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अनंत विजय
Tuesday , July 28, 2009 at 00 : 11

पार्टनर ! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?


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हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं। विवाद की जड़ में है - पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षापीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों पहला \'नरेन्द्र स्मृति सम्मान\' लेना। जबसे ये खबर छपी है पूरे साहित्य जगत में उदय की जमकर आलोचना शुरू हो गई। उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं। लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुंधला होकर भगवा हो गया है।

दरअसल उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है। परिस्थितियों के अनुसार उदय अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं और एक रणनीति के तहत उसपर अमल भी करते हैं। अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही है तो उदय प्रकाश ने अपने कहानी संग्रह- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था, जिनमें नामवर भी थे और काशीनाथ सिंह भी। नंदकिशोर नवल भी थे और भारत भारद्वाज भी। जाहिर तौर पर ये एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश थी। बाद में जब शिवनारायण सिंह संस्कृति मंत्रालय में थे तो उनको भी अपना एक कविता संग्रह समर्पित कर दिया। संयोगवश उसी वक्त उदय को मंत्रालय की फैलोशिप भी मिली।

इसके अलावा उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुडे़ रहे हैं, ये वो वक्त था जब अशोक वाजपेयी मध्य प्रदेश में साहित्य और संस्कृति के कर्ताधर्ता हुआ करते थे। लेकिन जब किसी वजह से वो पूर्वग्रह से बाहर हुए तो अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को \'भारत भवन के अल्सेशियंस\' तक कह डाला था । उसके बाद से अशोक और उदय साहित्य के दो अलग-अलग छोर पर रहे । लेकिन वाजपेयी के पिछले जन्मदिन पर उदय ने जिस अंदाज में उनको शुभकामनाएं अर्पित कीं उसके बाद दोनों के बीच जमी बर्फ पिघली और बताते हैं कि एक मुलाकात के बाद उदय को लखटकिया वैद सम्मान मिला। ये हैं उदय की प्राथमिकता और प्रतिबद्धता।

बीजेपी सांसद और कट्टर हिंदुत्ववाद के स्वयंभू मसीहा योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मान ग्रहण करने के बाद जब उदय पर चौतरफा हमले शुरू हुए तो अपने बचाव में उन्होंने बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया - \'एक नियोजित तरीके से मुझ पर आक्रमण करके बदनाम करने की घृणित जातिवादी राजनीति की जा रही है.....दरअसल इस हिंदू जातिवादी समाज में विचारधाराओं से लेकर राजनीति और साहित्य का जैसा छद्म और चतुर खेल खेला गया है, उसके हम सब शिकार हैं। मेरे परिवार में यह सच है कि कोई भी एक सदस्य ऐसा नहीं है ( इनमें मेरी पत्नी, बच्ची, बहू और पोता तक शामिल हैं और मेरे मित्र तथा पाठक भी) जो किसी एक धर्म, क्षेत्र, जाति, नस्ल आदि से जुडे़ हों । लेकिन हिंदी साहित्य और ब्लॉगिंग में सक्रिय सवर्ण हिंदू उसी कट्टर वर्णाश्रम -व्यवस्थावादी माइंडसेट से प्रभावित पूर्व आधुनिक सामंती, अनपढ़ और घटिया लोग हैं -जिनके भीतर जैन, बौद्ध, नाथ, सिद्ध, ईसाइयत, दलित, इस्लाम आदि तमाम आस्थाओं और आइडेंटिटीज़ के प्रति घृणा और द्वेष है। इसे वे भरसक ऊपर-ऊपर छिपाए रखने की चतुराई करते रहते हैं। मैंने जीवनभर इनका दंश और जहर झेला है और अभी भी झेल रहा हूं।\'

अपनी लंबी सफाई के आखिर में धमकाने के अंदाज में सवर्ण लुटेरों के साम्राज्य को ध्वस्त करने का दावा भी करते हैं । उदय पर पहले भी जब-जब उनकी व्यक्तिवादी कहानियों को लेकर उंगली उठी थी तो किसी को मथुरा का पंडा, तो किसी को घनघोर अनपढ़ घोषित किया तो किसी को अफसर होकर साहित्य की दुनिया में अनधिकार प्रवेश के लिए लताड़ा। इसके पहले जब वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी \'झूठ का मूठ\' छपी थी तो अच्छा खास विवाद खड़ा हो गया था। उस वक्त भी सफाई देते हुए उदय प्रकाश ने कहा था कि- दरअसल ऐसा है कि दिल्ली में गृह मंत्री के भ्रष्ट अधिकारियों का एक क्लब है जो नाइट पार्टी का आयोजन करता है। इसमें शराब पी जाती है और अश्लील चर्चा होती है। जो इसमें शामिल नहीं होता है, ये लोग उसपर हमला करते हैं। ये साहित्येतर लोग हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध तो करते हैं मगर गली-मोहल्ले के मवालियों के साथ बैठकर शराब पीते हैं।\'

