देश में आम चुनाव खत्म हो चुके हैं। इन चुनावों में पूरे देश में मुद्दे भले ही अलग-अलग रहे हों पर एक बात लगभग सारे देश में एक जैसी ही रही कि वोटरों ने अपने घरों से निकल कर पोलिंग बूथ तक जाने में कम रुचि दिखाई। इसकी वजह मौसम को बताया गया। नेताओं और अभिनेताओं की लाख कोशिशों के बावजूद वोट प्रतिशत नहीं बढ़ा। कई जगहों पर तो ये पिछले चुनावों से भी कम हो गया। फिल्मी सितारों की अपीलें और प्रियंका गांधी जैसी युवा नेता की विनती भी वोटरों को पोलिंग बूथ तक नहीं ला पाई। शायद अब समय कुछ नया सोचने का है।
क्यों न ई-वोटिंग पर विचार किया जाए। कई देशों में तो ई-वोटिंग शुरू भी हो चुकी है। इंटरनेट की बढ़ती लोकप्रियता ने ई-डेमोक्रेसी के कॉन्सेप्ट को जन्म दिया है। इंग्लैंड में 2007 के निकाय चुनावों में वोट डालने के लिए परम्परागत तरीके के अलावा ई-वोटिंग का भी सहारा लिया गया। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने 65 अलग-अलग जगहों पर 300 लैपटॉप और कंप्यूटरों की व्यवस्था करवाई। इन लैपटॉप और कंप्यूटरों का इस्तेमाल लोगों ने साइबर कैफे की तर्ज पर किया। वहां पर पहुंचकर लोगों ने अपना वोट एक क्लिक के जरिये ज्यादा आसानी से दिया। इंग्लैंड के अलावा स्वीडन,नीदरलैंड और स्वीट्जरलैंड में भी वोट डालने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू हो चुका है।
अमेरिका में पिछले दिनों हुए राष्ट्रपति चुनावों में बराक हुसैन ओबामा 'लेट्स ब्रिंग द चेंज' के नारे के साथ चुनावो में उतरे। कई अन्य बदलावों के अलावा उनकी टीम ने इंटरनेट तकनीक को भी तेज विकास और परिवर्तन का जरिया बनाया। युवाओं को रिझाने के लिए ओबामा की टीम ने ऑनलाइन कैंपेनिंग की। ओबामा एक कैंडिडेट के तौर पर फेसबुक,माई स्पेस और लिंक्ड इन जैसी साइट्स पर हमेशा मौजूद रहे। यहां तक कि उन्होंने पार्टी के लिए 600 मिलियन डॉलर चंदा भी ऑनलाइन इकठ्ठा किया।
ऐसा नहीं है कि इन सबसे हमारे देश के नेता अंजान है। इन आम चुनावों में लगभग हर राष्ट्रीय पार्टी ने प्रचार के लिए इंटरनेट का सहारा लिया है। भारतीय जनता पार्टी के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी से लेकर विजय कुमार मल्होत्रा तक ने अपनी बात जनता के सामने रखने के लिए अपनी साइट्स लॉन्च की। उधर,कांग्रेस की शीला दीक्षित ने भी बड़े शहरों में रह रहे युवा वोटरों तक पहुंचने के लिए इंटरनेट के महत्व को समझा। यू-ट्यूब जैसी फेमस साइट्स पर पार्टियों और नेताओं के फुटेज देखे जा सकते हैं।
यानी 2009 के आम चुनावों में एक खास वर्ग तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा है,लेकिन इंटरनेट के जरिये वोट डालना कब तक शुरू होगा? ये एक सवाल है जिसे अपने मतदान अधिकार क्षेत्र से दूर रह रहे मतदाता जानना चाहते हैं। क्या ये अगले आम चुनावों तक संभव हो पाएगा?
जानकारों का मानना है कि हमारे देश में अगर ऑन लाइन वोटिंग शुरू होती है तो उसका लाभ कम से कम 20 फीसदी लोग उठा सकेंगे। तो जब एक-एक वोट मायने रखता है तो 20 फीसदी से तो राजनैतिक समीकरण ही बदल जाएंगे। वर्तमान परिदृश्य में जब वोटरों का एक खास तबका एसी की ठंडक छोड़ धूप में बाहर आकर वोट डालना नहीं चाहता तो क्यों न इंटरनेट के जरिए उनके घरों तक पहुंचकर उनका वोट ले लिया जाए। इस सुविधा के शुरू होने से एनआरआई, सैनिक और अपने होम टाउन से दूर रह रहे लोग भी वोट अधिकार का इस्तेमाल कर पाएंगे। तो नेतागण कृपया, जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगना छोड़ थोड़ा ध्यान तकनीक पर भी दीजिए। शायद परिदृश्य बदल जाए।






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