अभिषेक दूबे
Tuesday , May 01, 2012 at 19 : 18

क्या सचिन का दिल बच्चा है जी?


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'कौन कहता है कि बीहड़ में तो बागी रहते हैं, डाकू तो संसद में रहते हैं। अब तो क्रिकेट का महानतम सपूत सचिन तेंदुलकर भी संसद में आने को तैयार हो गया है'। 'S&P ने तेंदुलकर की रैंकिंग को भगवान से गिराकर इंसान कर दिया है'। तेंदुलकर को राज्यसभा के लिए मनोनीत किए जाने की खबरें जैसे ही पुख्ता होती चली गईं, दो अलग-अलग मित्रों के ये संदेश आए। 1989 में क्रिकेट मैदान में कदम रखने के बाद बीते 23 साल में आम राय थी कि अगर सर्वकालीन नंबर एक क्रिकेटर नहीं तो तेंदुलकर कम से कम मौजूदा दौर के महानतम बल्लेबाज हैं, लेकिन गाहे-बगाहे सियासी मैदान में कदम रखने के 24 घंटे के अंदर ये आम राय रखने वाले लोग, दो विरोधी खेमों में बंट गए। वो या तो इसका जोरदार स्वागत कर रहे हैं, या फिर जबरदस्त विरोध। क्रिकेट के मैदान के अंदर और बाहर जबरदस्त संतुलन रखने वाला ये क्रिकेटर क्या करियर के आखिरी पड़ाव में बैलेंस खो रहा है? ये वो सवाल है जो कुछ लोग खुलकर तो कई दबी जुबान में कर रहे हैं।

15 नवंबर 1989 को मुंबई के इस नौजवान ने विश्व क्रिकेट में कदम रखा, तो 1991 में मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लाइसेंस, परमिट राज की बेड़ियों से आजाद करने का सिलसिला शुरू किया। उदारीकरण के इस दौर के सांकेतिक ही सही, सचिन रमेश तेंदुलकर जेनेरेशन ने एक नए भारत को अपनी आंखों के सामने पलते-बढ़ते देखा। ये जेनेरेशन मौजूदा मान्यताओं को चुनौती दे रही थी, दुनिया में छा जाने के अरमान में जी रही थी और सचिन के तौर पर एक सेनानी को देख रही थी, जो बैकफुट पर जाकर सीधे बल्ले से डिफेंस करने में नहीं, बल्कि फ्रंटफुट में आकर बॉलर के सिर के ऊपर से गेंद को उड़ाने में भरोसा रखता था। सोने पर सुहागा ये था कि उसमें शास्त्रीय संगीत का आधार था, तो सामयिक संगीत का रोमांच भी।

2011 वर्ल्ड कप की शाम तक सचिन जेनेरेशन ने अपने हीरो को तय स्क्रिप्ट के हिसाब से देखा। ये किरदार मध्यम वर्गीय परिवार का आधार होने के बावजूद ऊंचाइयों को तो छू रहा था, लेकिन जमीन से पूरी तरह से जुड़ा हुआ था। मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने सचिन नाम के पैकेज के बारे में कहा था कि- क्रिकेटर हो तो सचिन जैसा, देशभक्त हो तो सचिन जैसा, बेटा हो तो सचिन जैसा, पति हो तो सचिन जैसा और पिता हो तो सचिन जैसा। प्रभाष जी का मानना था कि बदलाव और उथल-पुथल के इस दौर में सचिन नाम का पैकेज ठहराव का सबसे बड़ा मॉडल है। ये वो स्क्रिप्ट थी जिसे क्रिकेट के इस महानतम सपूत ने 2011 वर्ल्ड कप की शाम तक जिया।

