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जनक दवे
Thursday , December 04, 2008 at 22 : 29

मिशन मुंबई...लाइव और लाइफ


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लिखने के कई कारण होते हैं। एक तो जब आप अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते तब लिखने की चाह होती है या फ़िर कोई ऐसा वाकया हो जाता है जो आपको लिखने पर मजबूर करे। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ज्वाइन करने के बाद लिखने का समय नहीं निकाल पा रहा था। पर मुंबई हमले के समय जिस दौर से गुजरा उसने मुझे लिखने पर मजबूर किया। एक जर्नलिस्ट कैसे अपनी जान को जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करता है। मेरी जिन्दगी की यह सबसे जोखिम भरी रिपोर्टिंग थी।

बुधवार की रात एक सामाजिक कार्यक्रम में हाजिरी देकर अभी घर पहुंचा ही था कि अखबार में काम कर रहे एक दोस्त का फोन आया। कहा कि मुंबई में कुछ हुआ है। मैंने उससे पूछा क्या हुआ तो उसने कहा कि कुछ बड़ा हुआ है। मैंने भागकर टीवी ऑन किया। देखा तो ताज होटल से जेपी (जय प्रकाश) का फोनो चल रहा था। पहले तो लगा की रईसजादों के बीच घमासान हुआ होगा। पर थोड़ी देर में यह पता चल गया कि यह आतंकी हमला था। एक के बाद एक चैनल घुमा रहा था। विज्युल्स आईबीएन-7 पर ही चल रहे थे। पल-पल ख़बर बदल रही थी।

एक के बाद एक धमाकों की खबरें आने लगीं। मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही थी। अब यह बिलकुल साफ़ हो गया था कि देश का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ है। मेरे बड़े भाई मुंबई में रहते हैं तो उन्हें फोन लगाया। सब कुछ खैरियत से था। संजय सिंह, निशांत, जेपी सबको इन हालात में रिपोर्टिंग करते देख मेरे रोंगटे भी खड़े हो गए। जेपी के फोनो में उसने आतंकियों को कैसे देखा और कैसे आतंकियों से जान बची उसकी बात सुनकर लगा की मामला भयावह होता जा रहा है। एक समय यह भी सोचने लगा कि मैं उस जगह होता तो क्या होता।

थोड़ी देर में फोन की घंटी बजी। असाइनमेंट से फोन था विवेक जी ने सीधा कहा प्रबल सर बात करना चाहते थे। प्रबल सर ने कहा मुंबई तुम्हारे यहां से कितना दूर है। मैंने कहा साढ़े पांच सौ किलोमीटर। प्रबल सर ने कहा तुरंत मुंबई की ओर निकलो मैं भी पहुंच रहा हूं। ज्यादा कुछ सोचे बिना मैं मेरी यूनिट के साथ रात को एक बजे सड़क के रास्ते मुंबई की ओर निकला। मुझे पता था कि मैं सुबह नौ बजे तक नहीं पहुंच पाऊंगा। रात का समय था मेरे पायलट का जगना भी जरूरी था जिसके चलते सबने तय किया कि सब जगेंगे। बीच-बीच में मैं खबरें लेता रहता था। रात को पता चला की हेमंत करकरे और बाकी दो अफसर मारे जा चुके हैं। तब लगा कि मामला अब ज्यादा बिगड़ चुका है।

हम रात का सफर तय करके साढ़े ग्यारह बजे मुंबई के ताज पहुंचे। चारों और गोलीबारी की आवाज आ रही थी। पहले कुछ समय में समझ ही नहीं पाया कि क्या हो रहा है। पूरी रात और सुबह क्या कुछ हुआ उसकी जानकारी मैंने मेरे दोस्त जो मुंबई में हैं उनसे ली। शामतक पूरी परिस्थिति समझ में आ चुकी थी। मैं ताज होटल के धन्यवाद गेट के पास रिपोर्टिंग कर रहा था। थोड़ी देर में सेना के मेजर जनरल हुड्डा आए। उन्होंने कहा कि अन्दर अभी भी दो आतंकी हैं और एक को मार गिराया गया है।

यह पहली अच्छी ख़बर थी कि एक आतंकी मारा गया है। बाइट लेकर मैं तुरंत ओबी पर पहुंचा और उसे अप-लिंक कराया। इसी बीच लगातार हथगोले फेंकने और गोलीबारी की आवाज आने लगी। देर शाम को मुझे कहा गया कि ओबेरॉय होटल से मेरा लाइव है। मैं यूनिट के साथ ओबेरॉय होटल पहुंचा। वहां से मेरा लाइव चलता रहा देर रात तक।

