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अनंत विजय
Sunday , August 03, 2008 at 20 : 19

जादुई यथार्थवादी पत्रकार की परेशानी


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आजकल एक खास फैशन चलन में है। फैशन के बारे में आपको थोड़ी देर में बताता हूं उससे पहले ये बता दूं कि इस इस फैशन का जादू किनके सर चढ़कर बोल रहा है। ये इसी दुनिया के जीव हैं, यकीन मानिए एलियन तो नहीं ही हैं, न ही ये यू ट्यूब से निकाले गए हैं, न ही ये डेस्क पर क्रिएट किए गए हैं।

ये हमारे आपके बीच के हैं। इनका वास्ता भी उन्हीं चीजों से पड़ता है जिनसे आपका और हमारा पड़ता है। ये भी हर रोज सुबह साढ़े नौ बजे और तीन बजे परेशान भी होते हैं,इनको भी खबर चाहिए होती है। लेकिन इनकी परेशानी जरा हट के होती है। ये इस बात से परेशान होते हैं कि अब इस देश में प्रधानमंत्री को भाव नहीं दिया जा रहा है,केंद्रीय मंत्री की कोई नहीं सुन रहा, मुख्यमंत्री अगर कोई बयान देते हैं तो उसे खबर नहीं माना जाता, सर्वहारा की सुनने वाला कोई नहीं है, कोई नेता अगर कुछ बोल देता है तो उसे खबर क्यों नहीं बनाया जाता है।

ये इसको पत्रकारिता का पतन या पतित काल मानते हैं और अपने साथियों को इस पतित काल पर प्रवचन देते रहते हैं। तरह-तरह के तर्कों से ये साबित करने में लगे रहते हैं कि आज पत्रकारिता के नाम पर जो हो रहा है वो इस पवित्र पेशे को धंधा बना रहा है। पवित्रता पर बाजार के आक्रमण को जी भर कर गरियाते हैं। इन्हें इस तरह के बौद्धिक मैथुन में एक खास किस्म के आनंद की प्राप्ति होती है। ये काम ये कभी भी कहीं भी करते हुए पाए जाते हैं। इन्हें तो बस अवसर की तलाश रहती है। इन्हें लगता है कि इस क्रिया के बाद उनका रसूख कुछ और बढ़ गया है, साथियों पर बौद्धिक होने का आतंक भी कायम हो गया है।

चलिए अब आपको ज्यादा इंतजार नहीं करवाते हैं और बता देते हैं - ये हैं कुछ अखबारों और टीवी के वो पत्रकार जिन्हें लगता है कि पत्रकारिता का पतित काल आ गया है। खबर की जगह चैनलों में भांडगीरी हो रही है। अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर ऐसी खबरें छप रही हैं जो खबर नहीं है। अखबारों में पिछले पन्ने की खबरें पहले पन्ने पर आ गई है। सबकुछ ऐसे लोगों के हाथ में चला गया है जिनको न तो पत्रकारिता की समझ है और न ही पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास और परंपरा की समझ। ये खबरों के साथ होने वाले सलूक का रंडी रोना रोज रोते हैं। उन्हें लगता है कि अब पत्रकारिता के नाम पर धर्म कर्म, जादू टोना, मारपीट, सेक्स और लुगदी साहित्य की भरमार हो गई है।

इनकी परेशानी राखी, राम और राजू यानी की तीन आऱ को लेकर भी है, वो इस बात पर खासे खफा हैं कि इन तीन आर को खबरिया चैनलों में इतना भाव क्यों दिया जा रहा है। राजू श्रीवास्तव जैसे मसखरे को टीवी चैनल वाले इतना क्यों दिखाते हैं। राखी सावंत अगर कुछ भी करती है, जो वो अमूमन हर दिन कर ही डालती हैं, तो उसे इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है।

राम के बारे में अबतक देश की अदालत कुछ तय नहीं कर पाई है लेकिन खबरिया चैनल हैं कि राम के परिवार उनके जन्म स्थान से लेकर इनका पुष्पक विमान तक सबकुछ तलाश ले रहे हैं। न सिर्फ तलाश ले रहे हैं बल्कि सबकुछ बता देने के लिए घंटो तक तमाम तरह के दंद फंद के साथ टीवी स्क्रीन पर मौजूद भी रहते हैं। इन बातों से ये जादुई यथार्थवादी पत्रकार बेहद परेशान हो जाते हैं। परेशानी के आलम में करवटें बदलते बदलते अचानक रिमोट से एसी ऑन कर देते हैं। चिंता में कब आंख लग जाती है पता ही नहीं चलता।

चिंता करते करते परेशानी में सोए हैं, जाहिर है ख्वाबों में भी यही सब आ रहा है। सपने में सबसे पहले आते हैं भगवान राम, लेकिन उन जैसा ही एक साथी भी अचानक सपने में आता है और कहता है कि राम को भुनाकर बीजेपी सत्ता में आ गई, ये बात तो समझ में आती है, लेकिन अब न्यूज चैनल राम को इतना दिखाकर क्या हासिल करना चाहते हैं, क्या ये निरी भक्ति है या फिर कुछ और।

जवाब नहीं मिलता है और सपने का दृष्य बदल जाता है और राम की जगह राजू श्रीवास्तव लतीफा सुनाते हुए आते हैं लेकिन इस जादुई यथार्थवादी पत्रकार को जोरदार हंसी आती है और वो ठहाका लगाकर हंसने लग जाते हैं, फिर अचानक से उनका वही साथी दिखाई देता है और पूछ लेता है कि अरे तुम तो राजू के लतीफो पर हंस रहे हो, अचानक पत्रकार महोदय का चेहरा धीर गंभीर हो जाता है और गंभीरता के आवरण से कछुए की तरह मुंह निकाल कर अपने साथी को लगभग डांटते हुए कहते हैं कि राजू को सुनकर हंसी नहीं आ रही बल्कि ये सोचकर हंसी आ रही कि खबरिया चैनल में काम करनेवाले मित्रगण इसको इतना भाव क्यों देते हैं। क्यों कर इनको एयर टाइम देते हैं। किसी तरह समझा बुझाकर अपने दोस्त को विदा करते हैं और फिर करवट बदल कर राजू और राम की सोच से मुक्त होने की कोशिश में जुट जाते हैं। लेकिन राम और राजू को निबटाकर जैसे ही चैन की नींद लेते हैं कि अचानक से बलखाती इठलाती राखी सपने में आ जाती है। इठलाती हुई आइटम गर्ल राखी को सपने में देखकर यथार्थ और ख्बाब का जबरदस्त संघर्ष होता है।

आखिरकार यथार्थ पर ख्बाव बारी पड़ता है और भाई साहब राखी के ख्बाबों में डूब जाते हैं। लेकिन फिर वही दुष्ट मित्र सपने में आता है और सवाल कर डालता है कि खबरिया चैनलों में राखी को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है। ख्वाब में खलल से परेशान भाई साहब की चिंता इतनी बढ़ जाती है कि बौद्धिक स्खलन होते-होते बचता है और नींद खुल जाती है। जैसे ही नींद खुलती है तो अपने खाकी निकर में बाथरूम की ओर भागते हैं, दोपहर की एडिट मीटिंग में जाने की तैयारी करनी जो करनी थी। लेकिन जब घर से निकलते हैं तो यथार्थ का लाल चोला पहनकर दफ्तर जाने के लिए निकलते हैं, क्योंकि भाइयो चाहे जो भी हो अगर आपके विचार लाल नहीं तो आप बौद्धिक नहीं।

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