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अभिषेक दूबे
Tuesday , January 10, 2012 at 19 : 31

रालेगण-रांची सपनों को जिंदा रखेंगे


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मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती,

पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती,

गद्दारी, लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती...

बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है,

सहमी सी चुप में जकड़ जाना बुरा तो है,

पर सबसे खतरनाक नहीं होता...

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना,

ना होना तड़प का, सब कुछ सहन कर जाना,

घर से निकलना काम पर, और काम से लौटकर घर आना,

सबसे खतरनाक होता है,

हमारे सपनों का मर जाना...

हिंदी कविता मेरी ताकत नहीं, लेकिन जबसे मेरे सहयोगी ने मुझे क्रांतिकारी पंजाबी कवि पाश की ये कविता सुनाई, मैंने इसे अपने दिल में उतार लिया। बहुत ही साधारण शब्दों में, लेकिन सीधे तरीके से कही गई इन पंक्तियों से मैं खुद को जुड़ा पाता हूं। क्रिकेट की तकनीकियों की मुझे बारीक पकड़ नहीं, लेकिन मैं धोनी से खुद को जुड़ा पाता हूं। आंदोलन के बारे में मैंने कोई शोध नहीं किया, लेकिन अण्णा से मैं खुद को जुड़ा पाता हूं। पाश की कविता की तरह वो दिल से बोलते हैं, सीधे शब्दों में बोलते हैं। सबसे अहम ये है कि मुझ जैसे आम आदमी के दिल का तार, उनसे जुड़ता है।

आप कहेंगे कि भला, अण्णा और धोनी का क्या नाता है? कैसा रहा साल 2011? एक ऐसी फिल्म की तरह जिसके क्लाइमेक्स का अंदाजा आखिरी मिनट तक लगाना मुश्किल था। एक मैच की तरह जिसमें आखिरी गेंद तक जीत, हार, ड्रॉ या फिर टाई तीनों ही संभावनाएं बची हुई थीं। एक ऐसे नॉवल की तरह जिसके आखिरी पन्ने को लेखक हर मिनट लिख और मिटा रहा था। एक ऐसे रोमांस की तरह, जिसके रिश्ते का नाम अंतिम समय तक दे पाना मुश्किल था, ऐसा क्यों? क्योंकि जनवरी से दिसंबर 2011, ऐसे हीरो सामने आए, जो लीक से हटकर थे, जिन्हें गुमनामी में देखने की हमारी आदत बन चुकी थी, जो तय मान्यताओं को धता बता रहे थे और जो निर्भय होकर मौजूदा व्यवस्था के सामने सवाल छोड़ रहे थे...कोई आश्चर्य नहीं, मौजूदा व्यवस्था के भोगी, इसमें बगावत देख रहे थे...इस व्यवस्था को सहन करने की जिनकी आदत बन चुकी है, वो इसे नाटक बता रहे थे...

मैं आज स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट हूं...मेरी आज की सोच की नींव, खेल मैदानों में भारत की हार और जीत पर आधारित है...हार अधिक और जीत कम...बैंगलोर में गावस्कर की आखिरी यादगार पारी, लेकिन भारत हारा...शारजाह में अंतिम गेंद पर मियांदाद का छक्का और वार-डांस...मद्रास में लाजवाब खेल, लेकिन नतीजा टॉय टॉय फिस्स...घरेलू जमीन पर 1987 और 1996 वर्ल्ड कप में निर्णायक मौके पर नॉक आउट...मंजिल तक पहुंचकर, मंजिल से दूर रह जाने का सिलसिला दूसरे खेलों का भी हिस्सा रहा...हॉकी में पहले हॉफ में हल्ला बोल, दूसरे हॉफ के निर्णायक मौके पर डब्बा गोल...एशियन गेम्स में उड़न परी पीटी उषा का जलवा, लेकिन ओलंपिक में मेडल पोडियम पर ना आ पाने की टीस...लेकिन साधारण घरों और माहौल से आए लड़ाके सोच के इस आधार को बदल रहे हैं...जिस वर्ल्ड कप में 83 तक सिर्फ हम हिस्सा लेने जाते थे, मामूली घर से आने वाले हरियाणा के एक लड़ाके ने इसे जीतकर दिखाया...मैंने कइयों को कहते सुना है, कि अगर कपिल ने वर्ल्ड कप नहीं जिताया होता, तो सचिन ने बल्ला नहीं थामा होता...मांजरेकर-मर्चेंट, गावस्कर-सचिन जैसे बल्लेबाजों के देश में पहला तिहरा शतक नजफगढ़ जैसे मामूली कस्बे से आए सहवाग ने लगाया...अगर कोई भारतीय कभी पहला चार सौ रन बनाएगा, तो वो झज्जर, सिरसा, अंबाला या फिर कोच्चि जैसी छोटी जगहों से आया होगा...