अब तक यहां पर आतंकी जवानों पर भरी पड़ रहे थे पर गुरुवार शाम से अपने जांबाज एनएसजी कमांडो परिस्थिति पर काबू पा चुके थे। अठारह माले तक कमांडो पहुंच चुके थे। कई लोगों को अबतक आतंकियों के चंगुल से बचाया जा चुका था। गुरुवार की शाम ऐसा लग रहा था कि ऑपरेशन ओबेरॉय रात को खत्म हो जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ।

रात को दो बजे थे, मैं बुधवार रात से चला था अब थोड़ी भूख लगी थी। थोड़ा कुछ खाया और वापस लग गए रिपोर्टिंग में। मुंबई ब्यूरो के सभी रिपोर्टर बुधवार रात से लगे थे वो भी थक गए थे, जिसके लिए मुझे कहा गया कि सुबह सात बजे का लाइव करना है। रात को दो बजे आराम करने के लिए होटल ढूंढने की कवायद शुरू की। मुंबई इतना शांत पहले कभी नहीं देखा था। हम लोग गाड़ी में चार लोग थे मैं, मेरे कैमरामैन, असिस्टेंट और ड्राइवर...चारों को साथ देखकर कोई कमरा भी नहीं दे रहा था। मुझे कोलाबा से दादर का रास्ता मुंबई से अहमदाबाद से भी ज्यादा लग रहा था। आखिरकार दादर में एक होटल के मैनेजर को समझाने में हम सफल रहे। कमरे में पहुंचते तब तक साढ़े तीन बज चुके थे। सुबह साढ़े 6 बजे मुझे होटल ओबेरॉय पहुंचना था। सोते-सोते सवा चार बज गए। सवा पांच बजे का अलार्म बजते ही हम तैयार होने लगे।

हम सवा छह बजे ओबेरॉय पहुंच चुके थे। सुबह पहुंचे कि पता चला कि होटल ताज में अंधाधुंध गोलीबारी हो रही थी। मुझे कहा गया कि होटल ताज पहुंचिये। मैं होटल ताज पर पंहुचा। मैं पहुंचा तब रुक-रुक कर फायरिंग हो रही थी। ग्यारह बजे का वक्त था होटल ताज से दुनिया भर के टीवी चैनल्स लाइव कवरेज कर रहे थे। इतने में ही मीडिया पर आतंकी ने हैंड-ग्रेनेड फेंका। मुझे बिल्कुल याद है उस समय मीडियाकर्मी कैसे जान बचाकर भागे। हमलोग कुछ समझें इतने में ही मीडियाकर्मियों पर फायरिंग हुई। देखा तो हम सब फायरिंग रेंज में थे। मेरा कैमरामैन भी कैमरा छोड़कर भागा। एक और मेरा फोनो चल रहा था वहीं मुझे कहा गया कि फ्रेम उल्टा पुल्टा मिल रहा है उसे ठीक कराओ। मैंने मेरे कैमरामैन को ढूंढने की कोशिश की पर वो कहीं नजर नहीं आया। मैं हिम्मत जुटा सका चूंकि मेरे सहयोगी राकेश जाते समय मुझे बुलेटप्रूफ जैकेट देकर गए थे। मैं कैमरे के पास भागा..... फ्रेम ठीक किया तभी दोबारा फायरिंग शुरू हुई। एक के बाद एक सब अपने कैमरे के पास हिम्मत करके वापस आ चले। सेना ने हमें कहा कि लेट जाओ आप फायरिंग रेंज के भी अन्दर हैं। हमें अब जोखिम का एहसास होने लगा पर डटे रहना था। मैं मौके पर हो रही गतिविधियों को देखकर बयां कर रहा था। थोड़ी देर में मेरे सहयोगी संजय सिंह भी मेरी मदद को आ चुके थे। संजय उसके पहले ताज के पिछले दरवाजे पर थे। आतंकी ताज के कई कमरों में आग भी लगा चुके थे। आग की लपटें बाहर दिख रही थीं। मौत साया बनकर पीछा कर रही थी।