2 अप्रैल 2011 की शाम, इस स्क्रिप्ट का क्लाइमेक्स था। इस शाम के बाद आहिस्ता-आहिस्ता दुनिया एक नए सचिन से रूबरू होती गई। ये वो सचिन थे जिसने फिट होने के बावजूद करियर में पहली बार वेस्टइंडीज के दौरे में सफेद कपड़े में खेलने से इनकार कर दिया। ये वो सचिन थे जिसने लार्ड्स से लेकर शेर ए बांग्ला मीरपुर स्टेडियम तक के अपने सफर में उस हर दिन को प्रेस कॉंन्फ्रेंस में तमाम ऐसे मौके पर आने से इनकार कर दिया जिस दिन न तो वो 100वें शतक के आंकड़े को नहीं छू पा रहे थे और न ही टीम इंग्लैंड और फिर ऑस्ट्रेलिया में नम्बर वन टीम की तरह खेल पा रही थी। इस दौरान ऐसे मौके एक बार नहीं बार-बार आए। टीम मैनेजमेंट से जुड़े एक अहम अधिकारी का मानना था कि कम से कम 15 साल से अधिक समय से जानने के बावजूद उन्होंने इस क्रिकेटर के एक नए पहलू को देखा।

सचिन बीते दो साल से वनडे मैचों में काफी सोच समझकर शिरकत करते हैं। बीसीसीआई का एक अधिकारी तब हैरान रह गया जब एशिया कप जैसे टूर्नामेंट से ठीक पहले सचिन ने फोन करके इस टूर्नामेंट में खेलने की इच्छा जताई। ये साफ संकेत था कि क्रिकेट का ये अद्भुत ब्रैंड एंबेसडर, खुद को सैकड़ों के सैकड़े की बेड़ियों से आजाद करना चाहता था। अपनी पूरी जिंदगी के तीन चौथाई हिस्से को क्रिकेट के साए में बिताने वाला इंसान इस मंजिल तक किसी तरह पहुंचकर खुली हवा में सांस लेना चाहता था। वो दिन शेर ए बांग्ला, मीरपुर स्टेडियम में आया और दुनिया ने एक नए सचिन को देखा। घुंघराले बाल सीधे बाल में बदल चुके थे और जश्न मनाने का अंदाज पहले की तरह शालीन तो था, लेकिन हेलमेट के लोगो पर जोर देते हुए कुछ नया कहना चाहता था। ये 2 अप्रैल की शाम के बाद से शुरू हुआ लीक से हटकर एक लम्हा नहीं था बल्कि एक पैटर्न था।

सचिन के मैराथन करियर को अगर डीकोड किया जाए, तो इसका अहम पहलू ये रहा है कि वो मीडिया से कैसे पेश आते रहे हैं। मोहाली में ब्रायन लारा के सबसे अधिक टेस्ट रनों के रिकॉर्ड को तोड़ने के बाद मैंने जब उनसे इस बारे में सवाल किया था, उनका सीधा सा जवाब था- \'आप अपना काम करते हो, मैं अपना, लाख कोशिश करने के बावजूद मैं आपकी स्क्रिप्ट के हिसाब से नहीं चल सकता, जैसे आप अपने काम में मेरे तय किए गए मानकों को नहीं अपना सकते\'। इसके उलट सौवें शतक के बोझ को उतारने के बाद जब सचिन भारत में पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया से रूबरू हुए तो उनके कम से कम दो जवाब हैरान कर देने वाले थे।

पहला- सचिन ने कहाः मेरा मानना है कि कब संन्यास लेना है, ये फैसला मैं लूंगा, क्योंकि जब मैंने करियर शुरू किया था, तो ये फैसला मैंने किसी से पूछ कर नहीं किया था। जो लोग मुझे रिटायरमेंट की सलाह दे रहे हैं, वो तो मुझे टीम में नहीं लाए\'। दूसराः 'मैं इस बात पर भरोसा नहीं रखता कि आप अपने शिखर पर संन्यास लो। बेहतरीन दौर पर संन्यास लेने का फैसला स्वार्थ है क्योंकि तभी आप अपनी टीम और देश के लिए सबसे अधिक योगदान दे सकते हैं\'। जहां सचिन का पहला बयान इस बात का साफ संकेत था कि करियर के इस पड़ाव में आकर लगातार दबाव से वो परेशान हो चुके हैं, वहीं दूसरा बयान तय मान्यता को चुनौती था कि तभी अलविदा कह दो जब मेला भरा हो। कम ये कम सचिन से पहले मुंबई बैटिंग क्लब के सबसे बड़े हीरो सुनील गावस्कर ने अपने करियर को इसी फलसफे पर दी एंड कहा था।

