दिसंबर, 2008
लिखने के कई कारण होते हैं। एक तो जब आप अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते तब लिखने की चाह होती है या फ़िर कोई ऐसा वाकया हो जाता है जो आपको लिखने पर मजबूर करे। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ज्वाइन करने के बाद लिखने का समय नहीं निकाल पा रहा था। पर मुंबई हमले के समय जिस दौर से गुजरा उसने मुझे लिखने पर मजबूर किया। एक जर्नलिस्ट कैसे अपनी जान को जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करता है। मेरी जिन्दगी की यह सबसे जोखिम भरी रिपोर्टिंग थी। बुधवार की रात एक सामाजिक कार्यक्रम में हाजिरी देकर अभी घर पहुंचा ही था कि अखबार में काम कर रहे एक दोस्त का फोन आया। कहा कि मुंबई में कुछ हुआ है। मैंने उससे पूछा क्या हुआ तो उसने कहा कि कुछ बड़ा हुआ है। मैंने भागकर टीवी ऑन किया। देखा तो ताज होटल से....