तो उदय प्रकाश की जब भी आलोचना होती है तो वो बिफर जाते हैं। रविभूषण ने जब इनकी कहानी पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था। लेकिन बीजेपी सांसद के हाथों सम्मानित होकर इस बार उदय बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं । उदय की सफाई के बाद हिंदी के दो दर्जन से ज्यादा महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने अपने हस्ताक्षर से एक बयान जारी कर उदय की भर्त्सना की। बयान जारी करने वालों में प्रमुख नाम हैं- ज्ञानरंजन, विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बार रब्बी, मदन कश्यप, देवीप्रसाद मिश्र आदि।

चौतरफा घिरता देख उदय प्रकाश ने एक बार फिर से अपने ब्लॉग पर एक सफाई लिखी लेकिन ये सफाई कम धमकी ज्यादा है। इसके बाद उदय प्रकाश की ओर से ब्लॉग चलाने वाले पत्रकार अविनाश ने मोर्चा संभला और जनसत्ता में \'और अंत में घृणा\' के नाम से एक लेख लिखकर उदय की दलीलों को आगे बढा़या। उदय के समर्थन में उतरे अविनाश के तर्क भी उतने ही लचर हैं जितने उनके अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रिय रचनाकार के। तर्क पर गौर फरमाइये- जिन नरेन्द्र जी की स्मृति में उदय प्रकाश को योगी ने सम्मानित किया, वे नरेन्द्र जी उदय प्रकाश के फुफेरे भाई थे। दोनों में तीन दशकों की वैचारिक दूरी थी, जो हर मुलाकात में बहसों की शक्ल लेकर परिवारवालों का जीना दूभर करती रही थी । एक बरस पहले कुंवर नरेन्द्र की मृत्यु के बाद की शोकाकुल स्थियों में उदय प्रकाश उपस्थित नहीं हो सके। लेकिन पहली बरसी पर वो गए। इस बरसी में वे भी मौजूद थे, जो कुंवर साहब की जीवन की छटाओं में बिखरे थे। योगी भी इसलिए आए लेकिन उस वक्त उदय प्रकाश अपनी मौजूदगी के राजनीतिक अर्थ नहीं निकाल पाए। अबोध बने रहे।\'

अब अविनाश को कौन बताए कि उदय प्रकाश को वो जितना अबोध समझ रहे हैं या साबित करना चाह रहे हैं वो उतने अबोध हैं नहीं। मृत्यु के मौके पर ना जाकर बरसी पर जाना और सम्मानित होना भी मंशा पर सवाल तो खड़े करता ही है। लेकिन अविनाश ने जाने अनजाने एक काम ये कर डाला कि जो विवाद अब तक ब्लॉग तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय दैनिक में उजागर कर दिया। उदय प्रकाश एक बेहतर कवि हो सकते हैं, कहानियां भी हो सकता है कि उन्होंने अच्छी लिखी हों, लेकिन उनकी कहानियां व्यक्तियों पर केंद्रित होकर लोगों को दुखी करती रही हैं।

जब उपेन्द्र कुमार की कहानी \'झूठ का मूठ\' छपी थी तो उसपर पटना से प्रकाशित \'प्रभात खबर\' में एक लंबी परिचर्चा छपी थी। जिसमें सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था। पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया। फिर वामपंथी गीतकार असफल प्रेमकथा का साडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी। किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अध्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उछालने वाली शैली में कविताएं भी लिख डालीं। किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है। उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा। हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं। यह लेखक दरअसल स्वयं एक \'माचोसाडिस्ट\' है जो दूसरों को अपने \'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप\' में जलील करता और सताता आया है। यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है। शठ को शठता से ही सबक दिया है।\' संयोग ऐसा कि तब प्रभात खबर के साहित्य पृष्ठ के प्रभारी अविनाश ही थे।

उदय प्रकाश की राजनीति और जोड़-तोड़ और दंद-फंद को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है । इन सबको देखकर मुक्तिबोध की आत्मा कराहती हुई पूछ रही होगी - पार्टनर ! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

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