Monday , October 22, 2012 at 21 : 32

मोदी के साथ यात्रा में जो देखा!


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मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी विवेकानंद युवा विकास यात्रा लेकर गुजरात के गांवों में घूमे। कभी उत्तरी गुजरात, तो कभी दक्षिण गुजरात, तो कभी सौराष्ट्र। जी हां, सौराष्ट्र जहां इस बार कई मुद्दे ऐसे हैं जो साल के आखिर में होने वाले चुनाव में मोदी सरकार के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। हमने भी उन इलाकों का दौरा किया और जानने की कोशिश की कि क्या मोदी का करिश्मा या जादू अभी भी बरकरार है या उसमें कोई कमी आई है?

गुजरात का सौराष्ट्र सात जिलों से बना वो इलाका है जो गुजरात की राजनीति की दशा और दिशा तय करता है इसलिए कोई भी राजनीतिक दल या कहें नेता सौराष्ट्र के अस्तित्व को नजरअंदाज नहीं कर सकता और अगर किया तो इसका राजनीतिक नुकसान तय माना जाता है। ऐसे में राजनीति की अच्छी समझ रखने वाले मोदी इसे हलके में कैसे ले सकते हैं। खासकर तब जब कुछ मुद्दों ने वैसे ही चुनाव से पहले सरकार की नींद उड़ा रखी है। मोदी की यह विकास यात्रा सुरेंद्रनगर जिले के लिंबडी से शुरू हो रही थी।

यात्रा से पहले मोदी आमतौर पर सभा को संबोधित करते हैं। मोदी जैसे ही भाषण देने के लिए खड़े हुए वहां जुटी या कहिए जुटाई गई भीड़ के चेहरे पर अलग सी खुशी देखने को मिली। मोदी ने एक के बाद एक मुद्दे लोगों के सामने रखे। पूरे पंडाल में शांति थी। आवाज सिर्फ मोदी की सुनाई दे रही थी। मोदी के निशाने पर केंद्र सरकार थी जिसे वो किसान विरोधी बता रहे थे। मोदी सुरेंद्रनगर के किसानों के विकास के लिए क्या कुछ किया और क्या कुछ करने वाले हैं, इसकी समझ दे रहे थे। वो भी बिल्कुल सरल भाषा में।

मोदी ने अपना भाषण पूरा किया और रथ पर सवार होकर निकल पड़े अहमदाबाद जिले के रानपुर की ओर। मोदी सौराष्ट्र में दो दिन बिताने वाले थे। उन्हें अपनी यात्रा में दस विधानसभा क्षेत्र कवर करने थे। दो दिन में उनकी यात्रा 272 किलोमीटर चलने वाली थी। रूट लंबा था। रास्ते में आ रहे छोटे-छोटे गांवों में लोग मोदी की इस यात्रा का स्वागत करने खड़े नजर आ रहे थे। मानो गांव में उत्सव मनाया जा रहा हो।

छोटी-छोटी जगहों पर भी मोदी जनता से रूबरू हो रहे थे। जहां उनका स्वागत किया जा रहा था, वहां वे रुककर दो-पांच मिनट भाषण भी देते थे। ज्यादा समय इसलिए भी नहीं दे पाते थे क्योंकि उन्हें लंबा रास्ता जो काटना था। मोदी पहुंचते हैं रानपुर जहां लोगों की भीड़ ही जवाब दे रही थी कि मोदी वहां कितने लोकप्रिय हैं। जबरदस्त भीड़ ने उन्हें रथ के ऊपर से ही सभा को संबोधित करने पर मजबूर किया। चंद मिनट रुककर बोटाद की और निकले। भावनगर जिले का बोटाद बीजेपी का गढ़ माना जाता है। 2007 के चुनाव में बोटाद से सौरभ दलाल जीतकर आए थे। दलाल मोदी मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री हैं।

