गेट-वे के सामने खड़े होकर ताज होटल की फोटो खींचना नया टूरिज्म है। पुराना टूरिज्म ताज को पीठ दिखाते हुये गेट-वे ऑफ इंडिया की तस्वीर खींचना था। आतंक को लेकर खौफजदा मुंबई शहर में कोई भी बाहरी सबसे पहले उसी जगह पहुंचना चाहता है जहां, साठ घंटे तक गोलियां चलती रहीं, धमाके होते रहे और समूचे देश के कमोवेश हर घर में यह सब टीवी पर लाइव देखा जाता रहा।
गेट-वे पर खड़े होकर समुद्र देखने से ज्यादा हसीन घायल ताज लगता है। खासकर जब सूरज ढल रहा हो। इसीलिये ढलते सूरज को समुद्र की ओट में देखने से ज्यादा हसीन सूरज की लालिमा में ताज की फोटो को कैद करने की होड़ हर दिन देखी जा सकती है। यह इलाका कोलाबा के नाम से जाना जाता है और चुनावी मौके पर दक्षिणी मुंबई की लोकसभा सीट के तौर पर इसकी पहचान है। लेकिन पहली बार सिर्फ ताज या गेट-वे को देखने का नजरिया ही नहीं बदला है बल्कि दक्षिणी मुबंई की लोकसभा सीट का समूचा चरित्र बदल गया है।
अगर मछली मार और बोट चलाने वालों की राह पकड़कर आंतकवादी गेट-वे से मुबंई में घुसे और उन्होंने शहर की तासीर बदल दी तो परिसीमन के बाद रईसों के इस क्षेत्र में मच्छीमार से लेकर झोपड़पट्टी वालों की बड़ी तादाद के शामिल होने से चुनावी चेहरा भी बदल गया है।
पहले जो इलाका मुबंई साउथ-सेन्ट्रल में था उसका बड़ा हिस्सा अब दक्षिण मुंबई के क्षेत्र में आ गया है। यानी डौक का वह पूरा इलाका इसी दक्षिणी मुंबई में सिमट गया है जहां से मुंबई अंडरवर्ल्ड खड़ा होता है। हाजी मस्तान से लेकर दाऊद की कहानी भी यहीं से शुरू होती है। डौक यानी बंदरगाह पर लगने वाले जहाजों से माल उतारने वाले कामगारों से हफ्ता वसूली सत्तर के दशक से आज भी जारी है। अमिताभ बच्चन ने दीवार में हाजी मस्तान के इस चरित्र का बखूबी जीया और प्रसिद्धी भी पाई।
मुंबई के इस इलाके में कभी ट्रेड यूनियन नेता दत्ता सामंत की तूती बोलती थी। हर कामगार दत्ता सामंत की यूनियन का सदस्य था। ट्रेड यूनियन को मुबंई के विकास के खिलाफ बाल ठाकरे उस दौर से मानते रहे जब जॉर्ज फर्नांडिस ढाबा और मिल मजदूरों को यूनियन के झंडे तले लाकर संघर्ष करते रहे। दत्ता सामंत के खिलाफ भी शिवसेना रही। इसलिये दत्ता सामंत की हत्या के बाद शिवसेना ने इस उलाके पर कब्जा कर लिया। मुंबई की यह एकमात्र सीट है, जहां शिवसेना को हराना मुश्किल है।
1991 से शिवसेना के पास ही यह सीट रही है। मोहन रावले लगातार जीतते रहे हैं। लेकिन अब इस इलाके की तासीर बदली है तो रईसों की बस्ती में झोपडपट्टी की पकड़ ने ताज की तरह इस इलाके को भी घायल कर दिया है। यानी जो बहस ताज पर हमले के बाद मोमबत्ती जलाते लोगों को लेकर छत्रपति स्टेशन टर्मिनस यानी सीएसटी में मारे गये लोगों से बेरुखी को लेकर उभरा था। कुछ उसी तरह की स्थिति दक्षिण मुंबई की सीट को लेकर खड़ी हो गई है।
