माई नेम इज खान को लेकर जिस तरह का बवाल शिवसेना ने शुरू किया है। वो दरअसल सिर्फ फिल्म का विवाद नहीं है बल्कि ये तो बहाना है। असली मकसद तो शिवसेना को अपनी खोई जमीन तलाश करना है। नफरत की राजनीति को एक बार फिर से चमकानी है। लेकिन जिस तरह की किचकिच से बार-बार मुंबईकर, मराठी आदमी और देश के बाकी लोग परेशान हो रहे हैं।
आखिर उसका इलाज क्या है? क्या मुंबई के लोग और महाराष्ट्र के लोग हमेशा शिवसेना की दहशत में जीने को मजबूर रहेंगे? क्या सरकार कोई कड़े कदम उठाएगी? एक बात तो साफ है कि सरकार कोई सख्त कदम नहीं उठा पाएगी। इसके राजनीतिक कारण ये हैं कि जिस शिवसेना को लोगों ने चुनाव में कोई भाव नहीं दिया। कांग्रेस को डर है कि अगर एक बार कड़ी कार्रवाई कर दी गई तो मराठी और दूसरे मुद्दों को हवा देकर शिवसेना मराठी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके सत्ता में वापसी कर सकती है।
ऐसे में शिवसेना की नफरत की राजनीति के कई समाधान हो सकते हैं...
1. मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाए।
2. महाराष्ट्र को कई हिस्सों में तोड़ दिया जाए। मसलन अलग विदर्भ की मांग हमेशा से उठती रही है। मैं ये बता दूं कि छोटे छोटे राज्य देश की एकता की सेहत के लिए अच्छे हैं। राज्यों को तोड़ने का मतलब देश का विखंडन कतई नहीं है।
3. शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जिस तरह के बयान बाल ठाकरे औऱ राज ठाकरे ने दिए हैं। उससे इनके खिलाफ देशद्रोह का मामला आसानी से चलाया जा सकता है। इन्हें जिंदगी भर के लिए चुनाव लड़ने से रोका तक जा सकता है। साथ ही इन्हें कड़ी सजा भी दी जा सकती है।
4. महाराष्ट्र के मुद्दे पर सरकार को शिवसेना की सहयोगी बीजेपी से भी बात करनी चाहिए क्योंकि नए मुद्दों पर कमोबेश बीजेपी की भी लाइन वही है जो सरकार की है।
5. आम लोगों को जागरूक करने की जरूरत है कि शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना किस तरह से नफरत और विखंडन की राजनीति कर रही है।
6. महाराष्ट्र की बड़ी शख्सियतों को सामने आने और खुलकर इन पार्टियों के विरोध करने की जरूरत है क्योंकि इससे आम जनता में ये मैसेज जाएगा कि शिवसेना और MNS का सच क्या है।
ये एक ऐसा मुद्दा है जो पूरे देश के लिए नासूर बन चुका है। कई राज्य, जहां नफरत के सियासतदानों को, आम जनता ने पहचान लिया। उस राज्य ने गजब की तरक्की की है लेकिन महाराष्ट्र जैसे जिन राज्यों में अब भी छोटे छोटे दल साठ औऱ सत्तर के दशक के बनाए गए अपने ही कट्टरवादी नियमों में जी रहे हैं। वो समय के साथ बेहद पीछे हुए हैं। साफ है महाराष्ट्र के संदर्भ में उठाए गए कदम देश के तमाम राज्यों के लिए एक मिसाल बन सकते हैं। लेकिन समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो पंजाब जैसे हालात भी पैदा हो सकते हैं।














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