1937 तक तो जिस पंडाल में कांग्रेस का अधिवेशन होता था उसी पंडाल में दो दिन बाद हिन्दूमहासभा का अधिवेशन होता और मदन मोहन मालवीय के दौर में तो दोनों अधिवेशनों की अध्यक्षता मालवीय जी ने ही की। इसलिये आरएसएस कांग्रेस की थ्योरी से हटकर सोचती रही लेकिन हिन्दु महासभा का मानना है कि संघ ने बीजेपी की सत्ता का मजा लेकर सत्ता दोबारा पाने के लिये खुद के संगठन का कांग्रेसीकरण ज्यादा कर लिया है और हिन्दू राष्ट्र की थ्योरी को पूरी तरह नकार दिया है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि ब्रह्मणों की पंरपरा को लेकर भी मतभेद उभरे। चूंकि हेडगेवार की तरह सुदर्शन भी तेलुगु ब्रह्मण है तो हिन्दुत्व पर कड़ा रुख अपनाने की सुदर्शन की क्षमता को लेकर भी यह बहस हुई कि संघ फिलहाल सबसे कमजोर रूप में काम कर रहा है इसलिये संघ की मराठी लॉबी भी सावरकर की सोच को आगे बढ़ाने में मदद करेगी। इन सब का असर संघ पर किस रूप में पड़ा है या फिर देश में जो राजनीतिक स्थितियां है उसमे सरसंघचालक सुदर्शन भी अंदर से किस तरह हिले हुये हैं इसका अंदाजा पिछले महीने 7 नबंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर गो-रक्षा के सवाल पर हिमानी सावरकर के साथ मंच पर खड़े सुदर्शन को देखकर समझा जा सकता था। यानी जो परिस्थितियां सावरकर और संघ को अलग किये हुये थीं उसमे पहली बार संघ के भीतर भी इस बात को लेकर कुलबुलाहट है कि जिस राह पर वह चल रही है वह रास्ता सही नहीं है।
मामला सिर्फ मोहन भागवत या इन्द्रेश की हत्या की साजिश का नहीं है, पुणे में गोखले-साठे-पेशवा-सावरकर की कतार में खड़े कोकनस्थ बह्मण अब स्वदेशी अर्थव्यवस्था के उस ढांचे को जीवित करना चाह रहे हैं जिसकी बात कभी संघ के नेता दत्तोपंत ढेंगड़ी किया करते थे लेकिन ढेंगड़ी अपनी बात कहते-कहते मर गये मगर न वाजपेयी सरकार ने उनकी बात सुनी न सरसंघचालक ने उन्हें तरजीह दी। जाहिर है आजादी के बाद पहली बार अगर अभिनव भारत को बनाने की जरूरत सावरकर को मानने वाले कर रहे हैं तो इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि हिन्दुत्व की जो थ्योरी सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर अभी तक आरएसएस परोस रही है और बीजेपी उसे राजनीतिक धार दे रही है, वह अपने ही कटघरे में पहली बार खड़ी है।














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