इंडियन प्रीमियर लीग, इंडियन पैसा लीग या फिर इंडियन पॉलिटिकल लीग...आप इसे कुछ भी कह लें पर एक के बाद एक आईपीएल के जो राज सामने आ रहे हैं वो काफी दिलचस्प हैं। आलम तो यह है कि आईपीएल के सेमीफाइनल-फाइनल का रोमांच खत्म होता जा रहा है और सबको मोदी-थरूर का क्या होगा यह चिंता ज्यादा सता रही है। थरूर तो अपने पद से गए अब क्या मोदी भी जायेंगे? यही सवाल और तर्क वितर्क इन दिनों सुनाई पड़ते हैं।
अब बात मुद्दे की....सबका सवाल यह होगा कि आखिर यह मामला उठा कहां से? यह जानना काफी दिलचस्प है। साहब गुजरात के राजनीतिक गलियारों में इस पर विशेष चर्चा है। गुजरात क्रिकेट असोसिएशन के पूर्व पदाधिकारियों में चर्चा थोड़ी तार्किक लगती है। तर्क यह लगाया जा रहा है कि पूरे विवाद की जड़ अगर कहीं है तो वह है गुजरात। यहां तक की सीधे-सीधे कहते हैं कि यह पूरा विवाद गुजरात और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इर्दगिर्द घूमता है। हालांकि सरकार इससे अपना पल्ला झाड़ चुकी है।
कहते हैं मोदी साहब(नरेंद्र मोदी) चाहते थे कि गुजरात को टीम मिले और उसे दिलाने के पक्ष में ललित मोदी भी थे। ललित मोदी और बीजेपी की नजदीकियां जगजाहिर हैं जिसका नरेन्द्र मोदी भी फायदा उठाना चाहते थे। उसमें कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने टीम मिलने के तमाम संभव प्रयास किये। निवेशक भी खड़े कर दिए जो 1500 करोड़ लगाने को तैयार थे (अदानी के अलावा दो पार्टनर थे जिसमें एक केंद्रीय मंत्री का भी स्टेक कहा जा रहा है)।
बोली लगने से पहले ललित मोदी की गुजरात क्रिकेट असोसिएशन के उपाध्यक्ष और गुजरात के गृहराज्य मंत्री से बैठक भी हुई उस बैठक में अदानी भी शामिल थे। कहा यह जा रहा है कि अदानी को कितनी बोली लगानी है यह इस मीटिंग में तय हुआ। सब कुछ फूलप्रूफ था। गुजरात क्रिकेट असोसिएशन आश्वस्त था कि टीम अहमदाबाद को मिल ही जाएगी। पर कोच्चि ने पूरे अरमानों पर पानी फेर दिया।
हालांकि कोच्चि को अहमदाबाद से ज्यादा बोली नहीं लगाने के लिए भी साम, दाम, दंड और भेद की राजनीति की गयी। यह नरेन्द्र मोदी के लिए झटका था चूंकि गुजरात क्रिकेट असोसिएशन ललित मोदी के शब्दों पर काफी आश्वस्त था। यहां तक कि टीम के नाम भी तैयार हो चुके थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसमें विरोधी मोदी (नरेन्द्र मोदी) की हार देख रहे हैं।
भैया सबकुछ सामान्य था तो महज साठ सत्तर करोड़ के लिए ही मामला कैसे अटका यह जीसीए के पदाधिकारियों को समझ नहीं आ रहा था। कुछ तो ऐसा हुआ जिसने नरेन्द्र मोदी के हाथ से बाज़ी छीन ली। अब गुजरात क्रिकेट असोसिएशन के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं था। सब पता लगा रहे थे कि चूक कहां हुई। ऐसे में जानकारी मिली कि कोच्चि टीम में पैसे लगाने वाले एक दो को छोड़कर सभी लोग गुजराती हैं। यह बात गुजरात क्रिकेट असोसिएशन को और खासकर मुख्यमंत्री को रास न आये यह स्वाभाविक है। एक ओर गुजरात को टीम नहीं मिल रही तो दूसरी ओर टीम न मिलने के पीछे की वजह भी गुजराती बन रहे हैं। अगर कोच्चि टीम मैं पैसे लगाने वाले गुजरात की टीम के लिए पैसे लगाते तो शायद माजरा कुछ और ही होता। यह बात चुभने लगी।
नरेन्द्र मोदी के विरोधियों की मानें तो यह जानकारी ललित मोदी को मुहैया कराई गई और ललित मोदी ने कोच्चि टीम में पैसे लगाने वाले स्टेक होल्डर के नाम सार्वजनिक करने के लिए दबाव बनाया। कोच्चि के मालिकों के लिए दिक्कतें यह भी थीं कि वो परदे के पीछे रहना चाहते थे। अगर नाम सार्वजनिक होते हैं तो बड़े बिजनेसमैन होने के नाते केंद्र और राज्य सरकार दोनों को नाराज भी नहीं कर सकते। खासकर उनके बड़े उद्योग घराने गुजरात में होने के चलते वो मोदी को भी नाराज नहीं करना चाहते थे। अगर नाम सार्वजनिक होते हैं तो सुनंदा का भी जिक्र होना स्वाभाविक है। आगे की कहानी तो आप जानते ही हैं।
हालांकि ये मुद्दा, विवाद बन गया तो मंझे हुए राजनेता नरेन्द्र मोदी पिक्चर में होने के बावजूद अपने आपको पिक्चर से गायब रखने में सफल हुए। चूंकि जो करना था वो हो रहा है और अब आप और हम सब उसी इंडियन पॉलिटिकल लीग का तमाशा देख रहे हैं।






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