ibnkhabarlogo
IBN7
IBN7
  • देश
  • पॉलिटिक्स
  • सिटी
  • मनोरंजन
  • क्रिकेट
  • लाइफस्टाइल
  • फोटो
  • वीडियो
  • यूपी इलेक्शन
  • चुनाव 2012
FacebookTwitter
  • दुनिया
  • बिजनेस
  • खेल
  • ब्लॉग
  • CJ
  • एस्ट्रो
  • शो
  • स्पेशल
  • अजब-गजब
  • लाइव-स्कोर
  • रीडर्स स्पेस
  • चैट
  • Live TV
    CNN-IBN IBN7 IBN Lokmat CNBC-TV18 CNBC Awaaz MYTV
पंकज श्रीवास्तव
Wednesday, November 04, 2009 at 21 : 18

माओवादी हिंसा और भीष्म पितामाह का उपदेश


7IBNKhabar Google Buzz

आईबीएन7 पर एहेतशाम खान की दिल दहला देने वाली खबर चल रही थी। ये कहानी भूख और बीमारी के कहर में लिपटे झारखंड के गढ़वा जिले के आदिवासियों की थी। मिरल ब्लॉक के गांव टेटुका कलां के साठ पार के बूधन भुइयां कांपती आवाज में बता रहे थे कि उनके दो नौजवान बेटे परिवार के लिए दो जून की रोटी जुटाने की जद्दोजहद में भरी जवानी मौत का शिकार बन गए। भूख ने शरीर को इस कदर तोड़ दिया था कि घात लगाए बैठी बीमारियों का हमला बर्दाश्त नहीं हुआ। बूधन की एक-एक अंतड़ी टीवी के पर्दे पर चमक रही थी। तन पर बस लाज ढकने भर का कपड़ा था। बता रहे थे कि किसी तरह मक्के का जुगाड़ हो पाता है। वो भी रोज नहीं। सरकारी मदद का कोई चेहरा आसपास नजर नहीं आता। हताश बूधन जैसे भविष्यवाणी कर रहे थे-'इसी तरह एक दिन हम भी मर जाएंगे।'

अचानक याद आया कि गढ़वा तो माओवादियों के असर वाला जिला माना जाता है। यानी जिस दिन माओवादी टेटुका कलां में एक बैनर टांग देंगे या बूधन भुइयां चुपचाप मरने के बजाय हालात से लड़ने की बात करने लगेंगे, भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हो जाएंगे। सुरक्षा बलों की गोलियां बूधन को निशाना बनाने के लिए आजाद होंगी और सवाल उठाने की इजाजत नहीं होगी। आजादी के 62 साल बाद आदिवासियों की यही नियति है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि माओवादी हौव्वे के पीछे शासक वर्ग की आपराधिक नाकामी को छिपाने की नीयत है। आंकड़े बताते हैं कि आजादी के बाद की तमाम विकास परियोजनाओं के नाम पर पांच करोड़ से ज्यादा आदिवासियों को विस्थापित किया गया। जल-जंगल-जमीन पर उनके अधिकार को कानून बनाकर छीन लिया गया, पर कहीं से आवाज नहीं आई। ये संयोग नहीं कि जिसे माओवादियों का लाल गलियारा कहकर प्रचारित किया जाता है, वो दरअसल, भारत का आदिवासी बहुल क्षेत्र है। जिसकी जमीन के नीचे विशाल खनिज संपदा दबी पड़ी है। दुनिया की तमाम कंपनियों की इस पर नजर है। सरकार से वे समझौता भी कर चुकी हैं। उन्हें जमीन चाहिए। कीमत आदिवासियों को चुकानी पडे़गी। यहां सरकारी विकास योजनाओं का दूसरा मतलब आदिवासियों को उनकी जमीन से खदेड़ना है।

मेरे सामने 13 सितंबर 1946 को संविधान सभा में दिया गया कैप्टन जयपाल सिंह का भाषण है- \"अगर भारतीय जनता के किसी समूह के साथ सबसे बुरा व्यवहार हुआ है तो वो मेरे लोग (आदिवासी) हैं। पिछले छह हजार सालों से उनके साथ उपेक्षा और अमानवीय व्यवहार का ये सिलसिला जारी है। मैं जिस सिंधु घाटी सभ्यता की संतान हूं, उसका इतिहास बताता है कि बाहरी आक्रमणकारियों ने हमें जंगलों में रहने के लिए मजबूर किया। हमारा पूरा इतिहास बाहरियों के शोषण और कब्जे से भरा है जिसके खिलाफ हम लगातार विद्रोह करते रहे। बहरहाल, मैं पं .नेहरू और आप सब के इस वादे पर भरोसा करता हूं कि हम एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं। ऐसा भारत बनाने जा रहे हैं जहां सभी को अवसर की समानता होगी और किसी की भी उपेक्षा नहीं की जाएगी। \"