ताज पर हमले के बाद झौपडपट्टी के लोगों पर गाज गिरी थी। पांच सितारा जीवन आतंक के निशाने पर आया था तो महीनों झौपड़पट्टी के लोगों की नींद हराम हुई थी। आतंकवादियों को मदद देने के नाम पर 75 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था। दर्जनों परिवारों को कई रातें थाने में काटनी पड़ी थीं। जिसकी शिकायत इन झौपड़पट्टी वालों ने शिवसेना से की थी। जिस पर शिवसेना भड़की भी थी। शिवसेना ने कहा भी था कि सिर्फ घायल ताज-नरीमन की रईसी को सरकार जांच में न देखे। सीएसटी और सड़कों पर मारे गए आम लोगों के दर्द को भी सरकार समझे और बेगुनाहों को थानों में बंद न करे। लेकिन कांग्रेस कहती रही जांच होगी तो पुलिस जिसे चाहेगी उसे तो पकड़ेगी।
जाहिर है बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं की रईसी बेखौफ रहे इस पर कांग्रेस का जोर रहा। दक्षिण मुंबई के इलाके में ही हर नेता-मंत्री की रिहाइश है और अंबानी बंधुओं से लेकर मुंबई में रहने वाला हर रईस इसी इलाके में रहता है। लेकिन अब दक्षिण मुबंई की सीट में जब दोनों तबके शामिल हो गये हैं तो दोनों मिजाज भी खुलकर आमने-सामने हैं। लेकिन पहली बार अंडरवर्ल्ड ने भी इसी सीट पर दस्तक दी है।
सोशल इंजिनियरिंग को नये तरीके से महाराष्ट्र में आजमाने निकली मायावती ने मुंबई के इसी रंग को पकड़ा है। यानी झोपडपट्टी,कामगार और दलित का मिश्रण जिस सोशल इंजिनियरिंग की ओर ले जाता है उस दिशा में नेता नहीं अंडरवर्ल्ड की पकड़ वाला व्यक्ति ही राजनीतिक खेल खेल कर सकता है। इसलिये पहली बार बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड से निकलते हुये राजनीति में भी इसकी सेंध पांच सितारा लोगों के बीच लग रही है।
दाऊद के लिये वसूली करने वाला हाजी मोहम्मद अली शेख इसी इलाके से चुनाव लड़ रहा है। शेख को मायावती ने अपनी पार्टी का टिकट दिया है। पुलिस के रिकार्ड में करोड़पति हाजी मोहम्मद अली शेख दाऊद के लिये डौक से हफ्ता वसूली का काम करता है। इस समीकरण ने ताज और गेट-वे की तरह ही अंडरवर्ल्ड के रिश्तों में भी जबरदस्त बदलाव ला दिया है।
असल में इस सीट पर चिंचपोकली के विधायक और अंडरवर्ल्ड से जुड़े अरुण गवली चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन जीतने के लिये वह मायावती की सोशल इंजिनियरिंग का हिस्सा बनना चाहते थे। लेकिन मायावती ने उनसे ज्यादा सीधे अंडरवर्ल्ड से जुड़े शेख को तरजीह दी। और तलोजा जेल में बंद अरुण गवली को यह भी कहलवा दिया कि अगर शेख का साथ उन्होंने इस चुनाव में दिया तो भविष्य में गवली को साथ खड़ा कर लेगी। स्थिति बदली और और अब कभी दाऊद के खिलाफ खड़ा होने वाला अरुण गवली चुनाव में दाऊद के गुर्गे की मदद कर रहा है।
लेकिन मुंबई की इस सीट के जरिए आतंकवाद के खिलाफ राजनीतिक आतंकवाद की त्रासदी यही नहीं रुकती। मराठी माणुस के नाम पर उत्तर भारतीयों को पहली बार इसी इलाके में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के जिस शख्स की अगुआई में निशाना बनाया गया वह भी चुनाव मैदान में है। एमएनएस के करोड़पति मालागावनकर ने भी आतंकवादी हमले से ज्यादा खतरनाक उत्तर भारतीयों को करार दिया था।
