अभिषेक दूबे
Thursday , January 27, 2011 at 17 : 02

आईपीएल की कहानी, रिपोर्टर की जुबानी


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इंडियन प्रीमियर लीग हम जैसे पत्रकारों के लिए एक स्टोरी से अधिक था। एक नन्हें बच्चे की तरह, जिसने आंखों के सामने पहली बार करवट लिया, खड़ा हुआ और शुरुआती कदम रखा। ये बच्चा आंखों के सामने अचानक सरपट दौड़ने लगा और ऐसे भागा जैसे लगा कि जल्द ही ये ईपीएल और एनबीए जैसी विश्वविख्यात लीगों को पीछे छोड़ देगा। इंडिया का हमारा ये लीग टीम मालिकों को कॉर्पोरेट जायंट बना देगा, क्रिकेटरों को बॉस्केटबॉल और गोल्फरों की तरह रिकॉर्डतोड़ पैसा कमवाएगा और क्रिकेट के दीवानों को आने वाले कई सालों तक मनोरंजन का वो डोज देगा जिससे वो झूम उठेंगे। लगा कि फॉर्मूला वन के बर्नी एक्लेस्टोन, फीफा के सेप ब्लैटर और एनटोनियो समारांच की तरह ललित मोदी विश्वविख्यात स्पोर्ट्स बैरन बन जाएंगे। फिर एक एक ट्विटर ने जैसे सुबह को आए एक सुनहरे सपने के बीच में जगाया, सूनामी की कहर ने मोदी को हीरो से रातोंरात विलेन बना दिया और इंडिया का ये लीग संकट में दिखने लगी। नींद टूटते ही जैसे लगा- ऐसा कैसे हो सकता है। मंजिल के करीब आकर हम एक बार फिर मंजिल से दूर कैसे रह सकते हैं....

कुछ ऐसा ही एहसास हम स्पोर्ट्स पत्रकारों को कॉमनवेल्थ 2010 में भी हुआ था। ये सच है कि भ्रष्टाचार, लापरवाही और लाचारी की खबरों की वजह से खेल के होने को लेकर 48 घंटे पहले तक सस्पेंस बना रहा। बावजूद इसके लाजवाब उद्धाटन समारोह हुआ, कुछ गड़बड़ियों को छोड़ दें तो कामयाब आयोजन रहा और भारतीय एथलीटों ने पदकों का सैकड़ा पार कर दिया। खेल तो हो गया, लेकिन बदनामी ऐसी हुई कि ओलंपिक के आयोजन की दावेदारी के लिए कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। मोदी के बाद विलेन बनने की बारी कलमाड़ी की आई। सबसे बड़ा सवाल ये था कि क्या 100 करोड़ से अधिक आबादी वाला ये देश क्या कभी स्पोर्टिंग नेशन नहीं बन सकता? किसी भी लेवल पर टैलेंट की कमी नहीं है, ये सभी देख चुके हैं फिर आखिर कहां चूक जाते हैं हम, खेल सिर्फ खेल नहीं बल्कि किसी भी राष्ट्र की सोच का प्रतिबिंब है। मेरी नई किताब \' THE IPL STORY- Cricket, glamour and big money\' इसी दिशा में एक कोशिश है। इस किताब में इंडियन प्रीमियर लीग को एक प्रीज़म मानकर हमारे समाज में आई समास्याओं को तलाशने और उनका हल जानने की गंभीर कोशिश की गई है।

1991 में एलपीजी यानी लिब्रलायजेशन, ग्लोबलायजेशन और प्राइवेटाजेशन आने के बाद भारत में विकास के दो मॉडल आए। एक मॉडल को इनफोसिस और विप्रो जैसी कंपनियों का ग्रोथ मॉडल था, जिन्होंने मूलभूत सिद्धातों और नियमों का पालन कर खुद को आगे बढ़ाया और नतीजा पाया। सचिन तेंदुलकर की बैटिंग की तरह ये मॉडल ना सिर्फ लम्बी रेस के घोड़े की तरह आगे जाएंगे, बल्कि इनमें किसी भी स्थिति में खुद को ढालने की क्षमता है। दूसरा मॉडल सत्यम और आईपीएल का मॉडल है, जिसने मूलभूत सिद्धांतों का पालन नहीं किया और नियमों की अनदेखी की। ये मॉडल शाहिद अफरीदी की बैटिंग की तरह है, जो तूफानी शतक लगाकर करियर में धमाकेदार शुरुआत तो देने के काबिल तो है, लेकिन जिसे विकट स्थिति आते ही नतमस्तक करने में देर नहीं लगता। अगर ब्रांड इंडिया को लम्बी रेस का घोड़ा बनना है, तो उसे पहले मॉडल की तर्ज पर कामयाबी के लिए सीढि़यों का इस्तेमाल करना होगा, लिफ्ट जैसे शार्टकट का नहीं।

