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जनक दवे
Monday , May 18, 2009 at 15 : 24

मोदी जीतकर भी हारे....


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दरअसल इसबार के चुनाव नतीजे राजनीतिक पार्टियां तो छोड़िए आम लोगों की उम्मीदों से भी विपरीत आए। खासकर बीजेपी के लिए सबसे चौंकानेवाले नतीजे रहे। उस जमीं पर जहां पार्टी से ज्यादा मोदी की तूती बोलती है। नतीजों की अब समीक्षा होगी। हार के ठीकरा फोड़ने के लिए मोहरे तलाशे जाएंगे। समय-समय पर हरे जख्म भर जाते हैं। कुछ समय बाद वापस उसी रफ़्तार से बीजेपी राजनीतिक पटरी पर दौड़ने लगेगी।

समीक्षा के नाम पर एनडीए की करारी हार के साथ बीजेपी के उन राज्यों को भी जोड़ा जा रहा है जिन राज्यों के मुखिया के विकास के कामों को चुनावी प्रचार का मुद्दा बनाया गया और वहीं बीजेपी कुछ खास नहीं कर पाई। उसमें गुजरात भी एक है।

गुजरात यानी मोदी....गुजरात के नतीजे मोदी के गणित से बिलकुल विपरीत रहे। अबतक यह होता आया था की मोदी ने जो गणित पार्टी के आला नेताओं को गिनाए वो बिलकुल वैसे ही रहे पर इस बार मोदी कहीं गच्चा खा गए। दरअसल मोदी गए तो थे आडवाणी को दिल्ली जिताने और उनके चुनावी मैनेजरों ने उनके ही होम ग्राउंड में उन्हें जीतकर भी हरा दिया। आलम यह था की नतीजों के दिन पूरा मीडिया उनके घर के आगे इंतजार करता रहा पर मोदी अज्ञातवास में चले गए। पूरे 48 घंटे तक वो किसी से भी मुखातिब नहीं हुए। मोदी जी को अचानक क्या हुआ न तो किसी से बात की न ही किसी को मिलने बुलाया। बात करें तो भी किस मुंह से। मोदी को अपने करिश्मे पर पूरा भरोसा था पर अचानक यह क्या हुआ वो समझने में वाकई में आत्ममंथन की जरूरत थी।

बीजेपी को जिताने के लिए सबसे ज्यादा मेहनत करने वाले मोदी का करिश्मा इस हद तक विफल रहेगा यह बीजेपी के नेताओं के लिए पहेली बन गया। हालांकि पार्टी के भीतर रहे मोदी विरोधी इससे खुश दिख रहे है। एक दुसरे से बात करते फूले नहीं समा रहे हैं इस सोच के साथ की अब शायद उनका सूर्योदय होनेवाला है तो क्या इसका मतलब यह है की मोदी का करिश्मा सूर्यास्त की और है।

देश तो छोडिए गुजरात में भी मोदी का जादू चल नहीं पाया। पार्टी के लोग भले ही यह गणित गिनाकर अपनी शाख बचाने की कोशिश कर रहे हों कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को घर बिठाने में मोदी का ही हाथ है तो यह भी स्वीकार करना होगा की मोदी का करिश्मा इसबार गुजरात मैं बीजेपी को उम्मीद से ज्यादा सीट नहीं जिता पाया। कारण क्या रहे यही कि पार्टी के कार्यकर्ताओं को अनसुना कर दिया गया। पार्टी के बाहर के लोग जो दागी थे उन्हें टिकट देकर पार्टी के कार्यकारों को उन उमीदवारों को जिताने के आदेश दिए गए जो कल तक पार्टी मैं नहीं थे उन्हें अगले दिन टिकट देकर चुनाव लड़ाए गए, नतीजा सबके सामने है।

कहने को तो जिला स्तर से समीक्षा के बाद ही उम्मीदवारों को टिकट दिया गया था पर ऐसा बिलकुल नहीं था। बीजेपी के लिए और खासकर मोदी के लिए झटके वाली बात यह रही कि जो सीट जनसंघ से लेकर अबतक जीतती आई थी वो मोदी-हठ के चलते गंवानी पड़ी। यह हार मोदीत्व की है... यह हार बीजेपी की है....

अगर 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों की जीत को अगर मोदी की जीत के तौर पर इतिहास में देखा गया है तो इस बार के चुनावों की हार की जिम्मेवारी फिर किसकी होगी। सबसे ज्यादा मेहनत करनेवाले की। चुनाव के वक्त के अरुण जेटली के उन बयानों को फिर से याद किया जाए....\"बीजेपी की जिताने के लिए सबसे ज्यादा मेहनत अगर कोई करता है तो वो है नरेन्द्र मोदी\"...और उस मैं कोई शक भी नहीं है कि मोदी ने मेहनत नहीं की। देशभर में 300 जितनी रैलियां का रेकॉर्ड, सबसे ज्यादा घंटे हवाई सफ़र करने का रेकॉर्ड और उतने ही इंटरव्यू देने का रिकॉर्ड भी मोदी के नाम है। बावजूद वो करिश्मा वोटों में तब्दील होते हुए नहीं दिखा।

आठ साल से लगातार जो करिश्मा काम करता आया वो मोदी का करिश्मा क्यों काम नहीं कर पाया, क्या लोगों ने मनमोहन पर होते निजी और घटिया हमलों का जवाब दिया या फिर हलकी मिमिक्री को नकार दिया। यह वही जनता थी जिसने लगातार दो विधानसभा चुनावों में इसी मोदी के नाम पर वोट दिए थे। बावजूद इसके मोदी की तरफ के लोग यह तर्क गले उतरने के प्रयासों में लगे हैं कि जो भी सीटें आईं वो मोदी के नाम पर ही आईं अगर मोदी नहीं होते तो राजस्थान और दिल्ली जैसे हालत होते।

मोदी की मानें तो बीजेपी ने तो प्रदर्शन अच्छा किया पर वाम दलों की विफलता के चलते कांग्रेस को फायदा हुआ है। पिछली बार की तरह अब हम विपक्ष में बैठेंगे। हालांकि विपक्ष में बैठने से अडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर तो विराम लग ही जाता है। ऐसे में मोदी के अब क्या भूमिका रहेगी उस पर सबकी निगाहें हैं।

मोदी को चुनावों के वक्त प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने की गलती अगर एनडीऐ से हुई और उसका खामियाजा अगर इसबार भुगतना पड़ा तो अब जबतक एनडीए एकजुट है तब तक मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश नहीं होंगे। अगले पांच साल तक तो बिलकुल नहीं। अगले पांच साल में अगर मोदी का रोल पार्टी में बदलता है और अगले चुनावों में बीजेपी अकेले दमख़म पर 272 का आंकड़ा पार करती है तभी मोदी का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो सकता है। हालांकि यह \"जो और तो\" की राजनीतिक बात है जिसकी गुंजाइश अभी तो बिलकुल नहीं दिखती।

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