मे जुट गए थे। पास ही बेंच पर एक अखबार पड़ा था जिसके पहले पन्ने पर खबर छपी थी कि तालिबान ने सिखों पर जजिया लगाया। एक ने ये खबर जोर से पढ़ी और फिर दूसरे की ओर मुखातिब होकर बोला- साले, यहां तुम लोगों पर भी जजिया लगा दिया जाए, तो पता चलेगा। साफ था कि कहने वाला हिंदू और सुनने वाला मुसलमान था। जवाब में एक खिसियाई हंसी के साथ मुस्लिम दोस्त ने भी जवाब दिया--अबे तालिबान का उखाड़ो जाकर, मुझसे क्यों भिड़ते हो। खैर, बात ज्यादा नहीं बढ़ी। न कहने वाला अपनी बात को लेक संजीदा था न सुनने वाला। रोजी की जंग में जूझते इन नौजवानों के पास बहस के लिए ज्यादा वक्त होता भी नहीं। हंसी-ठिठोली के बीच चाय के साथ जल्दी-जल्दी कुछ निगलकर ये आगे बढ़ गए।

पास ही खड़ा मैं सोचने लगा कि इन नौजवानों को क्या जजिया का मतलब पता है। आम धारणा यही है कि मुस्लिम शासक हिंदुओं को सताने के लिए इस टैक्स को वसूलते थे। इतिहास की ये पंजीरी आज भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जहर घोलती रहती है। ऐसी ही पंजीरी फांक कर मैं भी बड़ा हुआ था। ये तो इलाहाबाद विश्विवद्यालय का का मध्य एवं आधुनिक इतिहास विभाग था जिसने आंखों पर पड़े तमाम जालों को साफ किया और समझाया कि इस मध्ययुगीन टैक्स सिस्टम को सांप्रदायिक नजरिये से देखना नासमझी है।

आप कहेंगे कि चुनावी मौसम में ये बेवक्त की क्या शहनाई बजा रहा हूं। लेकिन ब्याह ही बेवक्त हो रहा हो तो शहनाई बजाने वाले का क्या दोष। जब जजिया अखबारों की हेडलाइन में हो तो हर संभव जरिये से इसका सही अर्थ न बताना अपने विश्विविद्यालय औऱ इतिहास विभाग के प्रति घात होगा।

तो सुनिए, जजिया फारसी का लफ्ज है। जब इस्लाम अरब से बाहर आया तो ये गैर-अरबों से वसूला जाता था चाहे वो मुसलमानों क्यों न हो। धीरे-धीरे ये इस्लामी शासन में रहने वाले दूसरे धर्म के लोगों से वसूला जाने लगा। अब इसमें क्या शक कि मध्ययुग में धर्म और राज्य का पूरा घालमेल था और शासक, जब तक नुकसान न हो, धार्मिक कानूनों का पालन करता था। इस्माली कानून के मुताबिक प्रत्येक मुसलमान के लिए सैनिक सेवा अनिवार्य थी। जबकि गैर मुसलमानों को इससे छूट थी। बदले में उन्हें जजिया देना पड़ता था। इस्लामी शासकों को जजिया वसूलने का वैधानिक अधिकार था, लेकिन चूंकि ये लोगों में सांप्रदायिक भेद पैदा करता था, इसलिए ज्यादातर शासक इससे बचते थे और इसे वसूलने को लेकर भी तमाम किंतु-परंतु थे।

