अनंत विजय
Tuesday , December 22, 2009 at 10 : 50

न्यायपालिका की साख का सवाल


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इन दिनों न्यायपालिका उन वजहों से चर्चा में है जिसने उसकी साख पर बट्टा लगाया। पहले गाजियाबाद के करोड़ों के पीएफ घोटाले में माननीय न्यायाधीशों पर सवाल खड़े हुए, उसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट के जज सौमित्र मोहन पर आरोप लगे और उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई। अब राज्यसभा के सभापति ने कर्नाटक के चीफ जस्टिस पी.डी. दिनाकरन के खिलाफ पचहत्तर सांसदों की उस याचिका को मंजूरी दी है जिसमें उनके खिलाफ महाभियोग की मांग की गई। न्यायिक इतिहास में यह तीसरा मौका है जब किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसके पहले जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया चली थी, लेकिन कांग्रेसी सांसदों के सदन से वॉक आउट करने के बाद ये प्रस्ताव गिर गया था। माननीय न्यायाधीशों पर इस तरह के इल्जाम से देश की जनता न्याय के मंदिर से विश्वास दरकने लगा है। भारत के लोगों की अपने देश की न्यायपालिका की ईमानदारी और साख पर जबरदस्त आस्था है। यही आस्था भारतीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करती है। लेकिन इस तरह के आरोपों से इस आस्था को ठेस लगती है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि न्यायाधीशों पर किसी भी तरह के आरोप लगाने से पहले ठोक बजाकर तथ्यों को पुख्ता कर लिया जाए।

अगर हम कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दिनाकरन पर लगे आरोपों की बात करें तो इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब उनको सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। उनके खिलाफ जो महाभियोग की अर्जी राज्यसभा के सभापति को सौंपी गई है, उसमें बारह आरोपों की एक लंबी फेहरिस्त संलग्न है। इन आरोपों के मुताबिक जस्टिस दिनाकरन पर आय के ज्ञात स्त्रोत से ज्यादा संपत्ति अर्जित करने के अलावा पांच हाउसिंग बोर्ड के प्लॉट आवंटित करवाने के साथ-साथ अपने और अपने रिश्तेदारों के नाम से अकूत संपत्ति अर्जित करने का आरोप है। दिनाकरन पर एक गंभीर आरोप यह है कि थिरुवल्लूर के कावेरीराजपुरम और वेल्लोर के अनाइपक्कम, मुलवॉय और पुवलई में उनके पास पांच सौ पचास एकड़ जमीन है। इस जमीन का मालिकाना हक खुद उनके, उनकी पत्नी और दो अन्य के नाम है। पांच सौ पचास एकड़ के अलावा जस्टिस दिनाकरन के पास थिरुव्ललूर जिले के तिरुतानी तालुका में और चार सौ चालीस एकड़ जमीन है, जिसमें से तीन सौ दस दशमलव तेरह एकड़ जमीन पट्टे पर ली गई है और बाकी के एकतालीस दशमलव सत्ताइस एकड़ सरकारी गैरमजरुआ ( पोरोमबोक) जमीन है। उनपर यह इल्जाम भी है कि तिरासी दशमलव तैंतीस एकड़ वैसी सरकारी जमीन पर कब्जा किया गया है, जिसे सरकार ने भूमिहीन गरीबों के बीच बांटे जाने के लिए चिन्हित किया था। खबरों के मुताबिक इलाके के जिलाधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को जो रिपोर्ट सौंपी उनमें इन तथ्यों की पुष्टि हुई है। माना यह जाता है कि इस रिपोर्ट के बाद ही कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट में उनके प्रमोशन को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया।

लेकिन जहां तक तमिलनाडु में सरकारी गैरमजरुआ ( पोरोमबोक) जमीन पर कब्जे के आरोप का सवाल है, उसे वहां अपराध नहीं माना जाता। यह एक सिविल मैटर है। दरअसल अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश राज ने मद्रास प्रेसिडेंसी में लैंड सेटलमेंट स्कीम लागू की थी क्योंकि उस वक्त सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण बेहद आम था। उस वक्त सरकारी जमीन पर कब्जे से निबटने के लिए द वेरिटेबल बोर्ड स्टैंडिंग ऑर्डर था जो अब रेवेन्यू स्टैंडिंग ऑर्डर कहलाता है। ब्रिटिश राज में अंग्रेजों ने जब अपने पांव जमाना शुरू किया तो राजे रजवाड़ों की जमीनों को सरकारी जमीन घोषित करने लगे। बाद में लैंड सेटलमैंट स्कीम लागू कर जमीन पर रहनेवाली जनता या फिर मालिकाना हक वाली जमीन को पट्टा भूमि के अंदर वर्गीकरण कर दिया गया। इसके अलावा दो और श्रेणियों में जमीन का वर्गीकरण हुआ- सरकारी गैरमजरुआ और बंजर या ऊसर भूमि। गैरमजरुआ जमीन वो थी जो आम जनता के काम आती थी जिसमें सामाजिक कार्य करने की छूट होती थी लेकिन अगर कोई व्यक्ति उसपर कब्जा करता था तो गांव में मौजूद तहसीलदार उसे बी मेमो जारी कर जबाव तलब करता था। लेकिन उस वक्त भी इस बात का ध्यान रखा जाता था कि वो जमीन आम जनता के काम आती थी या फिर बेकार पड़ी थी। अगर उसका कोई इस्तेमाल नहीं था तो मसला सिर्फ रेवेन्यू का होता था और इस गैरमजरुआ जमीन पर कर लगाकर उसके इस्तेमाल की इजाजत अतिक्रमण करनेवाले को दे दी जाती थी। लेकिन अगर उसका सार्वजनिक या सामाजिक कार्य के लिए उपयोग होता था तो उसपर से अतिक्रमण हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाती थी।

