अभिषेक दूबे
Thursday , July 21, 2011 at 18 : 56

क्रिकेट के लॉर्ड्स तुझे सलाम...!


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मेरे प्रिय लॉर्ड्स,

मैं ये खत वानखेड़े स्टेडियम, सिडनी क्रिकेट ग्राउंड, गद्दाफी स्टेडियम, न्यूलैंड स्टेडियम से लेकर बंगबंधु स्टेडियम समेत हर ग्राउंड की ओर से लिख रहा हूं...ये सच है कि बेकर स्ट्रीट ट्यूब स्टेशन में उतरते ही जैसे कदम तुम्हारी ओर बढ़ते हैं, क्रिकेट के दीवानों को ऐसा लगता है कि वो किसी तीर्थ पर जा रहें हैं...ये सच है कि अपने लगभग 125 साल के इतिहास में तुमने कई रिकॉर्डों को बनते और बिगड़ते देखा है, अरमानों को पूरा होते और टूटते देखा है...ये सच है कि कोई भी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर 22 गज की तुम्हारी पट्टी पर अपनी छाप छोड़े बगैर खुद को संपूर्ण नहीं मानता...ये सच है कि क्रिकेट इतिहास के तौर पर तुम्हारा कैनवास इतना वृहद है कि इतिहास शब्द का प्रयोग धुंध में खो जाता है...बावजूद इसके 21 जुलाई 2011 का दिन एतिहासिक है...इसके रंग इस फास्ट ट्रैक ऐज में भी जल्द मिटने वाले नहीं हैं...हम तुमसे ईष्या करते हैं...!

क्रिकेट का सबसे पुराना रंग यानी सफेद रंग, चौकाचौंध भरी इस दुनिया में नई जिंदगी के लिए दुआ कर रहा है..ये दुआ अगर क्रिकेट के मक्का से हो, इससे बेहतर क्या...क्रिकेट का सबसे पुराना अवतार अपना 2000वां रूप दिखा रहा है..इस रूप से पर्दा अगर ऐसे मैदान ए जंग में उठे जहां परंपराओं को सहेजना एक आदत है, तो क्या बात...1983 से पहले क्रिकेट का प्रशासनिक और वित्तीय सुपरपावर इंग्लैंड था...कपिल देव के दिलेरों ने लॉर्ड्स की बॉलकनी में वर्ल्डकप उठाकर अगर ये संकेत दिया कि हम आने वाले हैं, तो सौरव गांगुली ने इसी बॉलकानी में अपनी टी-शर्ट को खोलकर लहराते हुए ये कहा कि हम आ चुके हैं...ये सच है कि क्रिकेट की सत्ता का बेटन भारत ने इंग्लैंड से ही थामा..अगर इन दोनों के बीच 100वां मुकाबला क्रिकेटप्रेमियों की पसंदीदा ग्रामर-बुक में हो तो क्या कहने...!

ये एक एतिहासिक सच्चाई है कि क्रिकेट की जन्मभूमि कहे जाने वाले इंग्लैंड ने विश्व क्रिकेट में कभी बादशाहत साबित नहीं की। कोई वर्ल्ड कप नहीं जीता और ना ही लम्बे वक्त तक क्रिकेट के बड़े फॉर्मेट में कामयाबी के झंडे गाड़े। अगर क्रिकेट के मान्यता प्राप्त इतिहासकारों की मानें तो भारत में क्रिकेट ब्रिटेन की देन है। 1947 में अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ ये देश आज बीते एक साल से नम्बर एक टीम है। दूसरी ओर इंग्लैंड की टीम ने अलग-अलग देशों के टैलेंट को अपनाकर नम्बर एक टीम की उम्मीद जगाई है। टीम इंडिया के लिए ये लड़ाई है बादशाहत को बनाए रखने के लिए। इंग्लैंड की टीम के लिए ये लड़ाई है तख्तोताज बदलने के लिए। अगर इस महासमर का शंखनाद, इस एतिहासिक मैदान पर हो, तो कौन नहीं जलेगा....

