डिनर के दौरान अचानक मेरी पत्नी ने कहा कि वो चुनाव लड़ना चाहती है। राजनीति में उतरना चाहती है। मैंने हैरानी से पूछा क्यों ? अचानक ये ख्याल कैसे आया? वो बोली देश का सत्यानाश हो गया है। कोई नेता नहीं है। अमेरिका में अगर ओबामा हो सकता है तो हमारे यहां यंग लोग क्यों नहीं आ सकते। ओबामा ने मुझमें एक उम्मीद जगा दी है कि आम इंसान भी राजनीति में जा सकता है।
मैं वाकई सोचता रह गया कि कैसा है ये ओबामा, जो हजारों किलोमीटर दूर बैठे एक पराये देश में भी उम्मीद जगा रहा है। क्यों उसको देखकर कुछ कर गुजरने का मन करता है। क्यों फिर से सपने बुनने का मन करता है। क्यों वो अपना सा लगता है। क्या महज इसलिये कि उसका रंग हमारे जैसा है, क्या इसलिये कि उसके नाम में हमारी खुश्बू है।
जीत के बाद अपने पहले संबोधन में ओबामा ने कहा कि "ये जवाब युवा, बुजुर्ग, अमीर, गरीब, डेमोक्रेट, रिपब्लिकन, काले, गोरे, हिसपैनिक, एशियन, नेटिव अमेरिकन, गे, लेस्बियन, स्ट्रेट, अपाहिज और जो अपाहिज नहीं है उनका है। अमेरिका के लोगों ने दुनिया को संदेश दिया है..... ये देश महज अलग-अलग तरह के लोगों का संग्रह नहीं है। न ही ये लाल और नीले राज्यों का संग्रह है। हम हमेशा से यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका थे और रहेंगे"। ये सुनकर जोश में मैं चिल्लाया था और मुट्ठी हवा में लहरा दी थी। न जाने क्यों ऐसा लगा कि जैसे ये बात हमारे देश के लिये कही गयी हो। लेकिन मैं भारत में रहता हूं, अमेरिका में नहीं। उस दिन भारत की याद आयी थी। उस दिन दिल में एक गहरी टीस उठी थी। पत्नी ने राजनीति में जाने की बात कहकर वो टीस और गहरी कर दी। मेरा देश अमेरिका जैसा क्यों नहीं हो सकता।
नहीं हो सकता हमारा देश अमेरिका जैसा। दरअसल हम अपने देश पर गर्व नहीं करते। देशवासी या भारतवासी होने का अभिमान हमें है ही नहीं। भारत के नाम पर हमारी छाती चौड़ी नहीं होती। हमें भारत की चिंता नहीं होती। भारत के लिये हमारा कलेजा नहीं फटता। भारत के लिये हम कुछ नहीं करते। भारतवासी हम सबसे आखिर में होते हैं। वो चाहे राजनेता हों या उद्योगपति या फिर साधारण नागरिक। हर कोई पहले अपने बारे में सोचता है। जहां मैं और मेरा फायदा हमारी सबसे पड़ी प्राथमिकता हो वो देश तो पीछे छूटेगा ही। सवाल ये है कि कैसे बदलेगी ये विचारधारा। कौन होगा भारत का ओबामा। मायावती, मुलायम सिंह यादव या फिर लालू प्रसाद यादव, राज ठाकरे या फिर नरेंद्र मोदी।
क्या दलितों और पिछड़ों की नुमाइंदगी करने वाला ही कोई भारत का ओबामा होगा ? क्या सिर्फ इसलिये कि ओबामा पहले अश्वेत हैं। यहां ये भी याद रखना होगा कि ओबामा की मां गोरी हैं। उन्होंने सिर्फ बचपन के कुछ साल को छोड़कर हमेशा अपने व्हाईट नाना के साथ जिंदगी गुजारी। लेकिन क्या ओबामा की जीत सिर्फ अश्वेतों की जीत है ? नहीं, ओबामा ने खुद कहा है "सिर्फ उनकी जीत से ही बदलाव नहीं होगा। जीत ने बदलाव लाने का मौका दिया है। पुराने बने बनाये रास्ते पर चलकर बदलाव नही हो सकता। न ही बदलाव आपके (जनता के) बगैर हो सकता है। न ही सेवा की नयी भावना और त्याग के बगैर। तो आईये आज से आगाज करें राष्ट्रवाद की नयी भावना के साथ , नयी जिम्मेदारियों के साथ, जहां हर कोई पूरी मेहनत करते हुए खुद के साथ एक दूसरे का खयाल रखे"।
पर क्या हमारे नेता एक दूसरे का ख्याल रखते हैं ? नहीं। जहां सारी राजनीति वोट बैंक पर होती हो। देश में जब तक दलित हैं, पिछड़े हैं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, जाटव, कुर्मी, गूजर, उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय रहेंगे, तब तक न सपने देखे जायेंगे, न सपने पूरे होंगे। सपने जातियों और धर्मों के ही रहेंगे। देश का सपना नही होगा। जब तक देश का सपना नहीं होगा, न ओबामा होगा, न मैं दिल से भारतवासी बनूंगा, भारत महज एक शब्द रहेगा और मैं अपने स्वार्थ में जीने वाला एक स्वार्थी नागरिक।














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