मच्छीमार बस्तियों में और मराठी कामगारों के बीच राज ठाकरे की हैसियत ठीक उसी तरह है जिस तरह बाला साहेब ठाकरे के दौर में दक्षिण भारतीयों पर अंडरवर्ल्ड डॉन वरदराजन की पकड़ थी। तब ठाकरे से बचाने के लिये वरदराजन की छाया दक्षिण भारतियों को मिली और अब राज ठाकरे ने अपने आतंक से शिवसेना के वोट बैंक में सेंध लगाकर मराठी माणुस शब्द अपने साथ जोड़ लिया। इसलिये शिवसेना के मोहन रावले को अपनी तर्ज पर राजनीतिक आतंक को परिभाषित करने में भी परेशानी हो रही है। लेकिन आतंकवादी हमले से घायल ताज का दर्द सिर्फ झौपड़पट्टी और अट्टालिकाओं में ही नहीं खोया है।
पहली बार मोमबत्ती और हाथों में हाथ थामकर ह्यूमन चेन बनाते हुये आतंक के खिलाफ घुटने टेके सरकार को ठेंगा दिखाने वाले भी अपनी राजनीतिक सोच के साथ चुनाव मैदान में है। बहुराष्ट्रीय बैंक एबीएन एमरो की कंट्री हैड मीरा सान्याल भी दक्षिण मुंबई से निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं। हर शाम ताज में चाय की चुस्की के साथ बिगड़ती मुबंई की आबो-हवा पर चर्चा करने के दैरान पहली बार मीरा सान्याल को 26-11 यानी ताज पर हमला अंदर से हिला गया।
जिन अपनों के साथ ताज में चाय की चुस्की के साथ अरब सागर की लहरों में डूबते सूरज को देखते हुये मुंबई के हालात पर चर्चा होती थी। हमले ने जब उन अपनों को ही खत्म कर दिया तो मीरा सान्याल को लगा अब चुनाव के जरिए ही रास्ता निकलेगा। बचपन से मुंबई में रहीं सान्याल की पहचान चाहे दो हजार से लेकर दस हजार स्क्वायर फीट के वही बंगले हैं जिसमें हम दो हमारे दो वाले आदर्श परिवार पांच सितारा जीवन जीते है। लेकिन सान्याल के पास हर उस आंतक के सवाल हैं जो घायल ताज की ओट में छुप गये हैं।
महज एक भारी बरसात समूचे शहर को ठहरा देती है। झौपडपट्टी में प्राथमिक शिक्षा से पहले बाल मजदूरी पहूंच जाती है। हॉस्पीटल में चाक के टुकड़े दवाई की गोली में तब्दील हो जाते हैं। और आतंक से लड़ती पुलिस के हाथ में वह दुनाली है जो ट्रिगर दबाने पर भी नहीं चलती। लेकिन सान्याल के यह सवाल 10 स्क्वायर की उस झौपड़पट्टी में नहीं गूंज पाते जहां आठ से पन्द्रह लोगों का परिवार रहता है। जिन्हें अपनी सफलता के लिये पुलिस कभी भी आतंकवादी बता देती है। जिन्हें राजनीतिक सफलता के लिये कभी एमएनएस मराठी माणुस का पाठ पढ़ाते हैं तो कभी अंडरवर्ल्ड अपनी वसूली का निशाना बनाकर अपने आंतक को पसारता है। और राजनेता विकास का नारा लगा कर अपने पढ़े-लिखे बेटे को अपनी राजनीतिक विरासत देकर अपने कुनबे को आगे बढ़ाता है। और इन सब के बीच गेट-वे आफ इंडिया को पीठ दिखाकर घायल ताज की तस्वीर जब हर किसी को सबसे हसीन लगती है तो साफ झलकता है आंतक की कड़ी दर कडी में देश की पहचान बदल चुकी है।














कमेंट्स
1