ना..ये सिर्फ बलात्कार का मसला नहीं है। बलात्कार में लोहे की रॉड का इस्तेमाल नहीं होता। ये उसी दिमागी जहर का नतीजा है जिसने गुजरात में महिलाओं के स्तन काटे थे और गर्भ चीर दिया था, खैरलांजी में एक दलित लड़की को जिंदा जला दिया था या छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी महिला की योनि में पत्थर भर दिए थे। ये वहशियाना मर्दानगी, प्रतिकार में सिर उठाने वाली स्त्री को नेस्तोनाबूद करने से कम कुछ मंजूर नहीं करती। मर्द को 'जहरबुझा' बनाने का ये अभियान उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है।
गौर से देखिए तो पूरा देश बलात्कार का प्रशिक्षण देने की कार्यशाला ही लगेगा। आखिर भाषा में अपनी जगह दर्ज कार चुकी गालियां किसी की मां-बहन के साथ यौन दुर्व्यवहार के खुले एलान के अलावा क्या हैं? और ये केवल अपढ़ या सांस्कृतिक तौर पर कथित पिछड़े समाजों का सच नहीं है। आखिल वे अखबार क्यों दोषी नहीं हैं जो किसी सिलेब्रिटी की, किसी वजह से 'ज्यादा' उठ गई स्कर्ट की फोटो को लाल घेरे में छापते हैं? वो पत्रिका क्यों पवित्र है जो कवर पर नग्न स्त्री शरीर को ऐसे छापता है जैसे परनुची मुर्गी? वो 'एडगुरू' भी क्यों कर गुनाहगार नहीं, जो शैंपू-साबुन की गंध पहुंचाने के लिए स्त्री शरीर को उस बकरी की तरह इस्तेमाल करता है, जो जंगल में शिकार के लिए बांधी जाती है? जिन्होंने एफएम रेडियो और टीवी के जरिए 'उसकी कैसे ले लूं मैं' को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिलाने का अभियान छेड़ रखा है।
वो महान निर्देशक क्यों मासूम है, जो अपने दौर की सबसे बड़ी हिरोइन को 'आइटम' में बदल डालता है? सोचिए-सोचिए....और हाँ, यथार्थ के नाम पर साहित्य में गालियों की अनिवार्यता का झंडा उठाने वाले लेखकों औऱ आलोचकों, आप भी सोचिए-हर 'मादर'...'बहन' पढ़ने के साथ 'पाठक' की आँख चमकती है तो 'पाठिका' की आँख जलने क्यों लगती है.?














कमेंट्स
3