छह अप्रैल की शाम को सचिन को करीबी से जानने वाले लोगों की प्रतिक्रियाएं जब सामने आनी शुरू हुई, तो हैरत में सभी थे। मशहूर कमेंटेटर और सचिन को करीब से जानने वाले हर्षा भोगले की मानें तो 'सचिन के पास सक्रिय सांसद होने का अनुभव नहीं हैं...कई लोग सचिन का फायदा उठाना चाहते हैं'। मुझे नहीं लगता कि ये सही सोच है। अगर सचिन को राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाकर सम्मानित करना मकसद है, तो सही है, लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि वो सक्रिय सांसद की तरह सामाजिक मुद्दों पर योगदान देंगे या फिर देश के भविष्य के बारे में राय रखेंगे, तो उनके पास अनुभव नहीं है\' सचिन को क्रिकेट मैदान के अंदर और बाहर करीबी से देखने वाले हर्षा ने आगे कहा कि 'मैं उन्हें करीब से जानता हूं। उनकी पूरी जिंदगी क्रिकेट के इर्द गिर्द बीती है। वो जिस तरह के इंसान रहे हैं, उसे देखते हुए मैं सोचता था कि वो अगले 12 महीने खेलेंगे और फिर आगे की सोचेंगे। इस फैसले के बाद अगर वो अगले 12 महीने खेलते हैं, व्यस्त क्रिकेट कैलेंडर की वजह से अनफिट होकर सीरीज से बाहर होते हैं, तो मुझे नहीं पता कि वो संसद के लिए कहां समय निकाल पाएंगे'।

हर्षा के अलावा सचिन को क्रिकेट मैदान के अंदर और बाहर लंबे वक्त से जानने वाले पूर्व क्रिकेटर और कमेंटेटर संजय मांजरेकर भी सचिन के फैसले से पूरी तरह से हैरान दिखे। मांजरेकर ने कहा कि मैं इस पूरे वाकये से हैरान हूं। नामांकन का फैसला बिना किसी तरह की सूचना देकर आया और फिर इसे मानने के फैसले ने तो मुझे पूरी तरह से सकते में डाल दिया। जब भी मैं सोचता था कि सचिन रिटायरमेंट के बाद क्या करेंगे, तो हमेशा लगता था कि क्रिकेट या कोचिंग से ही जुड़े रहेंगे, या फिर अधिक से अधिक अपना कोई व्यवसाय करेंगे और सामाजिक कार्य करेंगे लेकिन राज्यसभा की सदस्यता लेना रिटायरमेंट के बाद या फिर इस वक्त पर, इस बारे में तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था\'। मांजरेकर की मानें तो वो संसद के लिए समय तो निकाल लेंगे, लेकिन ये उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। सचिन के साथ क्रिकेट खेल चुके इस क्रिकेटर ने आगे कहा कि मैं तेंदुलकर को एक तरह के इंसान के तौर पर जानता था। मुझे इस बारे में उनकी रुचि के बारे में भनक तक नहीं थी कि वो इस प्रस्ताव को मान लेंगे। सचिन जैसे शांत इंसान के लिए जो क्रिकेट के मुद्दों पर भी राय रखने से कतराते हैं, ये एक अलग चुनौती होगी'।