इतिहासकार अबू जाफर तिवरी ने \'तारीख-ए-कबीर\' मे लिखा है- \'नौशेरवां आदिल ने जो नियम जजिया का बनाया था, उनमें प्रतिष्ठित व्यक्ति, अमीर (एक पद), सैनिक, धर्मगुरु, लेखक, निर्धन, दरबारी तथा अन्य शाही कर्मचारी जजिया से मुक्त थे। इसके अतिरिक्त जिनकी अवस्था बीस वर्ष से कम थी और पचास से अधिक थी, उनसे भी जजिया नहीं वसूला जा सकता था।\' इसका कारण बताते हुए वे लिखते हैं--\'सैनिक लोग देश की रक्षा के लिए प्राण देते हैं। इसलिए उनके लिए दूसरे लोगों की आय से एक विशेष धनराशि निर्धारित की गई, जिससे उन्हें आर्थिक सहायता मिल सके। जजिया देने वाले की पूर्ण रक्षा की जाए और अगर रक्षा करने की शक्ति न रह जाए तो जजिया वापस कर दिया जाए।\'

फिर भी ज्यादातर बादशाह जजिया लगाने से बचते थे। औरंगजेब ने भी अपने शासक बनने के बीस साल बाद 1678 में जजिया का आदेश दिया जब दक्षिण अभियान की वजह से खजाने पर भारी बोझ था। इसमें भी स्त्रियां, बीमार, पागल, अंधे, निर्धन, बच्चे और बूढ़े जजिया से मुक्त थे। इसके अलावा धनी से धनी व्यक्ति से बीस रुपये वार्षिक से अधिक बतौर जजिया नहीं वसूला जा सकता था। जजिया की न्यूनतम राशि तीन रुपये वार्षिक थी।

तो क्या मुसलमानों को टैक्स से छूट थी। बिल्कुल नहीं, उन्हें भी जकात देना पड़ता था जो आय का चालीसवां भाग था। यही नहीं, औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुंडा की उपद्रवग्रस्त मुस्लिम रियासतों पर कब्जे के बाद दंड स्वरूप जजिया लगा दिया था। फिर 1704 ये कहते हुए कि दोनों रियासतों की माली हालत ठीक हो गई है, जजिया हटा भी लिया।

कहने का मतलब ये कि जजिया एक मध्ययुगीन टैक्स सिस्टम था और दिमाग से पूरी तरह मध्ययुगीन तालिबान टैक्स वसूलने के लिए जजिया जैसे टैक्स की बात ही समझ सकते हैं। इसलिए न चौंकिए और न आधुनिक भारत में रहने वाले दोस्तों में प्रतिक्रिया होने दीजिए। दुआ कीजिए कि पाकिस्तानी जनता तालिबान के मुकाबले एक आधुनिक दृष्टि वाले देश के हक में उठ खड़ी हो। इसी में सबका भला है।

मुझे उम्मीद है कि मेरे विश्विविद्यालय के दिनों के दोस्त, जहां भी होंगे, लोगों को जजिया का सही मतलब समझा रहे होंगे। हम ये कैसे भूल सकते हैं कि सही सबक पाने के बाद हम सबके लिए ईद की सेवइयों की मिठास बढ़ गई थी।

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पंकज श्रीवास्तव के बारे में कुछ और

करीब 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय डॉ.पंकज श्रीवास्तव आईबीएन7 में एसोसिएट एडिटर हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास में डी.फिल करने के साथ उन्होंने मशहूर हिंदी दैनिक अमर उजाला से पत्रकारिता की शुरुआत की। पहले कानपुर और फिर लखनऊ ब्यूरो से जुड़कर उत्तर प्रदेश की राजनीति और दलित उभार पर विशेष रिपोर्टिंग की। 2003 की शुरुआत के साथ स्टार न्यूज की लॉन्चिंग टीम के हिस्सा बने। कुछ दिन वाराणसी और फिर चैनल का लखनऊ ब्यूरो संभाला। स्टार न्यूज में रहते हुए देश भर में घूम-घूम कर ट्रैवलॉग करने के लिए खासतौर पर पहचाने गए। सितंबर 2007 में सहारा के राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'समय' की लॉन्चिंग टीम में शामिल हुए, जहां बतौर फीचर एडीटर और एंकर काम करने के बाद मार्च 2008 से आईबीएन7 में कार्यरत।
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