14 सितम्बर की सुबह... गुजरात की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के दफ्तर में रोज के मुकाबले हलचल ज्यादा थी। उपचुनावों के आने वाले नतीजों के चलते हलचल के साथ वहां मौजूद कार्यकर्ताओं में थोड़ी घबराहट भी थी। जैसे-जैसे घड़ी आगे बढ़ रही थी वैसे ही कार्यकर्ताओं की बेचैनी और बढ़ रही थी।
दस बजे के आसपास थोड़ा स्पष्ट होने लगा की बीजेपी का घोड़ा रेस में आगे चल रहा है। वो भी एक नहीं पांच-पांच सीटों पर। यह रुझान जितने बीजेपी कार्यकर्ताओं और उनके नेताओं के लिए चौंकाने वाले थे उससे कई गुना ज्यादा कांग्रेस के लिए थे। चूंकि जसदन,देहगाम,दांता और चोटिला सीटों पर यह ट्रेंड बीजेपी के लिए कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाने के बराबर था। थोड़े समय बाद यह साफ हो गया कि बीजेपी ने कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगा ही दी।
मसलन सौराष्ट्र(सोरठ) की चार सीटें इस बार बीजेपी के खाते में आईं जबकि धोराजी और कोडीनार सीटें कांग्रेस ने अपने पाले में रखीं|दरअसल धोराजी तो पहले से कांग्रेस के पास ही थी पर कोडीनार सीट बीजेपी के हाथों में थी वो उसे गंवानी पड़ी जिसका मलाल बीजेपी को इसलिए भी ज्यादा नहीं था चूंकि सामने उन्हें ऐसी सीटों पर कब्जा मिल रहा था जहां हमेशा से कांग्रेस का दबदबा रहा है|
जसदन सीट की बात करें तो आजतक इस सीट पर बीजेपी कभी जीत ही नहीं पायी। इसके चलते बीजेपी संगठन ने इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाते हुए इस सीट को किसी भी हाल में जितने का मन बनाया था। यह सीट बीजेपी ने आधी तो तब ही जीत ली थी जब डॉ.भरत बोघरा को बीजेपी से टिकट दिया गया। ये महाशय बीजेपी में आने से पहले कांग्रेस में थे। वो भी जसदन के पूर्व विधायक और अभी के राजकोट के सांसद कुंवरजी बावड़िया के पार्टनर। सूत्रों की मानें तो कुंवरजी बावड़िया को राजकोट से लोकसभा के लिए टिकट दिया गया तब यह तय हुआ था कि अगर वो जीतते हैं तो उनकी खाली पड़ी जसदन विधानसभा सीट पर डॉ.भरत बोघरा को टिकट दिया जायेगा।
कुंवरजी भाई ने बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी का फायदा उठाते हुए बीजेपी का गढ़ मानी जाने वाली राजकोट सीट पर जीतकर आलाकमान को भी चौंका दिया। कुंवरजी की खाली पड़ी विधानसभा सीट पर अब माथापच्ची होने लगी। बीजेपी कांग्रेस की रणनीति को पहले देखना चाहती थी। कुंवरजी भाई अपने पुराने वादे को भूल गए और परिवार प्रेम को आगे लाते हुए जसदन सीट से अपनी बेटी को टिकट दिलवा दिया। डॉ.बोघरा के लिए यह जख्म था जिस पर मरहम लगाने का काम बीजेपी ने किया और डॉ.बोघरा बीजेपी के उम्मीदवार घोषित किये गए। कुंवरजी का दांया बांया सब कुछ जानने वाले डॉक्टर ने आखिरकार वो कर ही दिया जिसका अंदाजा बावडिया परिवार को नहीं था| बीजेपी ने यह सीट जीतकर परिवार वाद के दबदबे को खत्म कर दिया।
यही हाल देहगाम सीट का था| इस सीट पर बीजेपी अपने दमखम पर जीतने से ज्यादा कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी के चलते जीती है। बीजेपी गोत्र के और हाल के कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला का इस इलाके में दबदबा है|यहां पर क्षत्रिय वोट्स ज्यादा हैं|वाघेला जिसे टिकट देना चाहते थे उसे कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया और सी.जे.चावडा को मैदान में उतारा गया|इससे वाघेला नाराज हो उठे और अपने आपको चुनाव से अलग कर लिया|बी.जे.पी के लिए यह खुशी की बात थी|बी.जे.पी ने कल्याण सिंह चौहान नाम के लो प्रोफाइल व्यक्ति को मैदान में उतारा|बाकि मदद में स्थानीय मशीनरी तो थी ही, जो बचा था वो कांग्रेस की गुटबाजी ने पूरा कर दिया|ऐसे में यह सीट भी कांग्रेस के खाते से निकल कर बीजेपी के पाले में चली गयी।