कैप्टन जयपाल सिंह ऐसा नाम नहीं है जिसे भुला दिया जाए। 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारत को हाकी का पहला स्वर्ण पदक जिस टीम ने दिलाया था, जयपाल सिंह उस के कैप्टन थे। बाद में बतौर आदिवासी नेता मशहूर हुए और संविधान सभा के सदस्य चुने गए। उनके इस भाषण में1855 के संथाल विद्रोह,, 1890 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए \'उलगुलान\' और 1911 के बस्तर विद्रोह की गूंज है। ये बताता है कि हजारों साल के दमन के खिलाफ विद्रोह की इस परंपरा को इस आशा से स्थगित किया गया था कि आदिवासियों को बेहतर जिंदगी नसीब होगी।

पर अब आदिवासी इस युद्धविराम को तोड़ रहे हैं। इसके साथ ही वे रातों-रात माओवादी घोषित कर दिए गए हैं जो इस देश की सत्ता पर कब्जा करने के लिए हथियारबंद हो रहे हैं। अजब तस्वीर सामने है। पिछले दिनों राजधानी एक्सप्रेस के बहुप्रचारित हाईजैक (हालांकि ट्रेन कहीं और नहीं ले जाई गई। तीर-कमान के बल पर ट्रेन वैसे ही कुछ घंटे रोके रखी गई जैसे देश की सभी पार्टियां देश के हर हिस्से में अपने आंदोलन के दौरान करती हैं) का अंत पैन्ट्री कार में रखा दाल-चावल और कंबल लूटे जाने के साथ हुआ। यानी अलकायदा से लेकर लिट्टे तक से हथियार जुटा रहे माओवादियों के पास दाल-चावल और कंबल नहीं है। ये गजब का रूपक है। 'राजधानी' के खाने पर भूखे-नंगे लोग हथियार लेकर टूट पड़े हैं।

वाकई ये युद्ध है, जिसे चिदंबरम साहब हर हाल में जीतना चाहते हैं। पर दिक्कत ये है कि इस युद्ध के लिए वो जो तर्क दे रहे हैं, वो सिक्के का बस एक पहलू दिखाते हैं, और खराब नीयत का सुबूत हैं। उनका सबसे बड़ा तर्क है हिंसा का, जिसके लिए माओवादी बदनाम हैं, और लोकतंत्र का, जिसे माओवादी खत्म कर देना चाहते हैं।

पहले बात हिंसा की। महावीर, बुद्ध और उनके ढाई हजार साल बाद गांधी जी ने भारतीय समाज में अहिंसा के मंत्र को जोरदार ढंग से फूंका। लेकिन जनता के बीच न्याय के लिए हुई हिंसा कभी भी त्याज्य नहीं मानी गई। हिंदुओं का एक भी देवता ऐसा नहीं है जिसके पास कोई विशिष्ट हथियार न हो। ये देवता अपने हथियार से अक्सर किसी असुर का गला काटते नजर आते हैं। और मुसलमानों के लिए कर्बला की लड़ाई हमेशा ही जीवनदर्शन रही है। इसी तरह गांधी के जवाब में बम का दर्शन लिखने वाले भगत सिंह का नाम आते ही आज भी भारतीयों का खून गर्म हो जाता है।

वैसे भी, न्याय के लिए हिंसा का सहारा लेने के लिए भारतीयों को मार्क्स, लेनिन या माओ पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। जरा महाभारत के शांतिपर्व के इस श्लोक पर ध्यान दीजिए। सरशैया पर पड़े भीष्म राजकाज का गुर सीखने गए युधिष्ठिर से कहते हैं-

" अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिप:

स संहत्य निहंतव्य: श्वेन सोन्माद आतुर:"

(जो राजा प्रजा से कहता है कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा, किंतु नहीं करता, वह पागल औऱ बीमार कुत्ते की तरह सारी जनता द्वारा मार डालने लायक है।)

समझा जा सकता है कि महाभारत को घर में न रखने की बात क्यों प्रचारित की गई थी। शासक वर्ग ऐसी बातों से डरता है। इसका मतलब ये नहीं कि हिंसा किसी समस्या का समाधान है। लेकिन अन्याय के रहते अहिंसा की कल्पना वैसे ही है जैसे आग के निकट ताप न होने या पानी पड़ने पर गीला न होने की कल्पना।

