जून, 2009
शैलेंद्र जी के बारे में लिखने की बिल्कुल ही इच्छा नहीं थी क्योंकि मुझे मालूम है कि जैसे-जैसे यादों की चाहरदीवारी में घुसने की कोशिश करूंगा, मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं पाऊंगा... कभी वो अपनी लिखी गजलों और नज्मों को सैकड़ों हजारों बार गुनगुनाकर सुनाए होंगे। अब मैं उनके द्वारा सौंपी गई किताब की पहली प्रति में लिखी गजलों और नज्मों को कई-कई बार पढ़ रहा हूं। शुक्रवार (18 मई) देर रात साढ़े तीन बजे जब शारदा हॉस्पीटल के एक कर्मचारी ने मुझे फोन पर बताया कि शैलेंद्र जी का एक्सीडेंट हो गया है, वो भी ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस हाईवे पर तो दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया... बार बार ये सवाल उठने लगे कि आखिर रात के साढ़े तीन बजे वो ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर क्या कर रहे थे... लेकिन मन में कहीं न कहीं शैलेंद्र जी की लिखी नज्म ही याद आ रही थी। \"मैं....









