अनंत विजय
Thursday , November 19, 2009 at 11 : 04

तस्वीरों से बनता आपराधिक चरित्र


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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्ददेव भट्टाचार्या के मिदनापुर के दौरे के वक्त माओवादियों ने फिर से एक बार सरकार को खुली चुनौती दी और तीन लोगों को गोलियों से छलनी कर उनकी लाशें बीच सड़क पर फेंक दी। अपराध का तरीका भी वही। पहले उनके घर पहुंचे, बातचीत के लिए बाहर बुलाया फिर हथियारों के बल पर अगवा किया और बर्बरतापूर्वक कत्ल कर सरेआम सड़क पर फेंक दिया। बीच सड़क पर पड़ी इन तीन लाशों की तस्वीर देखकर दिल दहल गया। दिल तो उस दिन भी दहला था जब अक्तूबर में माओवादियों ने दिन दहाड़े पश्चिमी मिदनापुर के संकरैल पुलिस स्टेशन पर हमला कर दो पुलिस वालों को मौत के घाट उतार दिया था और थाने के अफसर इंचार्ज अतीन्द्रनाथ दत्ता को अगवा कर अपने साथ ले गए थे। उस वक्त संकरैल थाने की जो तस्वीरें आई थी उसमें सब इंसपेक्टर दिवाकर भट्टाचार्य की लाश कुर्सी पर इस तरह पड़ी थी जैसे वो ड्यूटी के वक्त बैठा करते थे।

इन दो तस्वीरों के अलावा अक्तूबर में ही माओवादियों के सरगना कोटेश्वर राव ने कुछ न्यूज चैनलों को इंटरव्यू दिए थे जिसमें उसके पीछे एके सैंतालीस लिए दो मुस्टंडे खड़े थे। ये तीन ऐसी तस्वीरें हैं जो माओवादियों के चरित्र को साफ तौर पर उभार कर सामने ला देती हैं। पहले की दो तस्वीरों में बर्बरता की पराकाष्ठा है और फिर कोटेश्वर राव की तस्वीर से ये सवाल खड़ा होता है कि आखिर माओवादियों के पास इतने खतरनाक हथियार कहां से आ रहे हैं। क्या ये हथियार विदेशों में बैठी भारत विरोधी ताकतें मुहैया करा रही हैं। इन हथियारों को खरीदने के लिए इनके पास पैसे कहां से आ रहे हैं। इन सवालों का जबाव माओवादियों के समर्थन में लेख लिखनेवाले विद्वान बुद्धिजीवियों के पास नहीं है।

अभी एक साप्ताहिक पत्रिका में विश्व प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति राय ने अपने जोरदार तर्कों और शानदार भाषा की बदौलत माओवादियों के आंदोलन को जन आंदोलन साबित करने की कोशिश की है। एक ऐसा आंदोलन जो आदिवासी अपनी परंपरा, अपनी विरासत और अपनी जमीन बचाने के लिए कर रहे हैं। अपने इस लंबे और सारगर्भित लेख में माओवादियों के आंदोलन को सही साबित करने के जोश में अरुंधति ने मीडिया से लेकर न्यायपालिका, सरकार से लेकर शासन तक को बिका हुआ करार दे दिया है, कहीं खुलकर तो कहीं इशारों-इशारों में। लेकिन अपने विद्वतापूर्ण लेख में अरुंधति ये भूल गईं कि वो स्थिति का सामान्यीकरण कर रही हैं। पूरे देश के अखबार और सभी न्यूज चैनल उनको बिके नजर आते हैं जो आदिवासियों के हितों पर पैसे को तरजीह देते हैं। सिर्फ फतवेबाजी से बात नहीं बनती है। वाक जाल में उलझाकर पाठकों को तो बांधा जा सकता है लेकिन बगैर किसी ठोस सबूत के देश की पूरी मीडिया को कठघरे में खड़ी करती हैं तो निसंदेह लेख और लेखक दोनों की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। बजाए फतवा जारी करने के अरुंधति को अपने तर्कों के समर्थन में कुछ तो उदाहरण पेश करने चाहिए थे। जिस तरह से उसके लेख में खदान मालिकों के बारे में कोई जनरलाइज्ड कमेंट नहीं है, वहां उन्होंने उदाहरण दिए हैं- तो उनकी बातों में वजन लगता है।