ऐसा ही मसला लोकतंत्र का भी है। लाल गलियारे में रहने वाले आदिवासियों के लिए लोकतंत्र का वही मतलब नहीं है जो महानगरों के सुरक्षित खोहों में रहने वालों के लिए है। जो बार-बार अपनी जमीन से खदेड़े जाते हों, जिनकी स्त्रियों के खिलाफ बलात्कार की घटनाओं की गिनती न हो सके और जिनके बच्चों को दूध और दवा के अभाव में हर पल तड़पना पड़े, वे इस लोकतंत्र को आनंदवन कभी नहीं मानेंगे।

और जब देश की सभी राजनीतिक पार्टियां उनके मुद्दे पर खामोश हों तो वो क्या करें। हद तो ये है कि बौद्धिकों का एक तबका इसे विकास की स्वाभाविक परिणति मान रहा है। आखिर अमेरिका की महान सभ्यता रेड इंडियनों के संहार पर ही रची गई थी। वे आदिवासियों की समस्याओं पर कंधे उचकाने के अलावा कुछ नहीं करते। उनके लिए समस्या तभी है जब आदिवासी मरने-मारने पर आमादा हो जाएं। आदिवासी जीवन की अमानुषिक तस्वीर उनके लिए कोई समस्या नहीं है। उनके लिए कारण नहीं, परिणाम ही महत्वपूर्ण है। वे इस सवाल से तो खासतौर पर चिढ़ते हैं कि माओवादी जिस स्थिति का फायदा उठा रहे हैं उसका निर्माता कौन है?

खैर, अभी-अभी प्रधानमंत्री का बयान आया है कि माओवादियों का दिल जीतने की जरूरत है। तो क्या चिदंबरम का युद्ध सिद्धांत पलटा जाएगा..। ये आसान नहीं है, क्योंकि यहां भी दिल जीतने का रास्ता पेट से होकर गुजरता है। और आदिवासियों का पेट भरना?...बाप रे बाप...सरकारों से क्या-क्या उम्मीद की जाती है!

IBN7IBN7
IBNLiveIBNLive
IBNLive IBNLive

कमेंट्स

7

  
अपना कमेंट भेजें

नाम *

 

सिटी *

ईमेल *

     

कमेंट्स *


IBN7IBN7
IBN7IBN7

पंकज श्रीवास्तव के बारे में कुछ और

करीब 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय डॉ.पंकज श्रीवास्तव आईबीएन7 में एसोसिएट एडिटर हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास में डी.फिल करने के साथ उन्होंने मशहूर हिंदी दैनिक अमर उजाला से पत्रकारिता की शुरुआत की। पहले कानपुर और फिर लखनऊ ब्यूरो से जुड़कर उत्तर प्रदेश की राजनीति और दलित उभार पर विशेष रिपोर्टिंग की। 2003 की शुरुआत के साथ स्टार न्यूज की लॉन्चिंग टीम के हिस्सा बने। कुछ दिन वाराणसी और फिर चैनल का लखनऊ ब्यूरो संभाला। स्टार न्यूज में रहते हुए देश भर में घूम-घूम कर ट्रैवलॉग करने के लिए खासतौर पर पहचाने गए। सितंबर 2007 में सहारा के राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'समय' की लॉन्चिंग टीम में शामिल हुए, जहां बतौर फीचर एडीटर और एंकर काम करने के बाद मार्च 2008 से आईबीएन7 में कार्यरत।
IBN7IBN7

IBN7IBN7

पिछली पोस्ट

  • + विदर्भ के किसानों की शहादत और वोटतंत्र
  • + हिंदी दिवस पर 'कितने प्रतिशत भारतीय'
  • + इतिहास का भूत
  • + रक्षाबंधन पर शांता की याद
  • + तुम कभी नहीं मरोगे शैलेंद्र!
  • + हमारी किस्मत में सिर्फ विदूषक हैं!
  • + चुनावी मौसम में जजिया
  • + काशी, गंगा और मुख्तार
  • + हिंदी को भी चाहिए वोट की ताकत

आर्काइव्स

IBN7IBN7

IBN7IBN7IBN7
देश|पॉलिटिक्स|सिटी|मनोरंजन|क्रिकेट|लाइफस्टाइल|फोटो|वीडियो|दुनिया|बिजनेस|खेल|ब्लॉग|CJ|एस्ट्रो|अजब-गजब | स्पेशल|शो|लाइव स्कोर|News|Live TV
रीडर्स स्पेस|मुंबई न्यूज|आपका शहर|मैट्रो सिटी|क्राइम |बॉलीवुड |हॉलीवुड|टीवी|क्रिकेट|फैशन | रिश्ते|गैजेट्स |ऑटो |हैल्थ|ऑटो |RSS Feeds|Sitemap | Josh18
हमारे बारे में|डिस्क्लेमर|संपर्क करें | फीडबैक |Connect.in.com|Live Stock Market News|India’s Premiere Technology Guide
© 2012 IBNkhabar.com India. सर्वाधिकार सुरक्षित