मोदी को यहां पर भी अपने रथ की हाइड्रोलिक लिफ्ट से ही बाहर आकर सभा को संबोधित करना पड़ा क्योंकि बेहिसाब भीड़ मंच तक जाने ही नहीं दे रही थी। मोदी के भाषण में बातें वही थीं जो वे लिंबडी में बोले थे। भाषण के आखिर में मोदी ने बोटाद को एक नया जिला बनाने की घोषणा करके लोगों की खुशी डबल कर दी। मोदी ने अहमदाबाद जिले की दो तहसील और भावनगर जिले की दो तहसील मिलाकर एक नया जिला बनाने की घोषणा की। एक के बाद एक नए जिले बनाने की घोषणा करना मोदी का एक राजनीतिक पैंतरा है। यह जिला 26 जनवरी से कार्यरत होगा। इस घोषणा से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मोदी अपनी जीत को लेकर कितने आश्वस्त हैं।

भीड़ का शुक्रिया अदा करते हुए मोदी अब निकले भावनगर जिले के गढ्डा और ढसा की ओर। शाम के छह बज चुके थे। मोदी अपने निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक ही चल रहे थे। यात्रा का अगला स्टॉप अमरेली जिले का लाठी गांव था। अंधेरा हो चुका था। बावजूद लोग मोदी के स्वागत के लिए जगह-जगह खड़े थे। कई जगहों पर बारिश ने मजा किरकिरा किया। मोदी आखिर में पहुंचे अमरेली जहां उन्हें एक बड़ी सभा संबोधित करनी थी। गुजरात के राजनीतिक एपी सेंटर कहे जाने वाले अमरेली से सांसद हैं बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पुरुषोत्तम रूपाला और विधायक हैं मोदी के मंत्रिमंडल के कृषि मंत्री दिलीप संघानी। सभा में इकट्ठा हुई भीड़ को देखकर मोदी के तेवर क्या थे, ये आगे बताऊंगा लेकिन मोदी भाषण में फिर से एक बार कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहते हैं कि इसबार के चुनाव में कांग्रेस नहीं बल्कि सीबीआई उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाली है।

रात हो चुकी थी। मोदी तकरीबन 140 किलोमीटर का रास्ता काट चुके थे। मोदी को अमरेली में ही रात को रुकना था। सुबह अमरेली जिले के बगसरा से उन्हें निकलना था। तारीख 24 सितंबर को मोदी बगसरा के लिए निकले। बगसरा में भीड़ नौ बजे से ही उन्हें सुनने के लिए इकट्ठा थी। भीड़ में महिलाओं की तादाद ज्यादा थी। मोदी की आवाज आज उनका साथ नहीं दे रही थी। लगातार 12 तारीख से चुनावी यात्रा लेकर निकले मोदी की आवाज में थोड़ी खराश थी। बावजूद उन्होंने भीड़ को नाराज नहीं किया और वही मुद्दे छेड़ दिए जो वो लिंबडी,बोटाद या अमरेली में उठा चुके थे।

मोदी की बगसरा रैली एक लिहाज से सफल रही। मोदी का चेहरा बताता है कि वो सभा में इकट्ठी भीड़ से खुश थे। मोदी का अगला पड़ाव था कुकवाव वहां से गोंडल, जेतपुर और धोराजी। धोराजी में एक सभा को संबोधित करना था। सुबह साढ़े आठ बजे से निकले मोदी आखिर ढाई बजे धोराजी पहुंचे। धोराजी में दिन की मोदी की आखिरी सभा थी। दो दिन में मोदी पांच जिलों को कवर कर चुके थे। दो दिन तक मोदी के साथ लगातार रहने और देखने के बाद यह तो पता चला कि मोदी का करिश्मा अभी भी बरकरार है। भले ही भीड़ को इकट्ठा करने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करने का आरोप उनपर लगता रहा हो। सवाल अब यह भी कि आखिर मोदी को अचानक यह यात्रा निकालने की जरूरत क्यों पड़ी?

