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अनंत विजय
Wednesday, January 06, 2010 at 17 : 24

मरने का हक क्यों नहीं…


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मुंबई के केईएम अस्पताल में छत्तीस साल से मौत की आगोश में सो रही अरुणा सौनवाग की वकील ने जब सुप्रीम कोर्ट में अपने क्लाइंट की ओर से इच्छामृत्यु की याचिका दायर की तो माननीय न्यायाधीशों ने उस याचिका को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। जब अरुणा के वकील ने अपनी याचिका से इच्छामृत्यु शब्द को हटाकर उसकी जगह अपने मुवक्किल की मरनासन्न हालत का हवाला दिया और उसकी दवाएं रोकने की इजाजत मांगी तब जाकर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकृत हुई। यह अपनी तरह का अकेला केस नहीं है। समय समय पर भारतीय न्यायपालिका के सामने इस तरह के केस आते रहे हैं। इन केसों का निबटारा भी होता रहा है लेकिन अभी तक हमारे देश में इच्छामृत्यु को कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं हो सका है। जब भी इस तरह की कोई याचिका दायर होती है तो इच्छामृत्यु को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ जाती है। ठीक उसी तरह अरुणा सौनवाग की इस याचिका के स्वीकृत होने के बाद एक बार फिर से इच्छामृत्यु पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। हालांकि हम अगर देखें तो हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में इच्छामृत्यु के कई उदाहरण मिलते हैं। सबसे बड़ा उदाहरण को महाभारत काल में भीष्म पितामह का ही है। भीष्म पितामह ने जब मरना तय किया तो उस वक्त सूर्य दक्षिणायण था और सनातन धर्म के मुताबिक जब सूर्य दक्षिणायण हो तो उस वक्त प्राण त्यागना अच्छा नहीं माना जाता। इस धार्मिक मान्यता को ध्यान में रखते हुए भीष्म पितामह ने मौत को वरण करने के पहले कई दिनों तक तीरों की शय्या पर अपनी मौत का इंतजार किया था। इसके अलावा जैन धर्म में तो इच्छामृत्यु की एक लंबी परंपरा रही है। साधुओं और साध्वियों के प्राणोत्सर्ग को एक उत्सव की तरह लिया जाता है और उसे धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है। जैन धर्म के अनुयायी संथारा या सल्लेखना की इस प्रक्रिया को तपस्या की पराकाष्ठा मानते हैं। उनके मुताबिक अगर कोई जैन साधक या साध्वी अपने प्राण त्यागना चाहता है तो यह तपस्या का सबसे उच्च बिंदु है और संथारा लेनेवाले को धर्म में अत्यधिक उच्च स्थान प्राप्त है। अभी-अभी प्रकाशित विलियम डेलरिंपल की किताब 'नाइन लाइव्स' में एक जैन साध्वी यह स्वीकार करती है कि सल्लेखना या मरना उनके लिए परम आनंददायक कर्म है।

धर्म और धार्मिक मान्यताओं में इच्छामृत्यु या फिर मर्सी कीलिंग को तो एक तरीके से मान्यता प्राप्त है लेकिन भारतीय संविधान और कानून में इसको अबतक मान्यता नहीं मिल पाई है। इच्छामृत्यु के संबंध में कई मामले देश की अन्य अदालतों में आ चुके हैं, जिसपर माननीय न्यायधीशों ने संविधान के अनुसार फैसला सुनाया है। इस मामले में सबसे अहम जजमेंट ज्ञान कौर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का जजमेंट है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में फैसाल सुनाते हुए कहा था- संविधान की धारा इक्कीस में जीवित रहने के अधिकार में मौत का अधिकार समाहित नहीं है। ठीक उसी तरह सम्मानपूर्वक जीवित रहने का अधिकार सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार नहीं देता। पांच जजों की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए यह भी कहा था कि किसी को भी इस तरह की मौत देने के लिए एक कानून की जरूरत है, जो कि ऐसे मामलों पर ना केवल नियंत्रण रखे बल्कि उसपर नजर भी रखे। जाहिर है फैसला सुनाते समय जजों के दिमाग में इसके बेजा इस्तामाल पर रोक लगाने की बात रही होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि अगर कोई भी वयक्ति या परिवार अपने किसी रिश्तेदार को इच्छामृत्यु या मर्सी कीलिंग में मदद करता है तो उसके खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा तीन सौ नौ के तहत आत्महत्या करने के लिए उकसाने और मदद करने का आरोप लगेगा।