खेल सिर्फ खेल नहीं ये मैदान से आगे की जीवन का आईना भी है। लॉर्ड्स की लड़ाई इस नाते भी अहम है। 1947 में आजाद हुए भारत अब दुनिया के लिए सिर्फ \'साधुओं, सपेरों, हाथियों और महाराजाओं की जमीन\' नहीं रहा। इसकी पहचान अब सॉफ्टवेयर सुपरपावर और प्रतिभाशाली युवा देश की है। भारत ने जिस कदर सभी वर्गों को साथ लेकर लोकतंत्र को अपनाया है और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंदी का सामना किया है, इससे वो रोल मॉडल बन चुका है। बीते दिनों जिस कदर नैटो और कम्युनिस्ट ब्लाक के पूर्व दबंगों के राजनेता एक के बाद एक दिल्ली आए, वो इस बात का संकेत था। इस आत्मविश्वास का प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ा है और क्रिकेटर इससे अछूते नहीं। रांची जैसे छोटे शहर से आया एक क्रिकेटर टीम का सेनापति है। पूर्व कोच गैरी कर्स्टन की मानें तो मैं धोनी जैसे लीडर को साथ लेकर किसी भी लड़ाई में जा सकता हूं। टीम इंडिया का ये सेनापति विश्व अभियान पर है और ये अभियान अपने निर्णायक मोड़ पर है। इंग्लैंड क्रिकेट में अब भी ऑस्ट्रेलिया को विरोधी नम्बर एक मानता है, अब भी एशेज को सबसे बड़ी लड़ाई मानता है। लॉर्ड्स से लेकर ओवल तक की लड़ाई को अगर भारत जीतने में कामयाब होता है, तो इस सोच में ना सिर्फ बदलाव आएगा, बल्कि टीम इंडिया वो सम्मान हासिल कर सकेगी, जिसपर अबतक ऑस्ट्रेलिया का दखल रहा है। अगर एमएसडी यानी धोनी की अगुआई में ऐसा नहीं हो सकता तो शायद आगे मुश्किल से हो सकेगा। इस सांकेतिक बदलाव की शुरुआत अगर लॉर्ड्स से हो, तो क्या सोने पर सुहागा नहीं...

लॉर्ड्स की लड़ाई में हम सबकी यानी दुनिया भर के बड़े मैदान नजर गड़ाए हुए हैं लेकिन हममें से ओवल का चंचल मन तो उतावला हो रहा है। ओवल को एक मौका मिला था, क्रिकेट का पुराना डॉन डॉन ब्रैडमैन अपनी आखिरी पारी खेल रहा था। अगर चार रन बना लेते, तो करियर में सौ का एवरेज होगा। ब्रैडमैन शून्य पर आउट हो गए और मंजिल के करीब पहुंचकर भी मंजिल से दूर रह गए। लॉर्ड्स को इस बार एक ऐसा ही मौका मिला है। क्रिकेट का मॉर्डन डॉन शतकों के शतक से सिर्फ एक कदम दूर है। क्रिकेट के मक्का में क्रिकेट के भगवान के पास वो मौका है, क्या लॉर्ड्स में वो हो पाएगा, जो ओवल में हो नहीं सका।

प्रिय लॉर्ड्स हम सभी जल रहे हैं, लेकिन इस जलन में सम्मान है...अगले पांच दिन हम सभी हर एक गेंद का लुत्फ सम्मान के साथ उठाएंगे..आखिर ये सिर्फ बादशाहत और आंकड़ों की लड़ाई नहीं है, ये टेस्ट क्रिकेट के जीवन और मौत की लड़ाई है...

आपका अपना,

वानखेड़े से लेकर बंगबंधु मैदान

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अभिषेक दूबे के बारे में कुछ और

अभिषेक पिछले एक दशक से पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं...एनडीटीवी में काम करने के बाद वे 2006 में आईबीएन-7 से जुड़े...20-20 वर्ल्ड कप, एशिया कप और भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरीज समेत कई अंतर्राष्ट्रीय मैचों को कवर कर चुके अभिषेक ने क्रिकेट पर एक बहुचर्चित किताब 'ड्रेसिंग रूम' लिखी..
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