हर्षा भोगले और मांजरेकर की तरह सचिन को करीबी से जानने वाले कई लोग इसलिए हैरत में हैं, क्योंकि सचिन नाम की किताब का ये चैप्टर पूरी तरह से हटकर था लेकिन तेंदुलकर के कुछ दोस्त ऐसे भी हैं जिनका मानना रहा है कि वर्ल्ड कप के बाद सौवें शतक के रास्ते में दबाव के बाद इस विरले क्रिकेटर की सोच और समझ में जो बदलाव आया है, इसकी नब्ज को लोग पकड़ नहीं पाए हैं। सचिन नाम की किताब का ये चैप्टर औचक नहीं आया है, बल्कि इसमें बीते 365 दिनों में ट्रांजिशन रहा है। पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री ने कहा था कि \'ऊपर वाले ने तेंदुलकर को धरती पर सिर्फ क्रिकेट खेलकर वापस लौटने का फरमान देकर भेजा है\' लेकिन सचिन को बीते पांच-दस साल से करीब से जानने वाले कुछ दोस्त ऐसे भी हैं, जिनका मानना है कि वो बल्ले और गेंद की इस तय स्क्रिप्ट से थक चुके हैं।

होश संभालने के बाद क्रिकेट को सोते-जागते जीने वाला इंसान, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद कुछ अलग करना चाहता है। सचिन को करीब से जानने वाले एक शख्स ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि मास्टर ब्लास्टर को बखूबी अंदाजा है कि 39 साल की उम्र में एक बड़ी चोट का मतलब है करियर खत्म। उसने कहा कि अमिताभ बच्चन ने राजनीति से तौबा कर ली थी, क्या इससे इस बात पर असर पड़ा कि वो बॉलीवुड के महानायक हैं। धर्मेंद्र बीकानेर में बीजेपी एमपी के तौर पर फेल रहे तो क्या शोले में उनके किरदार को कोई भुला सकेगा। ऐसे ही सचिन अपनी नई भूमिका में फेल होते हैं या पास, क्रिकेट की दुनिया में वो अपनी छाप छोड़ चुके हैं। अगर राजनीति में वो पास होते हैं, तो वो 40 साल की उम्र के बाद एक और फुटनोट होगा। अगर फेल होते हैं, तो क्रिकेटिंग करियर की बादशाहत तो उनके साथ रहेगी ही। क्या फेल होने के डर से कोई नया ना सोचे?

क्रिकेटर और लेखक आकाश चोपड़ा कहते हैं कि अगर तेंदुलकर ने इस ऑफर को मंजूर किया है, तो वो भारतीय खेल में बदलाव लाना चाहते हैं। उन्हें तंगहाल खिलाड़ियों के लिए काम करना चाहिए और खेल संगठनों में राजनेताओं के वर्चस्व को खत्म करने की पहल करना चाहिए। वो इसके लिए कैसे समय निकालते हैं और अपनी आवाज को पहुंचा पाते हैं ये देखना होगा लेकिन अगर उन्होंने संसद में जाने का फैसला किया है, तो सही मकसद से किया होगा।

युवा भारत के अरमानों को असली जिंदगी से दूर सही, लेकिन खेल के मैदान में पूरा करने का नाम सचिन तेंदुलकर है। सियासत की पिच भले ही उनके लिए नई हो, लेकिन अरमान उसके आसपास ही होंगे। राज्यसभा का काम रास्ता दिखाने का है, तो इसके 12 मनोनीत सदस्यों की भूमिका तो अग्रिम राही की है। ऐसे में एक नई पिच पर रास्ता टटोलने वाले सचिन के लिए ये चुनौती एवरेस्ट से नीचे आकर दोबारा एवरेस्ट की चढ़ाई से कम नहीं। तेंदुलकर ने 24 अप्रैल को अपना 39वां जन्मदिन मनाया है। 40वें जन्मदिन तक ये पता चल जाएगा कि तेंदुलकर में बीते साल आया बदलाव क्या दिल की आवाज से आई स्वाभाविक प्रक्रिया है या फिर बाजार की लिखी गई स्क्रिप्ट...।

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