जस्टिस दिनाकरन के केस में ये जानना जरूरी है कि जिस गैरमजरुआ जमीन को कब्जाने का आरोप उनपर लगा है उसमें जिला प्रशासन ने मेमो जारी किया है या नहीं। अगर मेमो जारी किया है तो उस पर फाइन लगाकर उसे नियमित किया जा सकता है। लेकिन अगर उस जमीन का सार्वजनिक उपयोग होता था तो तो उसे खाली कराने के लिए जिला प्रशासन ने कोई कदम क्यो नहीं उठाया। आरोप लगानेवालों का तर्क यह है कि जस्टिस दिनाकरन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया को रुकवाया हुआ है। दरअसल तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में गैरमजरुआ सरकारी जमीन पर कब्जा करना आम है। लेकिन एक सूबे के हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस आम अतिक्रमणकारी नागरिक की तरह व्यवहार नहीं कर सकता। एक न्यायाधीश से उसके आचरण और व्यवहार में ईमानदारी के साथ संविधान और कानून के प्रति निष्ठा का सार्वजिन प्रदर्शन अपेक्षित है।

जस्टिस दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग की अर्जी में और भी कई संगीन इल्जाम हैं। इन आरोपों में से एक है - ऊटी और नीलगिरी जिले में दिनाकरन की अस्सी साल की सास एम.जी. परिपूर्णम के नाम से बेहद महंगे प्लॉट खरीदे गए जो उनकी आय के ज्ञात स्त्रोत से कहीं ज्यादा के हैं। इसके अलावा दिनाकरन पर अपने घरों की साज सज्जा पर भी बेशुमार खर्च करने का आरोप लगाया गया है। आरोपों की इस लंबी फेहरिश्त की जांच तो अब राज्यसभा के सभापति द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति करेगी जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और मशहूर न्यायविद शामिल होंगे। लेकिन कांग्रेस पार्टी की उदासीनता की वजह से यह लगता नहीं है कि दिनाकरन पर महाभियोग साबित हो पाएगा और उन्हें पद छोड़ना पड़ेगा।

जस्टिस दिनाकरन के पीछे लग रहे इन आरोपों का एक दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। खबरों के मुताबिक मद्रास हाईकोर्ट के कुछ वकीलों ने जस्टिस कन्नादासन के खिलाफ मुहिम चलाकर राज्य उपभोक्ता फोरम में उनकी नियुक्ति रुकवा दी थी। न्यायपालिका पर नजर रखनेवालों का कहना है कि वकीलों की उसी जमात ने दिनाकरन के खिलाफ भी मोर्चा खोला था। दूसरी बात ये कि मद्रास हाईकोर्ट में जिन लोगों ने दिनाकरन पर जमीन कब्जाने का केस किया है उसके याचिकार्ताओं के वकीलों ने भी दिनाकरन के खिलाफ मुहिम को जोरदार समर्थन दिया है। इन बातों में आंशिक सच्चाई भी है तो इसकी पूरी तफ्तीश की जानी चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा हो रहा है तो यह भारतीय न्यायिक प्रक्रिया को दबाब में लेने की कोशिश है जिसपर तत्काल रोक लगाने के लिए सरकार को आवश्यक कदम उठाना चाहिए। जस्टिस दिनाकरन पर लगे इल्जाम संगीन है, उसकी गंभीरता से जांच होनी ही चाहिए और होगी भी। लेकिन अगर इस केस में किसी खास समूह का कोई मोटिव नजर आता है तो उसकी जांच भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए ताकि देश की न्यायपालिका बगैर किसी दबाव के संविधान और कानून की रक्षा कर सके, ताकि देश की सवा करोड़ जनता की जो आस्था देश की न्यायिक प्रणाली में है वो अक्षुण्ण रह सके।

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