कहते हैं राजनीति में कुछ भी ऐसे ही नहीं होता। विवेकानंद युवा विकास यात्रा के पीछे भी मोदी की गहरी सोच है। क्या है मोदी की वो गहरी सोच और क्या है मोदी का राजनीतिक गणित? मोदी एक मंझे हुए राजनेता हैं। वो बिना कारण कुछ बोलते, करते नहीं। उनके शासन के दस साल पूरे हो चुके हैं। वो अतिआत्मविश्वास में नहीं रहना चाहते कि सब कुछ सामान्य है। ना ही वो अपने राजनीतिक मैनेजरों के इनपुट पर भरोसा कर रहे हैं। वो खुद गुजरात के राजनीतिक हालात समझना चाहते हैं। तभी तो उन्होंने चुनाव से ऐन पहले विवेकानंद युवा विकास यात्रा शुरू की।

यात्रा शुरू करने के पीछे एक गहरी सोच के साथ-साथ राजनीतिक गणित भी छिपा हुआ है। विवेकानंद युवा विकास यात्रा का रहस्य शायद युवा मतदाताओं की संख्या में छिपा हुआ है। साल के आखिर में होने वाले चुनाव में इस बार 18 से 29 साल की आयु के एक करोड़ 11 लाख 87 हजार मतदाता हैं। पहली बार ही मतदाता के तौर पर नामांकन करने वालों की संख्या 12 लाख 87 हजार है। गुजरात के कुल तीन करोड़ 78 लाख मतदाताओं में से 29 फीसदी मतदाता 18 साल से 29 साल की आयु वाले हैं। 30 से 39 साल की आयु वाले मतदाताओं की तादाद 93 लाख है। मसलन 18 से 39 साल के मतदाता कुल मतदाताओं के 53 फीसदी से ज्यादा हैं।

ये आंकड़े किसी भी समझदार राजनेता को गणित पढ़ने पर मजबूर कर देंगे। यही हुआ है मुख्यमंत्री मोदी के मामले में। इतनी भारी युवा मतदाताओं की तादाद के चलते ही मुख्यमंत्री ने पूरे गुजरात में 150 जगहों पर यात्रा और गांवों में विवेकानंद युवक मंडलों की रचना करके युवा मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की रणनीति बनाई है। साफ है कि मोदी विवेकानंद को माध्यम बनाते हुए शहरी और गांव के युवा मतदाताओं से सीधा संपर्क कर रहे हैं। युवा मतदाताओं में अपनी पकड़ मजबूत कराने के लिए मोदी ने अबतक खेल महाकुंभ,गूगल हैंगआउट,ब्लॉगर्स के साथ सीधा संवाद,विवेकानंद युवा परिषद और यात्रा,जैसे कई कार्यक्रम किए हैं।

इन युवा मतदाताओं से लगातार संपर्क में रहने के लिए मोदी का प्रचार कार्यक्रम भी समझने जैसा है। पिछले महीने मोदी सौराष्ट्र में अपनी यात्रा लेकर घूम रहे थे। दोपहर एक बजे लिंबडी से यात्रा शुरू करें उससे पहले सुबह 11 बजे वो उत्तर गुजरात के पाटन में विवेकानंद युवा परिषद करते हैं और हजारों युवाओं को संबोधित करते हैं। दोपहर वो सौराष्ट्र में अपनी यात्रा लेकर निकलते हैं। दूसरे दिन धोराजी में चार बजे अपनी यात्रा पूरी करके मोदी दक्षिण गुजरात में सूरत के लिए निकलते हैं एक और विवेकानंद युवा परिषद को संबोधित करने। मसलन, एक ओर गांवों में यात्रा होती रहे तो दूसरी और जिला स्तर पर। अलग-अलग शहरों पर सम्मेलनों के जरिए युवाओं से चुनावी संपर्क लगातार बनाया जा सके।

