देश के दक्षिणी राज्यों में फिल्मी सितारों का अच्छा खासा प्रभाव है। जनता चाहती है तो जाहिर है राजनेता और राजनीतिक दलों के बीच भी उनकी धाक है। पिछले दिनों जब तमिल दैनिक 'दिनामलार' के न्यूज एडीटर बी. लेनिन को अखबार में छपी एक रिपोर्ट के आधार पर बगैर किसी वॉरंट के पुलिस ने उनके दफ्तर से गिरफ्तार किया और रात में ही जज के घर पर पेश कर रिमांड पर लिया तो पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए।
दरअसल दिनामलार में एक तमिल अभिनेत्री के सेक्स रैकेट में होने की खबर छापी गई थी। जिससे पूरा तमिल फिल्म उद्योग एकजुट होकर चेन्नई पुलिस कमिश्नर के दफ्तर के सामने धरने पर बैठ गया। तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने उक्त अभिनेत्री पर लगाए गए आरोपों को फिल्म फैटरनिटी पर लगा आरोप मानकर एकजुटता दिखाई। तमिल फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत भी धरने पर बैठे और मीडिया को जमकर नसीहत दी।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन की इजाजत सबको है लेकिन जिस तरह से तमिल फिल्मी सितारों ने जहर उगला उसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है। दिनामलार के संपादक पर तो अखबार में छपी रिपोर्ट के आदार पर हैरेसमेंट ऑफ वूमन एक्ट लगा दिया गया लेकिन सरेआम लेनिन के परिवारवालों के खिलाफ जहर उगलने वाले फिल्मी सितारों पर कोई कार्रवाई करने की हिम्मत चेन्नई पुलिस नहीं जुटा पाई।
जो विरोध प्रदर्शन हुआ उसमें तमिल सितारों ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी। श्रीप्रिया तो जोश में होश खो बैठी और दिनामलार अखबार के मालिकों के परिवार की औरतों के बारे में जमकर बुराभला कहा। विवेख ने तो यहां तक कह डाला कि अगर लेनिन की परिवार की औरतों की तस्वीरें उन्हें मिल जाएं तो कंम्प्यूटर ग्राफिक्स के जरिए वो अश्लील तस्वीरों के ऊपर उनका चेहरा लगाकर पूरे राज्य में दीवारों पर चिपकवा देंगे। वो यही नहीं रुके और मीडिया को बगैर फिल्मों के सीन इस्तेमाल किए पत्रकारिता करने की चुनौती दे डाली। अब इस कॉमेडियन को कौन समझाए कि सितारों की लोकप्रियता मीडिया की बदौलत ही है। किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले उनके पब्लिक रिलेशन एजेंट किस कदर मीडिया का सामने गिड़गिड़ाते हैं ये बताने की जरूरत नहीं है।
अभिनेता विजय कुमार ने तो सरेआम यहां तक कह डाला कि दिनामलार के उस रिपोर्ट को देखने के बाद उनका खून खौल उठा और वो अखबार के दफ्तर में घुसकर हंगामा करने की सोचने लगे थे। हो सकता है कि दिनामलार में छपी वो रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ियां हो और जनता के हित की कोई बात नहीं हो। इसके लिए पीड़ित पक्ष को अदालत की शरण लेनी चाहिए या फिर अखबार और पत्रकार के खिलाफ प्रेस काइंसिल जाना चाहिए था। लेकिन विरोध प्रदर्शन का ये कौन सा तरीका है जहां आप सरेआम गाली-गलौच की भाषा इस्तामाल करते हैं। ये एक ऐसा तरीका है जिसको अपनाकर सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है और सरकार फिल्मी सितारों की लोकप्रियता का दबाव में बगैर सोचे समझे कानूनी कार्रवाई कर मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कर रही है।
पिछले कुछ सालों से मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले लगातार बढ़े हैं। अगर हम गौर करें तो मीडिया संस्थानों, चाहे वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक, पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमले के कई वारदात हुई हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब एक अनाम से संगठन 'हिंदू राष्ट्र सेना' के तीस चालीस गुंडे सरिए और हथौड़े से लैस मुंबई के एक टीवी न्यूज चैनल के दफ्तर में घुस गए और जमकर न केवल उत्पात मचाया बल्कि पत्रकारों के साथ मारपीट भी की।
इतने पर भी जब उन गुंडों का गुस्सा ठंढा नहीं हुआ तो दफ्तर के फर्नीचर और नीचे पार्किंग में खड़ी गाड़ियां तक तोड़ डालीं। इन लोगों के गुस्से की वजह बना उक्त न्यूज चैनल पर दिखाई गई एक खबर जिसमें एक मुस्लिम लड़के ने एक हिंदू लड़के से शादी कर ली थी और समाज के ठेकेदारों के डर से वहां आकर आत्मसमर्पण किया था। इस हमले की जब राष्ट्रीय स्तर पर घोर निंदा हुई तब जाकर सरकार हरकत में आई और अठारह लोगों की गिरफ्तारी हुई। बाद में पता चला कि हमला करने वाले इस अनाम से गैंग का मुखिया धनंजय देसाई था जिसके खिलाफ पहले ही चोरी के तेरह मामले दर्ज थे।