लेकिन माओवादियों के समर्थन में लिखे गए इस लेख को लिखते वक्त अरुंधति के सामने इस हिंसा के शिकार हुए लोगों के परिवारों के बिलखते चेहरे नहीं आए होंगे क्योंकि अगर आपने एक खास किस्म का चश्मा पहन लिया है तो आपको वही दिखाई देगा जो आप देखना चाहेंगी। अरुंधति को उड़ीसा के डोंगरिया कोंध की याद और उनका दर्द तो दिखाई देता है लेकिन माओवादियों की गोलियों के शिकार बने झारखंड के पुलिस इंसपेक्टर फ्रांसिस इंदुवर के परिवार का दर्द नहीं दिखाई देता। उसके छोटे बच्चे का वो बयान नहीं सुनाई दिया होगा जिसमें उसने बिलखते हुए कहा था कि मैं अपने पापा के हत्यारों से बदला लूंगा। अरुंधति को तो सिर्फ ये दिखता है कि पुलिसवाले आदिवासियों पर कितना अत्याचार करते हैं। क्या कभी किसी पुलिसवाले ने किसी भी माओवादी को उस बर्बर तरीके से कत्ल किया जिस तरह से गला रेत कर फ्रांसिस इंदुवर को मार डाला गया।

अरुंधति जैसे लोगों का तर्क है कि अपनी जमीन लुटती देखकर माओवादियों ने हथियार उठा लिए हैं। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह से परंपरागत हथियारों की जगह अति आधुनिक हथियारों ने ली है वो ना सिर्फ चौंकानेवाला है बल्कि गंभीर विमर्श की मांग भी करता है कि तीर धनुष की जगह एके सैंतालीस कहां से आ गई। कौन सी ताकतें माओवादियों को हथियारों के लिए फंड उपलब्ध करवा रही हैं। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि इनके सरगना कोटेश्नर राव की सुरक्षा में लगे लोगों के पास एके सैंतालीस हैं वैसे ही अत्याधुनिक हथियार संकरैल थाने पर हमला करनेवालों के हाथों में भी था जिसकी बदौलत उन्होंने वहां एक स्थानीय बैंक को लूटा था। सरकार को इन स्त्रोतों का पता लगाने और उसे बंद करने की जरूरत है।

अरुंधति ने अपने इस लेख में केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर भी जमकर हमला बोला है और उन्हें इस बात की भी तकलीफ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चिंदबरम की तारीफ क्यों की। किसी की नजर में कोई अगर अच्छा काम कर रहा है तो क्या तारीफ सिर्फ इसलिए नहीं की जानी चाहिए कि वो विरोधी दल का सदस्य है। ये वह मानसिकता है जो इस तारीफ को भी हिंदू फंडामेंटलिज्म से जोड़कर भ्रम फैलाता है।

अगर हम थोड़ा पीछ जाएं तो इस तरह के लेख और पत्र बुद्धिजीवियों ने लिखे हैं। 27 दिसंबर 1997 को महाश्वेता देवी ने भी पत्र लिखकर सीपीआई एमएल को बिहार में बदला लेने का आह्वाण किया था। उस वक्त भी महाश्वेता देवी के उस पत्र का खासा विरोध हुआ था। अब ये सारे लोग एक बार फिर से माओवादियों के समर्थन में खड़े हो गए हैं लेकिन इनमें से किसी भी बुद्धिजीवी ने फ्रांसिस इंदुवर, दिवाकर भट्टाचार्य और जयराम हासदा और लक्ष्मी दास की बर्बर हत्या के खिलाफ ना तो एक शब्द बोला और ना ही लिखा। साफ जाहिर है कि इनकी मंशा क्या है।

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