एनडीए के प्रधानमंत्री इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी के लिए यह चुनाव जितने अहम हैं उतने ही अहम उनके राजनीतिक चेले और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी हैं। एक लिहाज से कहें तो आडवाणी के साथ-साथ मोदी की इज्जत भी दांव पर लगी हुई है। तभी तो मोदी जी ने अबतक की उनकी इमेज की परवाह किये बिना दागियों को टिकट देकर बीजेपी की चाल,चरित्र और चेहरे की विचारधारा की धज्जियां उड़ा दी हैं।
बाकी के राज्यों के मुकाबले कम से कम गुजरात में दागियों को टिकट देने में पार्टियां परहेज करती थीं। इस बार मोदी जी को न जाने क्या हुआ कि ज्यादातर उन्हें टिकट दिया गया जो कहीं न कहीं किसी आपराधिक मामलें में लिप्त रहे हैं। पता नहीं विपक्षी कांग्रेस जो गुजरात में कमजोर है वो इसे मुद्दा बनाती है या नहीं। कांग्रेस के लिए दिक्कत भी यह है कि वो मुद्दों को मजबूती से पेश नहीं कर पा रही। पता नहीं उसके पीछे उनकी कोई राजनीतिक मजबूरी है या फिर पर्सनल स्कोरिंग बढ़ाने के चक्कर में कांग्रेसी नेता लगे हैं।
हम बात कर रहे थे दागियों की.....मोदी जी की ऐसी कौन सी मज़बूरी रही है कि उन्होंने अपनी पाक साफ छवि को नुकसान होने की आशंका के बावजूद इस बात को नजर अंदाज किया। दरअसल जैसा मैंने पहले बताया आडवाणी जी के साथ-साथ मोदीजी की शाख भी दांव पर लगी है। मोदी मुख्यमंत्री के साथ-साथ तीन राज्यों के प्रभारी हैं। उसमें से गुजरात एक है। उन्हें पता है कि पार्टी में इस बार ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर वो अपना कद और बड़ा कर सकते हैं। अभी के लिए नहीं मोदीजी की नजरें 2014 में होने वाले संभावित चुनाव पर है। मोदी लंबी पारी खेलना चाहते हैं। पार्टी के ही उनके कुछ अज़ीज़ उन्हें भावी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बता रहे हैं ऐसे में इस बार उन्हें गुजरात में साम,दाम,दंड और भेद से ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहिए।
जिसके चलते उन्होंने महज उम्मीदवार की जीतने की क्षमता को देखा उसके आपराधिक रिकॉर्ड को नहीं देखा। आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों के नामों की घोषणा के बाद पार्टी के कार्यकारों में भी इसको लेकर नाराजगी है। मोदीजी ने न केवल जीतने की क्षमता को देखा साथ मैं उस बात को भी नहीं देखा की वो पहले किस पार्टी में थे। सबसे हैरानी की बात यह कि पाटन से कांग्रेस के एमएलए भांवसिंह राठोड़ की मोदी ने टिकट दिया। कहा जाता है कि राठोड़ साहब एक ज़माने में डकैत थे। नारकोटिक्स मामले में जेल भी जा चुके हैं। ऐसे ही आनंद से दीपक साथी हैं जो चरोतर बैंक के करोड़ों के घपले में आरोपी हैं।
सूरत से दर्शना जर्दोश जो महिला बैंक में हुए चालीस करोड़ के घपले में आरोपी हैं। नवसारी से सी. आर. पाटिल जो डायमंड जुबली बैंक के घपले में 6 महीने की जेल सजा काट चुके हैं। अहमदाबाद से हरिन पाठक जिनको ऐन वक्त पर अडवाणी की दखलंदाजी के चलते टिकट मिला। उनके खिलाफ एक कांस्टेबल की हत्या का मुकदमा चल रहा था।
बीजेपी सरकार में मंत्री रहे एक नेता भावसिंह राठोड को टिकट देने पर अपनी प्रतिक्रिया ऑफ रिकॉर्ड दे रहे थे। यह मंत्री भी पास की ही विधानसभा सीट से जीतकर आते हैं। उनके मुताबिक भावसिंह को पिछले विधानसभा चुनाव में बदनाम करने में बीजेपी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अब यही नेता पाटन संसदीय क्षेत्र से चुनाव लडेंगे। मंत्री जी की लिए दिक्कत यह है कि इन विधानसभा सीट के मतदाता उसी संसदीय क्षेत्र में आते है ऐसे में वो अपने मतदाताओं को क्या मुंह दिखाएंगे।
यह तो बात हुई आपराधिक छवि वाले नेताओं की। कांग्रेस की मानें तो 'टीम आडवाणी' में इस बार 8 लोग ऐसे हैं जो आयाती हैं, जिन्हें दूसरी पार्टी से लाया गया। ऐसे में स्थानीय कार्यकर और उम्मीदवार एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या पार्टी में उम्मीदवारों का अकाल पड़ा था कि मोदी जी को बाहर से लोगों को लाना पड़ा। इसी बात को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। यह नाराजगी अगर लम्बी चली तो नतीजा सबको चौंका सकता है। चूंकि एक तो पहले ही नो रीपीट थ्योरी के नाम पर नए चेहरों को मैदान में उतरा गया है जिसमें ज्यादातर लोग बाहर से हैं। पाटन के भावसिंह राठोड़ की तरह दाहोद के अभी के कबूतरबाज सांसद बाबू कटारा की जगह सोमाजी डामोर को टिकट दिया गया। सोमाजी डामोर ऐसी शख्सियत हैं जिनका पूरी राजनितिक करियर कांग्रेस में रहा है उन्हें अचानक बीजेपी में या गया और सीधा टिकट दे दिया।
साथ ही में बाबू कटारा जिसे पार्टी से निष्काषित किया गया था उसे भी पार्टी में इस डर से वापस लिया गया कि वो कहीं नुकसान न पहुंचाए। इस बार अगर देखें तो सबसे वरिष्ठ लोगों को टिकट नहीं दिया गया बावजूद कोई हो हल्ला नहीं हुआ। यह बीजेपी के लिए चिंता का विषय भी हो सकता है। चूंकि शांत पानी हमेशा गहरा होता है। ऐसे में अगर असंतोष नहीं है यह मानकर चलें तो गलती होगी। यह असंतोष असक्रिय होकर भी भारी नुकसान पहुंचा सकता है जिसका अंदाजा यहां के पार्टी आलाकमान को पता है।
आलाकमान इसलिए कह रहा हूं चुंकि यहां मोदी की ही तो तूती बोलती है। जो नाम यहां से तय करके भेजे गए उसे दिल्ली आलाकमान के लिए मंजूर करने के अलावा कोई चारा नहीं था। ऐसा अगर होता है तो मोदी जिस गणित के साथ बीस से ज्यादा सीटें जीतने का आकलन लगाके बैठे हैं वो गलत साबित होगा।
गुजरात में मोदी अपनी छवि नॉन-करप्टेड नेता के तौर पर बनाने में सफल रहे हैं। इस छवि को उन्होंने दांव पर लगा दिया है। एक लिहाज से कहें तो आपराधिक छवि के साथ साथ आयाती लोगों को टिकट देकर मोदी इस बार राजनीतिक जुआ खेल रहे हैं। चूंकि अबतक उन्हें राजनीति में गैम्बलर के तौर पर देखा गया है। देखना होगा की वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के असंतोष के बीच मोदीजी की यह चाल मतदाताओं को अपनी और कितना खींचती है।














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