लेकिन एक और केस में इच्छामृत्यु को आत्महत्या से अलग बताया गया है। जस्टिस लोढा ने नरेश मारुतराव शेखरे बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में अपने एक लैंडमार्क जजमेंट में इच्छामृत्यु को आत्महत्या से अलग करार दिया था। जस्टिस लोढ़ा के फैसले के मुताबिक आत्महत्या और मर्सी किलिंग दोनों अलग-अलग हैं। उनके मुताबिक आत्महत्या बगैर किसी के सहयोग के किया जानेवाला कृत्य है जिसमें मरनेवाला खुद अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला लेता है। वहीं इच्छामृत्यु या मर्सी कीलिंग में किसी के मरने का फैसला उसके परिवार के लोग या फिर नजदीकी रिश्तेदार डॉक्टरों की सलाह के आधार पर लेते हैं। यह दोनों अवधारणा तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर भी अलग-अलग हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में इच्छामृत्यु पर सरकार और न्यायपालिका भी थोड़ी नरम दिखाई पड़ने लगी है और उस दिशा में भी सोचविचार शुरू हो गया है। इस साल जनवरी में केरल लॉ रिफॉर्म कमीशन ने केरल टरमिनली इल पेशेंट्स (मेडिकल ट्रीटमेंट एंड प्रोटेक्शन ऑफ प्रैक्टिशनर्श एंड पेशेंट्स) बिल का प्रस्ताव किया। इस बिल में बेहद दयनीय हालत में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे गंभीर रूप से बीमार मरीजों, जिनके बचने की उम्मीद लगभग ना के बराबर हो और वो सिर्फ दवाओं और चिकत्सकीय उपकरणों के सहारे जीवित हों, को डॉक्टरों और रिश्तेदारों की सहमति से दवाएं रोककर और मेडिकल उपकरण हटाकर दयनीय जिंदगी से मुक्त करने की वकालत की गई है। केरल लॉ रिफॉर्म कमीशन के चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वी आर कृष्ण अय्यर इच्छामृत्यु की जोरदार वकालत करते नजर आते हैं और कहते हैं कि जीवन पवित्र है लेकिन असह्नीय दर्द और पीड़ा, जिससे छुटकारा की कोई उम्मीद नहीं, किसी के जीवित रहने पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा देता है। यहां जस्टिस अय्यर के विचारों से असहमत होने का कोई कारण नजर नहीं आता। अगर कोई गंभीर रूप से बीमार हो और जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए उसका बचना नामुमकिन हो तो उसके परिवार या रिश्तेदार को यह अधिकार होना चाहिए कि उसे मुक्त करने का फैसला लिया जा सके।

लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने भी दो हजार आठ में अपनी रिपोर्ट में इच्छामृत्यु के पक्ष में अपनी राय जाहिर की थी। रिपोर्ट ने संविधान में प्रदत्त जीवित रहने के अधिकार की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी भी वयक्ति की प्राकृतिक मौत तक उसे सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है। इस की व्याख्या करते हुए लॉ कमीशन ने सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार में सम्मानपूर्वक मरने के अधिकार को भी शामिल माना। लेकिन उस रिपोर्ट में यह बात साफ की गई थी कि इस अधिकार में अप्राकृतिक मौत कतई नहीं है। इसमें साफ तौर पर यह व्याख्यायित किया गया कि अगर कोई व्यक्ति बेहद बीमार है और उसके जीने की उम्मीद बिल्कुल क्षीण हो चुकी है, लेकिन मरने के पहले वो असह्नीय तकलीफ और दर्द से गुजर रहा है तो उसे इससे मुक्ति के लिए मौत की प्रक्रिया को तेज करने की इजाजत दी जा सकती है। क्योंकि यह प्रक्रिया किसी की जान लेना नहीं है बल्कि सिर्फ सम्मानपूर्नक मरने की प्रक्रिया का एक हिस्साभर है।

इच्छामृत्यु पर ना केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में बहस चलती ही रहती है। विदेशों में तो अब भी इस विषय पर गहन विचार-विमर्श जारी है। लेकिन अबतक सिर्फ नीदरलैंड में इच्छामृत्यु को कानूनी जामा पहनाया जा चुका है और वहां मर्सी कीलिंग कानूनन जायज है। नीदरलैंड में इस काम के लिए मौत के मुहाने पर खड़े मरीज का डॉक्टर एक अन्य डॉक्टर की मदद लेता है और गंभीर यंत्रणा झेल रहे मरीज को उसके परिवार या रिश्तेदार की सहमति के आदार पर जिंदगी से मुक्त कर देता है। चूंकि इस काम में डॉक्टरों की मदद ली जाती है इसलिए डॉक्टरों के इस कृत्य पर वहां विशेषज्ञों में दो राय है। एक वर्ग डॉक्टरों की यह कहकर आलोचना करता है कि यह डॉक्टरी पेशे के खिलाफ है। उनका तर्क है कि पेशा शुरू करने के पहले डॉक्टरों को एक शपथ दिलाई जाती है जिसमें उन्हें यह वादा करना पड़ता है कि- किसी को खुश करने के लिए मैं कोई ऐसी दवा नहीं लिखूंगा जिससे किसी मरीज की जान जाए या फिर कोई ऐसा काम नहीं करूंगा जो किसी मरीज की मौत का कारण बने। इस शपथ के आधार पर ही मर्सी कीलिंग में मददगार बबनेवाले डॉक्टरों की आलोचना होती है। तो यह एक ऐसा विषय है जो दुधारी तलवार की तरह है, जिसपर बेहद सावधानीपूर्व चलने की जररूत है। भारत में सरकार को चाहिए कि इस विषय पर एक ड्रॉफ्ट पेपर तैयार कर राष्ट्रव्यापी बहस करवाई जाए और जो कुछ ठोस निकले उसपर अमल किया जाए। क्योंकि अब हमारे यहां भी वक्त आ गया है कि इच्छामृत्यु पर सरकार कोई फैसला ले क्योंकि अरुणा सौनवाग जैसे कई मरीज सालों से अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं और उनके इस इंतजार में उनके रिश्तेदार भी हर रोज मर रहे हैं।

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