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अनंत विजय
Sunday , October 18, 2009 at 17 : 07

बंद करो किताबों की सरकारी खरीद


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इस वर्ष के साहित्य के नोबेल पुरस्कार का ऐलान हुआ और रोमानिया में पैदा हुई जर्मन लेखिका हेर्ता म्यूलर को ये सम्मान मिला तो उनके लेखन के बारे में जानने की इच्छा हुई । काम से वक्त निकालकर दिल्ली और आसपास की पुस्तकों की दुकानों की खाक छानी लेकिन हेर्ता म्यूलर की कोई किताब कहीं नहीं मिल पाई । तकरीबन हर जगह पुस्तक विक्रेताओं ने कहा कि कुछ दिनों में पुस्तक उपलब्ध हो पाएगी। निराश होकर वापस लौट आया लेकिन कुछ सवाल बेहद परेशान करने वाले रहे और लगातार मुंह बाए मेरे सामने खड़े हैं। पहला तो ये कि हमारे समाज में किताबों को लेकर ये उपेक्षा भाव क्यों है? उपेक्षा भाव मैं इसलिए कह रहा हूं कि राजधानी दिल्ली, जिसे दूरदराज के साहित्यप्रेमी और लेखक साहित्य की भी राजधानी कहते हैं, में भी किताबों की दुकान ढूंढने में आपको श्रम करना पड़ेगा। ढूंढे से किताब नहीं मिल पाएगी। कोई भी ऐसी दुकान नहीं जहां आप इस विश्वास के साथ जा सकें कि आपकी मनपसंद किताब आपको मिल जाएगी।

अगर हम पुस्तकों की उपलब्धता की बात करें तो दिल्ली और आसपास के शहरों के हालात बेहद निराशाजनक हैं। पूरी दिल्ली में किताबों की दुकानें उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं और आपको उनतक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ेगी। अगर आप तमाम संघर्षों के बाद किताबों की दुकान तक पहुंच भी जाते हैं तो आपको अंग्रेजी कि किताबें तो मिल जाएंगी लेकिन हिंदी की किताबें नहीं मिल पाएंगी। हिंदी की किताबों के लिए आपको प्रकाशकों से संपर्क करना पड़ेगा या फिर दिल्ली के दरियागंज इलाके की खाक छाननी होगी। दरियागंज का आलम ये है कि आप अगर वहां अपनी कार से चले गए तो कार अक्षत वापस नहीं आ सकती, उसपर खरोंच लगना तय है। साथ ही गाड़ी पार्क करने में आपको इतनी मशक्कत करनी पड़ेगी कि आपके किताब पढ़ने का भूत सिर से उतर जाएगा। ये हाल सिर्फ पुस्तकों को लेकर ही नहीं है, पत्र- पत्रिकाएं भी सहज उपलब्ध नहीं हैं।

सवाल ये उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। क्या पूरा हिंदी समाज इसके लिए जिम्मेदार है या फिर प्रकाशकों को पाठकों की फिक्र ही ही नहीं है। दरअसल मुझे लगता है कि इसके लिए प्रकाशकों के साथ- साथ वामपंथी विचारधारा के लेखकों और प्रकाशकों पर उनका प्रभाव जिम्मेदार है। ना तो लेखक और ना ही प्रकाशक किताबों को प्रोडक्ट की तरह समझकर व्यवहार करते हैं। प्रोडक्ट नाम सुनते ही वामपंथी लेखक ऐसे भड़कते हैं जैसे लगता है कि किसी सांड को लाल कपड़ा दिखा दिया गया हो। प्रोडक्ट शब्द से उनको बाजारवाद और पूंजीवाद की बू आने लगती है और वो इसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर पुस्तकों को प्रोडक्ट की श्रेणी में रख दिया जाएगा तो उनका श्रम व्यर्थ चला जाएगा, उनकी मेहनत पर पूंजीवाद और बाजारवाद पानी फेर देगा। लेकिन प्रोडक्ट वही तो होता है जिसपर मेहनत की जाती है, जिसके उत्पादन पर पैसा खर्च किया जाता है और जिससे कुछ लाभ की अपेक्षा की जाए। लेखक भी कई महीनों तक किसी कृति पर मेहनत करते हैं और फिर प्रकाशक उसे किताब की शक्ल देने में उसपर पैसे खर्च करता है और लाभ की अपेक्षा लेखक और प्रकाशक दोनों को होती है। तो मानव श्रम, पैसा और लाभ की आकांक्षा तीनों चीजें हैं तो फिर प्रोडक्ट मानने में हर्ज क्या है।

