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अनंत विजय
Tuesday , March 09, 2010 at 14 : 01

हुसैन पर विधवा विलाप क्यों


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दुनियाभर में मशहूर कूची के जादूगर मकबूल फिदा हुसैन के कतर की नागरिकता स्वीकार करने पर देशभर में कुछ चुनिंदा वामपंथी सैक्युलर लेखकों और कार्यकर्ताओं ने हो हल्ला मचाया। हुसैन के भारत छोड़ने को इन परम सैक्युलरवादियों ने अभिवयक्ति की आजादी से जोड़ दिया। उन्हें लगने लगा कि भारत ने यह नायाब हीरा देश में संघ और उससे जुड़े अतिवादी हिंदुओं की वजह से खो दिया। वो इस बात को लेकर चिंतित दिखाई दिए कि हुसैन का विरोध इसलिए हो रहा है कि वो एक मुसलमान हैं। हुसैन के विरोधियों की इस बात के लिए भी लानत मलामत की गई कि वो कौन होते हैं यह कहने वाले कि हुसैन पैगंबर की तस्वीर बना कर दिखाएं। तर्क यह कि एक कलाकार को इस बात की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वो जो चाहे उसे चित्रित करे। लेकिन हुसैन के इस्लाम से संबंधित कोई भी चित्र नहीं बनाने से तथाकथित सैक्युलरवादियों का यह तर्क कमजोर होता है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि कुरान इस बात कि इजाजत नहीं देता कि किसी भी वस्तु या व्यक्ति का चित्रण हो। लेकिन सवाल यह उठ खडा़ होता है कि क्या एक कलाकार की अभिव्यक्ति पवित्र कुरान और इस्लाम की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता।

जबतक भारत में इन सवालों पर बहस होती या फिर कला और कलाकार के पक्ष में खड़े होने का दंभ भरनेवाले प्रगतिवादी-जनवादी लेखक विरोध का डंडा-झंडा संभालते हुसैन के एक इंटरव्यू ने उसकी हवा निकाल दी। हुसैन ने कतर से दिए एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि उनके भारत छोड़ने की वजह कुछ और भी है। हुसैन ने माना कि भारत में उनका रहना मुमकिन नहीं था लेकिन इसके बाद जो बात हुसैन ने कही उसपर तो छातीकूट अभियान चला रहे इन प्रगतिवादियों के पांव तले से भी जमीन खिसक गई। हुसैन ने अपने साक्षात्कार में कहा कि वो तीन मुख्य प्रोजेक्ट पर काम करना चाहते थे- पहला मोहनजोदाड़ो से लेकर मनमोहन सिंह तक के भारतीय सभ्यता का इतिहास, बेबीलोन और विश्व की दूसरी अन्य सभ्यताओं का इतिहास और भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों का इतिहास। हुसैन ने माना कि भारत में इन प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए उनको प्रायोजक नहीं मिल रहे थे। इसलिए जब कतर के शेख मोज़ा ने उनकी इस योजना को प्रायोजित करने की इच्छा जताई तो वो मना नहीं कर सके। मकबूल फिदा हुसैन ने यह भी माना कि भारत में कला के लिए उचित माहौल नहीं है लेकिन उसके पहले प्रायोजक नहीं मिले की बात कहकर हुसैन ने अपनी असली परेशानी जाहिर कर दी। इसके अलावा हुसैन ने जो एक बात और साफगोई से मानी वो यह कि भारत में टैक्स का ढांचा बेहद जटिल और परेशान करनेवाला है और यह भी उनके देश छोड़ने की वजहों में से एक है।