उस वारदात के ठीक अगले ही दिन राजधानी दिल्ली में एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के रिपोर्टर से मारपीट की गई। दरअसल राजधानी के रोहिणी इलाके में एक डॉक्टर को महिला मरीज के साथ छेड़छाड़ के आरोप में पकड़ा गया और जब रिपोर्टर मौके पर पहुंचकर तस्वीर लेने लगा तो ड़ॉक्टर के समर्थकों ने वहां मौजूद मीडियाकर्मियों पर हमला कर दिया और उनके साथ मारपीट की। इन वारदातों से सकते में आई मीडिया अभी उबर भी नहीं पाया था कि सुदूर दक्षिण के शहर मदुरै से खबर आई कि कुछ उत्पाती लोगों ने तमिल दैनिक 'दिनाकरण' के दफ्तर को फूंक डाला है। इस घटना में तीन लोगों की मौत भी हुई। आरोप लगा था तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के बड़े बेटे और अब केंद्रीय मंत्री अझागिरी के समर्थकों पर। गुस्से की वजह दिनाकरण में छपा एक सर्वे था, जिसमें जनता से ये सवाल पूछा गया था कि करुणानिधि के बाद डीएमके की बागडोर कौन संभालेगा। और अझागिरी के समर्थक इस बात से भड़क गए कि उनका नाम इस सर्वे में नीचे आया।
उनका यही गुस्सा आगजनी और तीन लोगों की मौत की वजह बना। इस घृणित कृत्य के पीछे करुणानिधि के परिवार में चल रहा आपसी विवाद हो सकता है लेकिन खुलेआम तो एक मीडिया संस्थान को जला कर राख कर दिया गया, उसमें काम करने वाले तीन लोगों को जिंदा जला दिया गया था।
अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले और भी जगहों और और तरीकों से भी हो रहे हैं। अभी कुछ महीने पहले शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने 'सामना' में लिखे अपने संपादकीय में शिवसैनिकों को हुक्म दिया था कि जेम्स लेन की किताब - शिवाजी, हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया- की प्रति जहां कहीं भी मिले इसे जला दिया जाए और शिवसैनिकों के लिए तो बाला साहब का हुक्म पत्थर की लकीर होता है।
गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस किताब पर लगाए प्रतिबंध को हटा दिया था। इसक पहले संभाजी ब्रिगेड के लोगों ने जनवरी दो हजार चार में पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में घुसकर ऐतिहासिक महत्व के कई दस्तावेजों को नष्ट करने के अलावा संस्थान में तोड़फोड़ भी की थी। संभाजी ब्रिगेड का गुस्सा इस बात को लेकर था कि जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब में शोध में सहयोग देने के लिए लेखक ने इस संस्थान का आभार प्रकट किया था। संभाजी ब्रिगेड और हिंदू राष्ट्र सेना जैसे अनाम संगठनों को बाल ठाकरे के इस तरह के उकसाने वाले संपादकीय से बल मिलता है और वो मीडिया पर हमला करने का दुस्साहस कर पाते हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद उन्नीस में अन्य बातों के अलावा संघ के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (राइट टू फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन एंड स्पीच) का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन साथ ही संविधान अभिव्यक्ति की इस हद तक स्वतंत्रता प्रदान करता है जबतक कि वो दूसरों की आजादी का हनन न करे। लोग, यहां तक कि सरकारें भी इसी की आड़ में अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का यत्न करती है। जिसे बाद में अदालत बहुधा गैरजरूरी करार देती है। लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना गया है और सालों के अपने लंबे संघर्ष के बाद मीडिया ने अपना एक मुकाम हासिल किया है और लोकतंत्र के सजग प्रहरी के रूप में अपने को स्थापित भी किया है। लेकिन अपनी आलोचनाओं से नाराज होकर लोग कानून खुद हाथ में लेने लगे हैं या अपने समर्थों को उकसाने लगे हैं और मीडिया संगठनों को डराने धमकाने की कोशिश शुरू हो जाती है।
अब वक्त आ गया है कि मीडिया को खुद पर हो रहे हमलों के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए और संगठित होकर अपनी आवाज उठानी चाहिए। दिनामलार के न्यूज एडिटर पर हुए पुलिसिया जुर्म के खिलाफ सिर्फ कुछ पत्रकार संगठनों ने बयान जारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली लेकिन पत्रकारों को तमिलनाडु के फिल्मी सितारों से एक जुटता का सबक लेना चाहिए और सरकार पर सख्त कानून बनाने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए।






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