छह दिसंबर उन्नीस सौ बानवे में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के दस दिन बाद सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मनमोहन सिंह लिब्राहन की अध्यक्षता में 1952 में गठित जांच कमीशन एक्ट के तहत एक जांच कमीशन का गठन किया गया। इस कमीशन को तीन महीने के अंदर इस बात की पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट देनी थी कि ढांचे के गिराए जाने के पीछे किसका हाथ है और कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन विद्वान जज ने इस काम को तीन महीन के बजाए सत्रह साल में पूरा किया। इस बीच कई सरकारें आईं और गईं और सबने इस जांच कमीशन को अड़तालीस एक्सटेंशन दिए। इन सत्रह सालों में आयोग के कामकाज पर आम आदमी का दस करोड़ रुपया खर्च हुआ। सत्रह साल की मेहनत और करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आम आदमी को इस रिपोर्ट से कुछ हाथ नहीं लगा। जिन लोगों को यह उम्मीद थी कि इस रिपोर्ट से कुछ ठोस निकलकर आएगा उन्हें खासी निराशा हुई। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मनमोहन सिंह लिब्राहन को विवादित ढांचा गिराए जाने के जिम्मेदार लोगों का पता लगाने का काम सौंपा गया था लेकिन लगभग हजार पन्नों की सारगर्भित रिपोर्ट इस बारे में लगभग मौन है। बजाए दोषियों का पता लगाने और उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करने के जस्टिस लिब्राहन ने खुद ही अपना दायरा बढ़ाते हुए एक दार्शनिक की तरह समाज के हर क्षेत्र में सुधार की सिफारिश कर दी। लगभग हजार पन्नों की इस भारी भरकम रिपोर्ट में लिब्राहन ने छब्बीस पन्नों में प्रशासनिक और पुलिस सुधार, पुलिस राजनेताओं के नापाक गठजोड़, राजनीति का अपराधीकरण, राजनेताओं और धार्मिक नेताओं के गठजोड़ और राजनेताओं के साथ प्रशासनिक अधिकारियों के बढ़ते संबंधों पर रोक लगाने और उसे साफ सुथरा बनाने की सिफारिशें की है। जैसा कि उपर भी कहा जा चुका है कि इस कमीशन को अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने के पीछे के सच को उजागर करने का दायित्व सौंपा गया था लेकिन बजाए उसके लिब्राहन ने समाज में चल रहे अन्य गलत गतिविधियों पर अपना फोकस कर दिया। नतीजा सबके सामने है।
अपनी सिफारिशों में लिब्राहन ने एक अलग संविधान सभा बनाने की वकालत भी की है और कहा है कि अब वक्त आ गया है कि भारतीय संसद एक नए संविधान सभा का गठन करे जो संविधान की समीक्षा करे और पिछले साठ सालों में उसकी कमियों और खामियों पर विचार करे और इन कमियों को दूर करने का सुझाव दे। (172.19)। लिब्राहन ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ये सिफारिश की जिसे सरकार को इसे यह कर ठुकरा देना चाहिए कि ये बातें इस कमीशन के अधिकार क्षेत्र से बाहर की हैं लेकिन सरकार ने अपनी एक्शन टेकन रिपोर्ट में इसपर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि रिटायर्ड चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में एक कमीशन इस बात की जांच कर चुका है और केंद्र-राज्य संबंधों की जांच करने के लिए भी एक आयोग गठित किया जा चुका है जिसकी मार्च दो हजार दस में रिपोर्ट अपेक्षित है।
जस्टिस लिब्राहन सिर्फ संविधान की समीक्षा पर ही नहीं रुके बल्कि राष्ट्रीय एकता परिषद को भी संवैधानिक अधिकार देने की सिफारिश कर और कहा- कि अब वक्त आ गया है कि राष्ट्रीय एकता परिषद को संवैधानिक अधिकार दे दिए जाएं। या फिर कोई ऐसी ही अलग संस्था बनाई जाए जिसमें देशभर के अलग अलग धर्मों के विद्वान और मशहूर समाज सेवकों को शामिल किया जाए जिनका किसी राजनीतिक पार्टी से संबंध नहीं हो (172.4)। यहां जस्टिस लिब्राहन ने बगैर इस बात को ध्यान में रखे कि यह एक एडवायजरी बॉडी है जिसमें समाज के हर तबके के लोग शामिल किए जाते हैं, यह सिफारिश कर डाली जो पूरी तरह से अव्यावहारिक है। सरकार में बैठे लोगों ने भी यही तर्क देकर लिब्राहन की इस सिफारिश को ठुकरा दिया।
जस्टिस लिब्राहन इतने पर भी नहीं रुके और उन्होंने पत्रकारों के आचार व्यवहार को लेकर भी सिफारिश कर डाली -पैरा 173.3 में लिब्राहन ने यह चिंता जताई कि भारत में पीत पत्रकारिता पर अंकुश लगाने के लिए कोई संवैधानिक संस्था नहीं है। प्रेस काउंसिल को उतने अधिकार नहीं है कि वो गलत रिपोर्टिंग करनेवालों के दंडित कर सके। लिब्राहन की इच्छा है कि मेडिकल काउंसिल या फिर बार काउंसिल ऑफ इंडिया की तर्ज पर कोई एक स्थायी संस्था का गठन किया जाए जो कि संवाददाताओं और अखबारों और खबरिया चैनलों के खिलाफ गलत रिपोर्टिंग की जांच कर सके। इसके लिए लिब्राहन ने जोरदार शब्दों में इस बात की सिफारिश की है कि भारत में मीडिया के कामकाज पर नजर रखने के लिए एक संवैधानिक संस्था का गठन किया जाए और पत्रकारों को भी अन्य प्रोफेशनल्स की तरह लाइसेंस जारी किए जाएं और गलत पाए जाने पर उनके लाइसेंस निरस्त किए जा सकें। (177.5)