अगर प्रोडक्ट को बाजार नहीं मिलेगा तो ना केवल मानव श्रम व्यर्थ जाएगा बल्कि जिस लक्ष्य और उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी खास विषय पर लिखा गया है वो जाया चला जाएगा। लेखकों की रचनाओं से ये अपेक्षा होती है कि वो समाज में बदलाव लाएंगी लेकिन अगर रचनाएं टार्गेट ग्रुप तक पहुंच ही नहीं पाएंगी तो ना तो समाज में बदलाव आ पाएगा और ना ही किसी विचार का प्रसार हो पाएगा। दूसरी बात ये कि अगर हम पुस्तकों को एक उत्पाद मानने लगेंगे तो प्रकाशकों के साथ-साथ लेखकों का भी भला होगा। अभी हालात ये है कि रॉयल्टी को लेकर हर लेखक के मन में मलाल होता है। हिंदी के लेखकों के इस मलाल से ये तो साबित हो ही जाता है कि उनको अपनी किताब से लाभ की अपेक्षा है। आपने श्रम किया, आपको लाभ की आकांक्षा है और प्रकाशक का पैसा लगा तो फिर किताब को उत्पाद मानने में दिक्कत क्या है।

दूसरी अहम बात है कि प्रकाशकों की रुचि भी सरकारी थोक खरीद में ज्यादा होती है और पाठकों तक पहुंचाने में होने वाली मेहनत और खर्चे से वह बचना चाहता है। प्रकाशकों के लिए प्रकाशन व्यवसाय किसी भी दूसरे अन्य कारोबार की तरह ही है जहां उसका उद्देश्य कम खर्चे में ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना है और अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वो प्रयास भी करता रहता है, करना भी चाहिए। प्रकाशकों को लगता है कि सरकारी खरीद में अफसरों को रिश्वत देकर अगर अपनी किताबें बेच दी तो बल्ले-बल्ले। हर्र लगे ना फिटकरी रंग चोखा होए। कई प्रकाशक मेरे मित्र हैं, उनसे जब भी बात होती है तो उनकी चिंता सिर्फ सरकारी थोक खरीद को लेकर रहती है। फुटकर बिक्री में उनकी रुचि बेहद कम होती है, जब भी उनसे बात करो तो पाठकों की कमी का रोना रोकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन ये बात बार-बार उठती रही है और हर बार गलत भी साबित होती रही है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं। आज हिंदी के पाठकों का बड़ा बाजार है जिसपर कब्जे की होड़ दिखाई दे रही है। लेकिन हिंदी के प्रकाशक इसको या तो समझ नहीं पा रहे हैं या फिर जानबूझकर समझना नहीं चाहते।

तीसरी अहम बात है कि लेखक भी प्रकाशक पर ये दबाव बना पाने की स्थिति में नहीं हैं कि उनकी किताबों के प्रचार प्रसार के लिए काम किया जाए। ये किसी व्यक्तिगत प्रयास से संभव नहीं है। क्योंकि आज हिंदी के लेखक इस हैसियत में नहीं हैं कि वो प्रकाशकों पर दबाव बना सकें। जो दो तीन लेखक इस हैसियत में हैं उनपर प्रकाशक इतने मेहरबान होते हैं कि वो अपने साथी लेखकों के हितों के लिए उठनेवाली आवाज का समर्थन नहीं कर सकते। उल्टे प्रयासपूर्वक मामले को सुलझाने के नाम पर प्रकाशकों की तरफदारी करने लग जाते हैं। लेखक संगठन लगभग मृतप्राय है जिनकी भूमिका कुछ रह नहीं गई है। लेखकों की शोकसभा और एकाध रचना पाठ आयोजित करने के अलावा संगठन कुछ कर नहीं पाते हैं।

तो ऐसे में सावल ये उठता है कि हम जैसे पाठकों का क्या होगा, क्या किसी खास किताब को पढ़ने की हमारी लालसा मन में दबी रह जाएगी। या फिर इस समस्या का हल भी सरकार को ही करना पड़ेगा। मुझे तो लगता है कि पुस्तकों की सरकारी थोक खरीद बंद कर देनी चाहिए और प्रकाशकों और लेखकों को पाठकों के रहमोकरम पर छोड़ देना चाहिए तभी प्रकाशक पाठकों तक पहुंचने की कोशिश करेंगे और हिंदी समाज में पुस्तक संस्कृति बन पाएगी।

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