कहने को हम सब एक हैं पर एक दुसरे को कोसने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ते। मैं गलती कर रहा हूं वो देख रहे हैं बावजूद नहीं बताते की मैं गलती कर रहा हूं चूंकि उनको मेरी गलतियों से फायदा मिलने वाला है। यह बातें मेरी नहीं गुजरात कांग्रेस के नेताओं की हैं। अपने आप में सबसे बड़ा सवाल यह है की गुजरात कांग्रेस क्यों मजबूत नहीं हो पा रही।
इस पर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता से बात हो रही थी। उनके मुताबिक मजबूत तब हो सके जब सब एक दिशा में सोच रहे हों। यहां पर तो हर कोई अपनी दुकान चलाता है। ऐसा चल रहा है तभी कांग्रेस के नेताओं की बड़ी पहचान नहीं है। इसी के चलते ही जितने चुनाव हुए उसके बाद प्रदेश अध्यक्ष ने नैतिकता के तौर पर इस्तीफा दे दिया या फिर नए व्यक्ति को प्रमुख बना दिया बिना यह देखे हुए की उस व्यक्ति की जमीनी पैठ कितनी है। कभी-कभार तो ऐसा लगता है कि आला कमान भी सभी को आजमाने के मूड में दिखता हो पर कई बार ऐसा होता है कि समय की नजाकत को देखते हुए फैसले नहीं लिए जाते।
कार्यदक्षता कोई प्रमाण ही न हो ऐसा लगता है। अमूमन यह देखने को मिला है कि अध्यक्ष और सीएलपी लीडर अलग-अलग पार्टी चलाना चाहते हों। संगठन और विपक्ष दोनों एक दिशा में कभी भी अनुकूलन नहीं साधते परिणाम पक्ष कमजोर होता है दोनों फ्रंट पर।
इतना ही नहीं कोई नया अध्यक्ष बनाया जाता है तो वो सब उनसे दूरियां बना देते है जिनके नाम पर पूर्व अध्यक्ष लग चूका है। एक लिहाज से कहें वो शुषुप्त हो जाते है। कांग्रेस का कोई कार्यक्रम हो तो आएंगे सभी पर साथ में बैठे-बैठे भी उनके बीच की दूरियां साफ़ दिखेंगी। सरकार की नीतियों को लेकर सड़कों पर उतरने में भी इन नेताओं को कष्ट लगता है। आप बताइए आपको एक ऐसी घटना याद है जिसको लेकर विपक्ष के रुख को देखते सरकार संकट में आई हो या फिर सरकार को झुकना पड़ा हो। उनकी यह बात सुनकर मुझे भी मेरी याददास्त पर जोर लगाना पड़ा।
मोदी बलवान नहीं है हम मजबूत नहीं है। तभी तो वो हमारी आपसी लड़ाई का फायदा उठा रहा है। सच्चे कांग्रेसी को कभी ठीक तवज्जो मिली ही नहीं। बाहर से आये लोगों को हमेशा तवज्जो मिल रही है। दरअसल यह सब बात कहकर वो भी अपना गुस्सा बाहर निकाल रहे थे। बातों-बातों में उन्होंने ने यह भी कह दिया की \'बापू\' (बापू यानी शंकरसिंह वाघेला) को कभी हमने कांग्रेसी माना ही नहीं। बापू की तरह अभी के अध्यक्ष सिद्धार्थ पटेल(सिद्धार्थ अभी अध्यक्ष के साथ-साथ विधायक भी हैं उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री चिमन पटेल जनता दल में थे बाद में वो कांग्रेस में शामिल हुए) को कभी अध्यक्ष की कुर्सी दे दी। यह हालत है कांग्रेस की।
अगर सीनियर नेताओं की यह हालत है तो युवा और एनएसयुआई की हालत क्या होगी। इससे अंदाजा लग सकता है कि प्रदेश कांग्रेस की आपसी राजनीती किस पायदान पर पहुंची है। ऐसे में एक शक्ति विपक्ष के तौर पर उनसे किसी भी तरह की उम्मीदें करना ठीक नहीं होगा।
भला हो कांग्रेस का कि राहुल ने पिछले 15 दिनों में दो बार गुजरात का दौरा करके युवाओं को कांग्रेस में जोड़ने की कोशिश की। नहीं तो यह पांख ख़त्म होने के कगार पर थी। युवा कांग्रेस के नेताओं ने ऐसी छवि पेश की थी की कोई युवा कांग्रेस से जुड़ने के लिए तैयार नहीं थे।
राहुल ने एक काम यह भी अच्छा किया की युवा कांग्रेस को बिखर दिया। हालांकि मार्च में उसके चुनाव होने हैं। राहुल ने युवाओं से मिलकर क्यों कांग्रेस में जुड़ना चाहिए यह तर्क समझाए। हालाकि एक तर्क पर कितने युवा जुड़ेंगे यह कहना कठिन है पर कोशिश अच्छी है। इसी का असर है कि राहुल जहां- जहां गए मोदी को उसके बाद वहां रैली करनी पड़ी मसलन असर जरूर हो रहा है। पर युवा पांख को मजबूत करने की राहुल की चाह का असर लम्बे समय के बाद दिखेगा पर अभी जो कांग्रेस की हालत है उसको दुरस्त कौन करेगा।
कांग्रेस असरकारक नहीं है उसका कारन यह भी है की पिछले 14 सालों से कांग्रेस विपक्ष में है। पिछले आठ साल से जब से मोदी आए हैं उन्होंने उनकी खुद की कैम्पेन इस हद तक की है कि मोदी के आलावा कोई चेहरा गुजरात की राजनीति में नहीं दिखता। पिछले कुछ वर्षों में जो युवा मतदाता के तौर पर उभरे उन्हें जरा यह पूछ लीजिये की गुजरात कांग्रेस के पांच नेताओं के नाम गिना दें..... साहब चक्कर आ जायेंगे उन्हें।
ऐसे हालत क्यों हैं। पिछले दो सालों में नए डेढ़ करोड़ मतदाता में कोंग्रेस के नेता अपनी जगह नहीं बना पाए है। उसका कारण यह भी है कि उन्होंने ठीक से विपक्ष की जिम्मेवारी अदा नहीं की। एक समय था जब कांग्रेसी सरकारों की नीतियों को लेकर भाजपाई नेता जो अभी सरकार का हिस्सा है वो लोगों को सड़कों पर ला देते थे। जानकार हंसते-हंसते कभी यह भी कहते है कि कांग्रेस को कभी विपक्ष की भूमिका अदा करनी नहीं आएगी और बीजेपी को कभी सरकार चलानी नहीं आएगी। ऐसे में कांग्रेस को गुजरात में आलाकमान नहीं भगवान ही बचाए।














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