चूंकि सरकार को लिब्राहन की यह सिफारिश जंची इसलिए अपनी एक्शन टेकन रिपोर्ट में सरकार ने इस सिफारिश को सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस संस्था की आवश्यकता की संभावनाओं की तलाश के लिए अनुरोध पत्र भेजने की बात स्वीकार कर ली है। सिफारिश करते वक्त जस्टिस लिब्राहन ने ना तो कोई तर्क दिया और ना ही इसकी वजह बताई। सिर्फ इस आधार पर कि ऐसी कोई संस्था नहीं है इसलिए इस तरह की एक संस्था बनाई जानी चाहिए। लिब्राहन को यह भी पता लगाना चाहिए कि विश्व के किन-किन देशों में पत्रकारों को लाइसेंस देने का प्रावधान है। यहां यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या इसकी आड़ में सरकारें मीडिया की आजादी को जब चाहे तब दबा नहीं सकतीं। क्या जस्टिस लिब्राहन ने इन तमाम पहलुओं पर विचार किया और अगर विचार कर के ये सिफारिश की तो मामला और भी गंभीर है। क्या लिब्राहन मीडिया पर अंकुश लगाने के सरकार के सपने को साकार होते देखना चाहते हैं।
जस्टिस लिब्राहन यहीं पर नहीं रुके उन्होंने राजनीतिक जीवन में नैतिक मूल्य स्थापित करने के लिए भी कई सुझाव दे डाले। राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन का सुझाव देते हुए लिब्राहन ने कहा कि- अगर कोई राजनीतिक दल धर्म के आधार पर अपनी राजनीति चलाता हो या फिर उसके एजेंडे में धार्मिक उद्देश्य हो तो उसे बैन कर दिया जाना चाहिए। एक सैक्युलर राज्य की स्थापना के लिए यह जरूरी है कि जो व्यक्ति या दल धर्म और राजनीति का घालमेल करे उसपर चुनाव कानून के उल्लंघन का दोषी माना जाए और उसे अयोग्य करार दे दिया जाए। यहां भी लिब्राहन ने कोई नई बात नहीं कही है, पुरानी बात को नए और दार्शनिक अंदाज में पेश कर दिया है।
यूपीए सरकार लिब्राहन की सिफारिशों से खुश है क्योंकि अपनी कई सिफारिशों में लिब्राहन ने सरकार की लाइन को ही आगे बढ़ाया है और सरकार को अपने विरोधी दलों को घेरने के लिए हथियार मुहैया करवा दिया है।
अपनी एक सिफारिश में लिब्राहन ने कहा है कि अगर केंद्र सरकार को लगता है कि सूबे के किसी खास इलाके में कोई ऐसा अपराध होनेवाला है जिसका पूरे देश पर प्रभाव पड़ सकता है और जिसको रोकने में सूबे की सरकार या तो विफल रही है या फिर उसे रोकने में इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है तो केंद्र उस खास इलाके का प्रशासनिक कंट्रोल ले सकता है। यहां भी लिब्राहन ने इस बात की अनदेखी की है कि भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों को अलग-अलग अधिकार प्राप्त है। इसके अलावा इस तरह की आपात परिस्थितियों से निबटने के लिए अभी भी केंद्र सरकार के पास पर्याप्त अधिकार है, जरूरत पर्याप्त इच्छा शक्ति की है। संविधान में प्राप्त इन अधिकारों का केंद्र सरकार गाहै बगाहे बेजा इस्तेमाल करती रही है। क्या लिब्राहन केंद्र के हाथ में एक और हथियार देना चाहते हैं जिसी बिना पर वो राज्य सरकारों को जब चाहे तब डरा सकें। साथ ही लिब्राहन ने किसी खास भौगोलिक क्षेत्र का कंट्रोल लेने की बात की है। भारत के संघीय ढांचे में इससे कितनी दिक्कतें आ सकती हैं इस बारे में भी लिब्राहन को विचार करना चाहिए था।
दरअसल लिब्राहन आयोग की सिफारिशों में मनमोहन सिंह लिब्राहन की एक बेहतरीन दार्शनिक की भूमिका उभरती है जो समाज के हर क्षेत्र में आदर्श स्थिति देखना चाहता है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि जस्टिस लिब्राहन इस बात पर खामोश क्यों है कि जिस कमीशन को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी उसने सत्रह साल क्यों लगाए। आयोग की इतनी लंबी चली सुनवाई में टैक्स पेयर का जो दस करोड़ रुपया खर्च हुआ उसकी जिम्मेदारी किसकी है। आयोग पर जो जिम्मेदारी दी गई थी उसका पूर्ण निर्वहन के लिए कौन जिम्मेदार है। जिस अटल बिहारी वाजपेयी पर आयोग की रिपोर्ट में उंगली उठाई गई है उसको एक बार भी अपनी सफाई का मौका नहीं दिया जाना लिब्राहन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। कई लोगों का आरोप है कि जस्टिस लिब्राहन ने एक बार भी अयोध्या का दौरा नहीं किया अगर ये आरोप सही हैं तो यह बेहद गंभीर बात है कि बगैर मौक-ए-वारदात पर गए रिपोर्ट तैयार कर दी गई। पूरे समाज और देश को सुधारने का संदेश देनेवाली लिब्राहन को इस साधारण रिपोर्ट को लिखने में सत्रह साल लगे और दस करोड़ रुपये खर्च हुए उसे कोई भी रिसर्च स्कॉलर कुछ ही महीनों में लिख सकता था। जस्टिस लिब्राहन की यह रिपोर्ट आम जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है, जिसमें अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए दार्शनिक का चोला ओढ़ा गया है।














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