अमरेली में उम्मीद से कई गुना कम भीड़ देख मोदी ने संगठन और सरकार में शामिल लोगों की जबरदस्त क्लास ली थी। मोदी के पास भीड़ इकट्ठा नहीं होने के पीछे कारण भी थे। इनमें अमरेली में मंत्रिमंडल में शामिल मंत्री के प्रति लोगों की नाराजगी और संगठन से मंत्री की नहीं बनना प्रमुख है। जो भी हो मोदी ने आकलन कर लिया कि चुनाव में अमरेली सीट पर क्या कुछ होने वाला है। बोटाद की भीड़ देख मोदी अपने पूरे अंदाज में थे। लोगों का हुजूम उमड़ते हुए देख मोदी ने लोगों का शुक्रिया अदा किया था। मोदी एक ऐसे नेता हैं जो भीड़ को देखकर अपना अंदाज बनाते हैं या बदलते हैं। अमरेली में भीड़ नहीं होने के चलते मोदी के भाषण में भी वो करंट नहीं था जो बड़ी रैलियों में आमतौर पर होता है।

मोदी कहीं मुद्दों की तलाश में जूझते नजर आए। मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री,राहुल,सोनिया पर हमलों का नतीजा 2009 के लोकसभा चुनाव में क्या आया यह मोदी खूब जानते हैं। हां महंगाई एक मुद्दा है जो लोगों पर सीधा असर कर रहा है। पर उस विषय में मोदी अपने आपको कम्फर्ट जोन में नहीं मानते। मोदी ऐसे मंझे हुए नेता हैं जो साल के 364 दिन विकास की बात करेंगे पर मौके की नजाकत को देख एक दिन ही सही वो भावनात्मक कार्ड खेलेंगे। 2007 में मौत के सौदागर और सोहराबुद्दीन जैसे भावनात्मक मुद्दों ने मोदी को कितना फायदा कराया था, यह हर कोई जानता है।

विवेकानंद युवा विकास यात्रा में युवा और विकास दोनों को साथ में जोड़ा गया है। युवाओं को अपनी ओर खींचने के प्रयास में मोदी यह यात्रा निकाल रहे हैं। फर्क इतना पड़ा है कि विकास के मायने अब युवाओं को समझ में आने लगे हैं। अब यह बिल्कुल साफ हो चुका है कि मोदी ने चुनाव से ऐन पहले विवेकानंद युवा विकास यात्रा क्यों निकाली। मोदी युवाओं को अपना कोर वोट बैंक इसलिए भी मानते आए हैं क्योंकि पिछले एक दशक में युवा हुए लोगों ने मोदी को ही देखा और सुना है। इसके लिए आप मोदी के इमेज मेकिंग प्रयासों को भी जिम्मेवार मान सकते हैं। आलम यह है कि मोदी के अलावा युवाओं की जुबान पर दूसरे किसी मंत्री या विपक्ष के नेताओं के नाम तक नहीं हैं।

दरअसल चुनाव से पहले की हवा का रुख भी मोदी ने इस यात्रा के जरिये भांप लिया है। साथ में संगठन की भी परीक्षा ले ली है। मोदी के यात्रा रूट में आ रहे चुनावी क्षेत्रों में स्थानीय नेता या विधायक या मंत्री कितनी भीड़ इकट्ठा कर पाए, इससे मोदी अंदाजा लगा लेते हैं कि उस क्षेत्र में बीजेपी की क्या स्थिति है। मोदी के साथ जहां-जहां घूमा, मैंने देखा कि मोदी की लोकप्रियता कम होने के बजाय बढ़ी ही है। अब इसका फायदा मोदी निश्चित तौर पर चुनाव में उठाएंगे। मोदी कितनी सीटें जीतेंगे? केशु भाई क्या कोई नुकसान पहुंचाएंगे? नए सीमांकन के बाद क्या कुछ समीकरण है? समझेंगे अगले लेख में...!

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