2 अप्रैल, 2011, तो इस सोच का ऐतिहासिक दिन था...क्रिकेट को लेकर जुनूनी देश भारत...भारत में क्रिकेट का सबसे बड़ा मुकाबला...क्रिकेट के इस सबसे बड़े मुकाबले का निर्णायक पल...रांची का एक शूरवीर, जो शायद आज खड़गपुर में टिकट काट रहा होता, कप्तानी पारी खेलता है, आगे बढ़कर छक्का मारता है और टीम इंडिया को वर्ल्ड कप दिला देता है.....अगर मेरी पीढ़ी की सोच की बुनियाद मियांदाद का वो छक्का था, तो आने वाली पीढ़ी की सोच का आधार धोनी का ये छक्का बनेगा...इस पीढ़ी में मेरी पीढ़ी से अधिक ताकत होगी...अगर मेरी पीढ़ी दिल्ली-मुंबई-चेन्नई जैसे महानगरों तक सीमित थी, तो इस पीढ़ी का हीरो रांची जैसे शहर से आया है..कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, रांची अधिक, दिल्ली-मुंबई कम हैं...पंप-इंस्पैक्टर के घर में पले-बढ़े इस नौजवान ने लीडरशिप के हुनर को विरासत में नहीं सीखा, मैनेजमेंट स्कूल में जाकर नहीं तराशा...बावजूद इसके, आधुनिक सोच रखने वाले क्रिकेट के मैनेजमेंट गुरु कहते हैं- मैं धोनी को लेकर वॉर में जा सकता हूं...जाहिर तौर पर जर्जर व्यवस्था जिसने अलग-अलग क्षेत्रों में ना जाने कितने धोनी को निगला है, आज सवाल कर रही है- 'धोनिया कप्तानी करेगा, बुरा वक्त आ गया है'...

वर्ल्ड कप जीत की वो शाम, तिरंगों के बीच चर्चगेट के पास के नजारे की तस्वीर को लिए मैं दिल्ली पहुंचा...5 अप्रैल की शाम अपने दोस्त से मिलने जंतर-मंतर गया...सफेद कपड़ों में बैठे, अण्णा हजारे, राष्ट्रगान की धुन पर, मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे...जैसी भीड़ सोचकर गया था, इसके विपरीत भीड़ थी...भीड़ में एक एनआरआई नौजवानों के झुंड से मिला...वो बोल रहे थे, ये अण्णा दिल से बोलता है...ये हमारे नेताओं से अलग है, जो हमेशा मतलबी बोल बोलते हैं...मैंने जब पूछा कि आप लोग तो अच्छा कर रहे हो, फिर ऐसे आंदोलन में भाग लेने का मतलब...झुंड में से ही एक युवक अंग्रेजी में बोल पड़ा, यूरोप, जापान और अमेरिका देखा...लेकिन हमारे देश में जितनी संभावनाएं हैं, कही नहीं...अगर देश को किसी ने कमजोर किया है, तो वो हमारे नेता हैं, जिन्होंने अपने हित के लिए भ्रष्ट व्यवस्था को पहले जन्म दिया फिर ऊर्जा...जंतर-मंतर होते हुए अण्णा का आंदोलन, तिहाड़ के रास्ते रामलीला ग्राउंड पहुंचा...अपने ट्रैक रिकॉर्ड के मुताबिक नेताओं ने स्क्रिप्ट बदली और फिर साल के अंत में संसद में अपने रंग में आ गए...ये अजीब इत्तेफाक था, कि जिस दिन भ्रष्टाचार के बिल को ठेंगा दिखाया गया, मुंबई का एमएमआरडीए ग्राउंड शांत पड़ा था...