मेरी किताब \' The IPL story\' को लेकर मेरे कुछ मित्रों की एक शिकायत है। उनका कहना है कि इसमें निगेटिविटी भरी हुई है, क्योंकि आईपीएल में गड़बड़झाले को विस्तार से बताया गया है। मैं अपने ऐसे मित्रों का सम्मान करते हुए इस बारे में दो बातों को कहना चाहता हूं। पहली बात ये कि अगर हम बीमारी की जड़ तक जाने की कोशिश नहीं करेंगे, तो आईपीएल और सीडब्ल्यूजी जैसी गलतियां होती रहेंगी, मंजिल के करीब पहुंच हम मंजिल के दूर होते रहेंगे। हमें ये मानना होगा कि भ्रष्टाचार हमारे देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है, शायद आतंकवाद और महंगाई से भी बड़ी समस्या। भ्रष्टाचार पहले से था, लेकिन दिक्कत अब ये है कि इसे गाहे-बगाहे हम समाजिक मान्यता देने लगे हैं। अगर ब्रांड इंडिया को दुनिया भर में छा जाना है तो इसे लागू में करना जरूरी है। दूसरी बात ये है कि शायद मेरे ऐसे मित्रों ने पूरी किताब नहीं पढ़ी। खासकर आखिरी दो चैप्टर-मैं आईपीएल को लेकर बहुत आशावादी हूं और दिल से दुआ करता हूं कि ये लीग आने वाले साल में विश्व खेल जगत में हमारी पहचान बने। शायद इसलिए मैनें दुनिया भर के मशहूर खेल लेखकों की राय लेकर इस किताब में हू बहू डाला है। इनमें दुनिया के नम्बर एक क्रिकेट लेखक पीटर रोबक, आईपीएल स्टोरी की तह तक जाने वाले मेरे मित्र संजीव मुखर्जी, पाकिस्तान के दो मशहूर क्रिकेट पत्रकार ओसमान समिउद्दीन और माजिद भट्टी, आईपीएल के बारे में पहले दिन से दो टूक नजरिया रखने वाली शारदा उग्रा, मशहूर किताब Pandits from Paksitan के लेखक राहुल भट्टाचार्जी, पूर्व क्रिकेटर मनिंदर सिंह, क्रिकेटर और लेखक आकाश चोपड़ा, बीसीसीआई के युवा तुर्क अनिरुद्ध चौधरी और देश में स्पोर्ट्स प्रजेंटेशन का सबसे चर्चित चेहरा दारेन शाहीदी समेत कई लोग शामिल हैं। इन लोगों ने इस किताब में एक मंच पर आकर इंडियन प्रीमियर लीग के बारे में अपनी राय और यहां से आगे का रास्ता बताने की कोशिश की है।

क्रिकेट एकलौता ऐसा खेल है या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विधा है जिसमें हमें आर्थिक और फिलहाल क्रिकेटिंग सुपरपावर का दर्जा हासिल है। 2007 के बाद क्रिकेट का एपिसेंटर या केंद्र बिंदु पूरी तरह से भारत में आ गया है। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटरों, लेखकों और खेल समीक्षकों की नजर क्रिकेट वर्ल्ड लीडर भारत पर है। इस स्तर पर हमारे रवैये से ये तय होगा कि ना सिर्फ खेल बल्कि बाकी विधाओं में लीडरशिप पाने के बाद हम क्या योगदान दे सकेंगे। हम कैसे अलग छाप छोड़ सकेंगे। इस किताब में क्रिकेटिंग लीडर भारत का लेखा जोखा भी है। मैं इस मामले में बहुत ही भाग्यशाली रहा हूं कि मुझे राजदीप सरदेसाई और आशुतोष जैसे खेल को लेकर गंभीर सोच रखने वाले संपादकों के अंदर काम करने का मौका मिला है। इन दोनों ने भी इस किताब में अपना योगदान दिया। पीयरसन/पेंग्विन के लिए इस किताब पर मेरे मित्रों की इमानदार फीडबैक का इंतजार रहेगा...

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