बनासकांठा जिले की दांता सीट पर हमेशा से कांग्रेस का दबदबा रहा है|हालांकि इस सीट पर पहली बार कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया|जिसका फायदा बीजेपी ने जमकर उठाया|यहां पर हुए चुनाव को भावनात्मक मुद्दा बनाया गया|दरअसल इस जिले में देशभर में प्रचलित अम्बाजी मंदिर है|बीजेपी ने एक चुनावी हथकंडा आजमाया और ऐसी पत्रिकाएं छपवाईं कि अगर मुस्लिम उम्मीदवार को जिताया तो वो मंदिर बोर्ड का अध्यक्ष होगा|इस चुनावी मुद्दे ने कांग्रेस की पूरी रणनीति को तहस-नहस कर दिया। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस की यह सीट भी बीजेपी के पाले में चली गयी|हालांकि बीजेपी के इस चुनावी हथकंडे को कोर्ट में चुनौती दी गयी है।
समी सीट पर इस बार फिर से भावसिंह राठौड़ को आजमाया गया|वही भावसिंह जो लोकसभा चुनाव से पहले इसी सीट से कांग्रेस के विधायक थे और बीजेपी ने उन्हें अपनी और करते हुए लोकसभा का टिकट दे दिया| हालांकि भावसिंह का करिश्मा उनकी इमेज के चलते कुछ ज्यादा नहीं कर पाया और वो लोकसभा चुनाव हार गए|बावजूद बीजेपी ने उन्हें विधानसभा के लिए इस लिए टिकट दिया कि समी विधानसभा क्षेत्र पर उनकी लीड लोकसभा चुनाव में भी बरकरार थी|दोबारा विधानसभा में आजमाने पर भावसिंह ने वो करिश्मा कर दिखाया और सीट बीजेपी के हाथों में चली गयी।
धोराजी सीट पर कांग्रेस के मजबूत नेता विठ्ठल रादडिया के बेटे जयेश को टिकट दिया गया था|यहां पर कांग्रेस की जीत इसलिए पक्की मानी जाती थी चूंकि रादडिया के स्थानीय दबदबे से बीजेपी वाकिफ थी|पहले इस सीट पर विठ्ठल रादडिया ही विधायक थे लोकसभा जीतने पर उन्होंने यह सीट खाली की थी| ऐसे में यह सीट उम्मीदों के मुताबिक नतीजे लायी|
जहां तक कोडीनार की बात की जाए तो यह नतीजे बीजेपी के लिए चौंकाने वाले थे|यह सीट बीजेपी सुरक्षित मानकर चल रही थी चूंकि इस सीट पर पहले बीजेपी ने जीत दर्ज करायी थी|पर यह सीट कांग्रेस ने अपने पाले में कर ली|
चोटिला विधानसभा सीट की बात की जाए तो यहां के पूर्व कांग्रेसी विधायक पोपट जिन्जरिया का निधन होने के चलते यह सीट खाली पड़ी थी|इस सीट पर भी उनके बेटे मनोज को कांग्रेस ने आजमाया पर यह आजमाइश उम्मीदों से विपरीत रही और यह सीट भी बीजेपी ने हथिया ली|
नतीजों के बाद हार जीत के जो कारण बाहर आये वो बेहद दिलचस्प थे|कांग्रेस इसलिए हारी चूंकि परिवार वाद को आगे रखते हुए टिकटों को बांटा गया|जिस उम्मीदवार के चलते सीट खाली हुई थी उनके रिश्तेदारों को ही टिकटें दी गयीं|दूसरे, गुजरात में कांग्रेस के भीतर गुटबाजी का चलन पहले से रहा है|उसने भी कहीं न कहीं अपनी भूमिका अदा की|यह तो बात हुई हार की... मोटे तौर पर कांग्रेस की।
बीजेपी की बात करें तो इस बार के उप-चुनाव पहली बार दो राजनीतिक पार्टियों के बीच थे|अमूमन मोदी के आने के बाद मोदी वर्सेस ऑल होता है|पहली बार मोदी चुनावों से दूर रहे और घर में बैठे-बैठे राजनीतिक गेम प्लान ऐसे बनाया कि इशारा गांधीनगर में होता था और विकटें चुनावी मैदान में गिरती रहीं|
हालांकि बीजेपी के एक धडे़ की बात मानें तो लम्बे समय बाद कार्यकर्ता अपने बलबूते पर चुनाव जीतना सीखे हैं|नहीं तो हर बार मोदी की चमक के आगे कार्यकर्ताओं की मेहनत दब जाती थी|कुछ लोग यह भी कहते हैं कि भाई-साहब कार्यकर्ताओं ने यह दिखा दिया कि-" मोदी साहब, हम आपके बिना भी उम्मीदवार को जिता सकते हैं|"जो भी हो यह जीत मोदी के लिए गुजरात में उनकी लोकप्रियता का इम्तिहान पास करने जैसी है|
आलम यह है कि कांग्रेस अपनी हार के कारणों को नहीं देख रही और कह रही है की देखो मोदी की लोकप्रियता तो कम हुई ही है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगर मोदी चुनाव प्रचार में जाते तो कांग्रेस को जरूर फायदा होता। यह तो वो चुनाव में नहीं गए और नुकसान कांग्रेस को हुआ। कहा जाए तो कांग्रेस अपनी हार का ठीकरा मोदी पर फोड़ रही है।
बीजेपी कार्यकर्ताओं की मेहनत का असर यह रहा कि सात में से पांच सीट पर बीजेपी ने कब्जा जमा लिया। कार्यकर्ताओं की जीत के नाम पर ही मोदी ने अपनी जमीनी पैठ मजबूत बना ली और बीजेपी में भी अपने आपको मजबूत बना लिया। ऐसे में जब लोकसभा और जूनागढ़ नगर निगम के चुनावों में मिली हार का ठीकरा मोदी पर फोड़ा जा रहा था।














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