पल-पल परिस्थिति बदल रही थी। आतंकी का लोकेशन मिलने के बाद सेना के जवानों ने नीचे से रॉकेट छोड़े। जिसमें से एक रॉकेट के छर्रे मेरे पास रिपोर्टिंग कर रही एक विदेशी चैनल की महिला रिपोर्टर को लगे जिसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। थोड़ी देर बाद मेरी दाईं ओर रिपोर्टिंग कर रहे एक साथी को छर्रे लगे। अब रिपोर्टिंग जोखिम भरा होने लगा। सेना ने हमें तुंरत पीछे हो जाने को कहा। शाम तक रिपोर्टिंग करने के बाद पता चला कि सेना के अफसर मुआयना करने आए हैं। सेना ने अपने बयान में कहा कि अभी भी दो आतंकी ताज के अन्दर हो सकते हैं। तीन दिन हो चुके थे ऐसे में लड़ाई लंबी होने के आसार हमें मिल गए। शाम को अच्छी ख़बर यह आई की ओबेरॉय में आतंकियों को मार गिराया है।

वहीं नरीमन हाउस पर भी एनएसजी कमांडो फ़तह की ओर थे। देर रात आतंकियों को मार गिराया गया। शुक्रवार की रात अब शरीर जवाब देने लगा था। चूंकि बुधवार रात से हम चले थे और लगातार दो दिन बिना ठीक नींद लिए लगे रहे थे। ऐसे ही हाल मेरे बाकी के सहयोगियों के थे। प्रबल सर ने मुझे कहा की तुम होटल चले जाओ कल सुबह वापस तुम्हें जल्दी आना है। प्रबल सर की आंखें लाल हो चुकी थीं। नींद नहीं मिलने के बावजूद वो मैदान में जुटे रहे थे। उन्हें देखकर होटल जाने की इच्छा नहीं हुई। देर रात होटल गए। सुबह जल्दी मुझे नरीमन हाउस जाना था।

चार घंटे की नींद लेकर हम शनिवार सुबह नरीमन हाउस पहुंचे। यहां ऑपरेशन पूरा हो चुका था। अन संग हीरो नामके दो केस स्टडी करके मैं ताज की ओर चला। तब तक साढ़े दस बज चुके थे। ताज के बाहर मेरा दोस्त मयूर मिला। उसने कहा आखिरी आतंकी को मारने का ऑपरेशन दिलधड़क था। मैंने वो मिस किया। मुझे काफी खुशी हुई कि सभी आतंकी मारे गए। मैं तुंरत भागा होटल ताज के बाहर से एनएसजी कमांडो बाहर आ रहे थे। उनके चेहरे पर जीत की खुशी साफ़ दिख रही थी। मैंने उन जांबाज हीरो से बातचीत की। एक जवान से पूछा घर बात हुई? वो शर्मा गया, कहा- अभी कहां...मेरे पास मोबाइल नहीं है। मैंने मेरा फोन उन्हें दिया उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चे से बातचीत की। उनके चेहरे पर जो खुशी थी वो मैं इस भीड़ में ढूंढ रहा था।

उन्हें अपने परिवार से बातचीत करते देख मैंने भी अपनी पत्नी को फोन लगाया। वह परेशान थी कई दिनों से ठीक से बातचीत नहीं हो पायी थी। मुझे मेरा प्यारा बच्चा भी याद आया। 29 नवम्बर को उसका पहला जन्मदिन था, जो बीत चुका था। मेरी आंखों में आंसू थे जब मैंने उससे फोन पर कहा- बेटे मैं आ रहा हूं। वो समझ नहीं पा रहा था कि मैं क्या कह रहा हूं। उसने अपने अंदाज मैं कहा पापा..... कुछ समय तक मेरा गला गीला ही रहा...आंखों की तरह....।

आखिरी ऑपरेशन ताज पूरा हुआ। 183 जिंदगियों को खोने के बाद इसे मैं जीत करार नहीं दे रहा था। हमारी एजेंसियां सोती पायी गईं जिसके चलते आज उन परिवारों ने अपनों को खोया है। अपनों की कमी को पैसे देकर भी भरा नहीं जा सकता।

मेरी जिंदगी में यह एक रिमार्केबल अनुभव था जिसे मैं नहीं भूल सकता। दरअसल यह अनुभव शायद मुझ तक सीमित ही रहता। चार दिन के बाद थोड़ा आराम मिलने की चाह में जब मैं प्रबल सर, रवीन्द्र जी, निशांत और जेपी.... गेट वे ऑफ़ इंडिया के सामने बगीचे में बातचीत कर रहे थे तब प्रबल सर ने कहा की ऐसी चीजें लिखनी चाहिए.....कि कैसे, हम अपनी जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करते हैं। इसलिए दोस्तो आपसे यह बातचीत कर रहा हूं।

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