अण्णा गांधी नहीं हैं, हो भी नहीं सकते...महात्मा गांधी एक ही रहेंगे...अण्णा के साथ 120 करोड़ जनता नहीं है...हो भी नहीं सकती...रामलीला ग्राउंड में 40-60 हजार की भीड़ को 120 करोड़ जनता का प्रतिनिधि मानना, बेवकूफी होगी...टीम अण्णा को अपने आंदोलन की दूरगामी रूप-रेखा का अंदाजा नहीं...हो नहीं सकता, क्योंकि इस टीम में जहां एक ओर किरण बेदी हैं, तो दूसरी ओर प्रशांत भूषण...बावजूद इसके इस आंदोलन ने कई दूरगामी संकेत दिए हैं...जिस तरह से हमारा पॉलिटिकल क्लास पैनिक हुआ, इससे तय हो गया कि वो कितने पानी में हैं...जिस पॉलिटिकल क्लास के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त कानून लाने में पसीने छूट गए, ऐसे लोगों से चुनाव सुधार, भूमि सुधार और पंचायतों और स्थानीय निकायों को ताकत देने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं...देश को एक ऐसे लीडर की तलाश है, जो दिल की बोले, मतलबी बोल नहीं बोले...देश के लिए सोचे, अपने परिवार के लिए नहीं सोचे...पिछड़े-दबे-कुचले और छोटे-छोटे शहरों के नागरिकों को उनका हक दे...इसलिए क्योंकि इसी वर्ग में हुनर का असली खजाना छुपा है और ये तबका आरक्षण से आगे बढ़कर, अपना वास्तविक हक लेने को तैयार हो गया है...

इतिहासकार बिपिन चंद्र ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को एक महान रणनीतिकार बताया था..बापू ने इस देश को पहले समझा और फिर इसमें महारथ हासिल की, कि किसी आंदोलन में कब एक्सेलेटर और कब ब्रेक लगाया जाए...टीम अण्णा में ये माद्दा है या नहीं, मुझे जानकारी नहीं...लेकिन किसी को अगर लीक से हटकर देश को 'नया नेतृत्व' देना है, तो देश को समझना होगा और भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने के लिए ठोस रणनीति बनाना होगा...हां, हमारे आज के नेता बोलेंगे- ये अण्णा आंदोलन करेगा, ये तो हमारा ट्रेड-मार्क है...

धोनिया कप्तानी करेगा, अण्णा लीडर बनेंगे, हिंदी चैनल न्यूज दिखाएंगे, ये सोच अपने एक्सपायरी डेट के करीब है...2011 ने देश को सपना दिखाया, सपने को जिंदा रखना सिखाया...रालेगण और रांची भले ही इस सपने का एपिसेंटर हो, लेकिन देश के हजारों रालेगण-रांची साफ संदेश दे रहे हैं- दिल्ली-मुंबई में मौजूदा लीडरशिप क्लास सपनों को मारना चाहती है, जो खतरनाक है, रालेगण-रांची चीख-चीख कर कह रहे हैं- सपने मरे नहीं हैं, क्योंकि बहुत ही खतरनाक होता है सपनों का मर जाना...।

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अभिषेक दूबे के बारे में कुछ और

अभिषेक पिछले एक दशक से पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं...एनडीटीवी में काम करने के बाद वे 2006 में आईबीएन-7 से जुड़े...20-20 वर्ल्ड कप, एशिया कप और भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरीज समेत कई अंतर्राष्ट्रीय मैचों को कवर कर चुके अभिषेक ने क्रिकेट पर एक बहुचर्चित किताब 'ड्रेसिंग रूम' लिखी..
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