एक अनाम शायर की...मेरी पसंदीदा नज़्म....उन दोस्तों के नाम जो जिंदगी की आपाधापी में जीना भूल गये हैं......
ये किस खामोश जिंदगी से बस उलझे रहे साल भर तुम.....
किसी दिन तो तेज़ लय और थाप पे रक़्स किया होता
किसी सुबह तो ओस से भीगी घास पर चले होते
किसी दिन तो पहाड़ों पर जाके,
तेज़ बर्फीली हवाओं का मिज़ाज पूछा होता,
किसी शब तो निकलते चांद के नाम,
जाम पिया होता
किसी रात तो देर गये डूबते तारों का मातम भी मनाया होता
किसी रोज़ नर्म साहिल के हवाले,मौज-ए-दरिया से इश्क किया होता
कहर-आलूद समंदर से आंख मिलाई होती,
किसी शाम तो वो झील में
डूबते आफताब का गोला हाथ में उठाया होता
गई बारिश की रुत में रूह के अंदर तक भीगे होते
किसी जाबांज़ परिंदे के परवाज़ से चाल मिलाई होती
किसी तारों भरी खामोश रात की तह नापी होती
किसी रोते हुए बच्चे की आंखों चूमा होता
किसी जंग-ए-हक में जिस्म से खून बहाया होता!
ये किस खामोश जिंदगी से बस उलझे रहे साल भर तुम.....














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