फरवरी, 2010
माई नेम इज खान को लेकर जिस तरह का बवाल शिवसेना ने शुरू किया है। वो दरअसल सिर्फ फिल्म का विवाद नहीं है बल्कि ये तो बहाना है। असली मकसद तो शिवसेना को अपनी खोई जमीन तलाश करना है। नफरत की राजनीति को एक बार फिर से चमकानी है। लेकिन जिस तरह की किचकिच से बार-बार मुंबईकर, मराठी आदमी और देश के बाकी लोग परेशान हो रहे हैं। आखिर उसका इलाज क्या है? क्या मुंबई के लोग और महाराष्ट्र के लोग हमेशा शिवसेना की दहशत में जीने को मजबूर रहेंगे? क्या सरकार कोई कड़े कदम उठाएगी? एक बात तो साफ है कि सरकार कोई सख्त कदम नहीं उठा पाएगी। इसके राजनीतिक कारण ये हैं कि जिस शिवसेना को लोगों ने चुनाव में कोई भाव नहीं दिया। कांग्रेस को डर है कि अगर एक बार कड़ी कार्रवाई कर दी गई तो मराठी और दूसरे मुद्दों को हवा देकर शिवसेना मराठी....









