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हरीश चंद्र बर्णवाल
Friday , October 10, 2008 at 16 : 36

कहीं सठिया तो नहीं गए


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न सास बहू सीरियलों जैसा तामझाम, न विजुअल इफेक्ट्स, न कानफाड़ू साउंड की कारीगरी, न कैमरा मूवमेंट, जूम इन जूम आउट का कोई खेल नहीं और फिर भी देश का नंबर वन सीरियल! न सेक्स से सराबोर आधुनिक जीवन शैली, न पश्चिमी सभ्यता के सपने दिखाने का अंदाज, न प्रचार का भोंडा तरीका, लेकिन फिर भी देश का नंबर वन सीरियल! कहीं लोग सठिया तो नहीं गए?

मैं बात कर रहा हूं कलर्स पर आने वाले सीरियल बालिका वधू की...जिसमें न तो एकता कपूर का घटिया अंदाज दिखेगा और न ही आधुनिक पौराणिक कथाओं की झलक। ऐसे में यही सवाल उठता है कि एक क्रूर सचाई पर आधारित बालिका वधू सीरियल आज देश का नंबर एक सीरियल कैसे हो गया? सादा जीवन, सादे लोग, सादगी भरा परिवेश यही सब कुछ तो है बालिका वधू में। फिर ये सोचकर आश्चर्य नहीं होता कि लोगों ने इसे नंबर वन कैसे बना दिया? क्या लोग पागल हो गए या फिर कलर्स वालों ने टीआरपी मीटर में सेंध लगा दी।

वैसे मेरी राय ये है कि अगर आप ये सीरियल एक दो बार ही देख लें तो सब कुछ समझ में आ जाएगा। लोग न तो पागल हुए हैं, और न ही उनके देखने का अंदाज बदला है। बल्कि दर्शकों ने एक बात तो साफ कर दी है अच्छी चीजों को सब देखते हैं। जरूरी नहीं है कि हर चीज एंटरटेनिंग हो और झूठ की बुनियाद पर टिकी हो। पहली बात तो ये है कि बालिका वधू कोई एंटरटेनमेंट सीरियल जैसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि इस सीरियल को देखकर कोई फील गुड जैसा माहौल बने या फिर हिन्दी फिल्मों की तरह हैप्पी एंडिंग हो जाए।

यहां आडंबर औऱ कुरीतियों के आवरण में भय का माहौल हर वक्त देखा जा सकता है। यहां पात्रों की हंसी भी डर के साये में पनाह लेती है। किसी भी पात्र को देखकर आप सपने नहीं संजो सकते। आप को मौका मिले तो शायद ही किसी कलाकार की जगह अपने को देखना पसंद करें। लेकिन फिर भी ये सीरियल लोगों को पसंद आ रहा है, तो इसकी वजह ये है कि लोग कहीं न कहीं इस सीरियल में अपनी छवि देखते हैं। अपनी मां, बहन, पत्नी या दूसरे रिश्तेदारों को घुटते हुए देखते हैं, जो शायद उन्हें पसंद नहीं है।

बालिका वधू सिर्फ एक सामाजिक गाथा है, जिसमें हमारे देश की तमाम कुरीतियों को बड़ी ही गहराई से उठाया गया है। इसमें न सिर्फ समाज में फैली बुराइयों को दिखाया जाता है, बल्कि आखिर में एक मैसेज भी दिय़ा जाता है कि किस तरह से ये जुल्म हम लड़कियों या औरतों पर कर रहे हैं। ये सीरियल मुख्यतया बाल विवाह पर आधारित है, लेकिन इसके साथ ही इसमें बेमेले उम्र के लोगों के बीच विवाह, सेक्स, औरतों की त्रासदी, दहेज से जुड़ी बुराइयों को दर्शाया गया है।

सीरियल की एक और सबसे बड़ी ताकत है इसका मूक संवाद। इसमें दिखाया गया है कि कैसे पुराने जमाने में (वैसे अब भी होता है) घर के लोग ही बात नहीं कर पाते थे। एक दूसरे की मुश्किलों को समझ भी नहीं पाते थे। सास या फिर घर के बुजुर्ग महिलाओं को सताते थे। ऐसे में महिलाएं चुपचाप रहकर भी बात कर लेतीं थीं। गुरुवार (9 अक्टूबर) को दिखाया गया एपिसोड एक मिसाल है। इसमें दिखाया गया कि गहना शादी के बाद पहली ही रात अपने पति की वासना का शिकार होकर पूजा घर में आती है। आनंदी की सास उसके शरीर पर बसंत के दिए जख्मों के निशान देखती है, लेकिन पूछ नहीं पाती है। इसके बावजूद वो पूजा घर में सबके सामने गहना के साथ मूक संवाद कर लेती है। इस संदर्भ में मुझे एक कविता याद आती है -

कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात

भरे मौन में करत हैं, नैनन ही सों बात

कुछ ऐसी ही बात बड़ी बिंदड़ी या आनंदी की सास गहना से करती है। मौन रहकर भी नैन से बात। और ये सब बड़ी ही सहजता से दिखाया जाता है। इसके लिए किसी इफेक्ट्स का सहारा नहीं लिया जाता। सारा बोझ कलाकारों के सिर पर है। उनकी अच्छी एक्टिंग ही इसमें जान डालती है। जबकि लोगों के लिए इसे सिवाय सहन करने के कोई चारा नहीं है, क्योंकि यही समाज का क्रूर सच है। इस तरह के सीरियल अगर लोग देखते हैं तो साफ है कि उन्हें अच्छी चीजें भी बेहद पसंद है। जाहिर है लोग सठियाये हुए नहीं हैं।

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हरीश चंद्र बर्णवाल के बारे में कुछ और

हरीश चंद्र बर्णवाल पिछले 8 सालों से टेलीविजन पत्रकारिता से जुड़े हैं। आईबीएन 7 से पहले 4 साल तक स्टार न्यूज में कार्यरत रहे। गजलों पर एक किताब "लहरों की गूंज" लिखी है। समय मिलने पर कहानियां लिखना बेहद पसंद। पुरस्कार - "रोजगार की तलाश में" कहानी के लिए हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा पुरस्कृत, "यही मुंबई है" कहानी के लिए अमृतलाल नागर पुरस्कार, "चौथा कंधा" कहानी के लिए कथादेश सम्मान, "संवेदनहीनता" कहानी के लिए कादंबनी पुरस्कार से सम्मानित। 1993 में दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक (टॉपर) किया है।
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