हुसैन के इन बयानों से यह साफ हो गया कि हुसैन ने अतिवादियों से परेशान होकर तो भारत छोड़ा लेकिन उनकी परेशानी की वजह सिर्फ उनकी अभिवयक्ति की आजादी पर हमला नहीं था। अगर सिर्फ यह वजह होती तो हुसैन भारत जैसे सहिष्णु समाज को छोड़कर कतर जैसे कट्टर देश को नहीं चुनते। भारत में हुसैन को मुट्ठी भर लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा था, कमोबेश वो अपनी कलाकृतियों में अपनी जादुई कूची का रंग भर सकते थे लेकिन कतर में वो सिर्फ एक दरबारी पेंटर भर होकर रह जाएंगे। अगर हुसैन को भारत में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं मिल रही थी और वो भगवा ब्रिगेड की गुंडागर्दी से परेशान थे तो कतर में उन्हें कौन सी आजादी मिलेगी। भारत में जितने हुसैन के विरोधी हैं उनसे ज्यादा उनके समर्थक हैं। लेकिन पैसे और व्यावसायिक कारणों से हुसैन ने भारत को छोड़ने का फैसला लिया और उसे अभिव्यक्ति की आजाजदी से जोड़ने का खेल खेला गया। अब कतर में हुसैन मजे में हिंदू देवी देवताओं के नंगे और शर्मसार करनेवाले चित्र बेखौफ होकर बना पाएंगे , वहां के शासकों के पसंद का ख्याल रखेंगे। लेकिन क्या हुसैन वहां रहकर कतर के शासकों के चित्र में प्रयोग कर पाएंगे। क्या कतर की खूबसूरत औरतों में उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी दिखाई देगी। क्या वहां के समाज की रूढ़िवादिता पर हुसैन की कूची चल सकेगी। या फिर भारी भरकम रकम के नीचे एक कलाकार की कला दब कर रह जाएगी।

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनपर भारत के बयानवीर लेखकों को विचार करना चाहिए। दरअसल मार्क्स के इन आधुनिक चेलों को मार्क्सवाद ने हर चीज को देखने की एक नई दृष्टि तो दी लेकिन उनकी दूसरी आंख से सचाई देखने की दृष्टि छीन ली। वो हर चीज को अब मार्क्सवाद के लाल चश्मे से देखने लगे। तस्लीमा का मामला अभी ताजा है। कर्नाटक के एक अखबार ने तस्लीमा के पुराने लेख को छाप दिया। जिसपर वहां कई जिलों में जमकर हिंसा हुई, विरोध इतना बढ़ा कि पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें दो लोगों की जान चली गई और लाखों की संपत्ति का नुकसान हुआ। विरोध बढ़ता देखकर कर्नाटक सरकार ने आनन-फानन में तस्लीमा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया। जबकि तस्लीमा यह सफाई दे चुकी थी कि उन्होंने कन्नड़ के अखबार के लिए कोई लेख लिखा ही नहीं था। हुसैन के भारत छोड़ने पर बुक्का फाड़कर विलाप करनेवाले इन प्रगतिवादियों को तस्लीमा पर हो रहा अत्याचार नहीं दिखाई दे रहा। दरअसल मार्क्स के इन चेलों ने सबसे आधुनिक होने का दावा करनेवाले इस वाद को उतना ही भ्रष्ट किया है जितना हिंदू धर्म को पोंगा पंडितों ने। इन कथित मार्क्सवादियों के दोहरे रवैये की वजह से ही हिंदुओं, जो कि साधारणतया सहिष्णु होते हैं, के मन में भी यह सवाल उठने लगता है कि बुद्दिजीवियों का एक वर्ग सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ ही सेकुलर क्यों होता है। प्रगतिशीलता का ताना-बाना धारण किए इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि अगर वो हिंदुओं का विरोध नहीं करेंगे तो वो ना तो प्रगतिशील रह पाएंगे और ना ही सेकुलर।

अंत में इतना कहना चाहता हूं कि हुसैन ने अपने इंटरव्यू में यह भी कहा कि भारतीय संविधान सिर्फ एक कागज का टुकडा़ है। अगर किसी भी देशवासी के मन में उसके संविधान को लेकर इतनी ही इज्जत है तो फिर वो देश छोड़कर जाए या रहे कोई फर्क नहीं पड़ता।

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