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जय प्रकाश सिंह
Monday , November 02, 2009 at 10 : 10

हार का कारण ढूंढ रहा हूं....


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22 अक्टूबर की सुबह 6 बजे थे, मैं बाल ठाकरे के बंगले के सामने खड़ा था। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आने वाले थे-सिर्फ दो घन्टे बचे थे। 8 बजे से रुझान आने का दौर शुरू हो होने जा रहा था। मैं लाइव देने के लिए तमाम आंकड़े जमा कर ही रहा था कि शिवसेना के एक बड़े नेता का मेरे मोबाइल पर एसएमएस आया - 'विजय आमचीच होणार-साहेबांच आदेश आलय...आजचा सामना वाचा- आम्हाला 160 सीट येतंय'- मराठी भाषा में इस एसएमएस का मतलब था -जीत हमारी ही होगी, साहेब का आदेश आया है, आज का 'सामना' अखबार पढ़ो, हमें कुल 160 सीटें मिल रही हैं-

शिवसेना के इस नेता का इतना आत्मविश्वास देखकर मैं खुद चौंक गया। वह भी ऐसे समय में जब राज ठाकरे फेक्टर के चलते कोई भी एक्जिट पोल शिवसेना बीजेपी को 110 से 120 से ज्यादा सीटें देने को तैयार न था। मैं पेपर स्टॉल के पास दौड़ा। 3 रुपए में 'सामना' खरीदकर मैंने हेडलाइन पढ़ी-लोकसभा के मुकाबले महाराष्ट्र में 15 प्रतिशत और मुंबई में 12 प्रतिशत ज्यादा मतदान हुआ है इसलिए सेना-बीजेपी को 160 सीटें, राज ठाकरे की एमएनएस को 10 सीटें और कांग्रेस-एनसीपी को 90 सीटें ही मिलेंगी- मैं खुद इस कैल्कुलेशन को हजम नहीं कर पा रहा था लेकिन ये कहावत भी मुझे याद थी कि क्रिकेट और राजनीति में आखिरी क्षण तक कुछ भी हो सकता है-मैं सुबह 6 से 9 लगातार तीन घन्टे के लाइव पर खड़ा था। आशुतोष जी और संदीप चौधरी की तेज धार और पॉलिटिकल ज्ञान के सामने जब मैंने 'सामना' अखबार में बाल ठाकरे का 160 सीटों का दावा पढ़कर सुनाया तो निश्चित तौर पर वे दोनों भी चौंके होंगे और स्टूडियो में बैठे गेस्ट भी। आश्चर्यजनक रूप से 8 बजे जो पूरे महाराष्ट्र से पहला रुझान आया वो भी शिवसेना के फेवर में था। तीन सीट पर शिवसेना गठबंधन और 1 पर काग्रेस गठबंधन आगे। लगा मानो बालासाहेब का सपना सच होने जा रहा है लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलता गया बालासाहेब का सपना चकनाचूर होता गया।

काग्रेस+ को 90 सीटें देने वाले बाल ठाकरे को खुद 42 सीटों पर और उनकी सहयोगी बीजेपी को 44 सीटो पर ही संतुष्ट होना पड़ा। यानी खुद दोनों 90 का आंकड़ा पार नहीं कर पाए। 160 तो दूर की बात हां एमएनएस ने जरूर 10 के बजाय 13 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया। कांग्रेस+ को 144 सीटें मिलीं। यानी कांग्रेस सत्ता बना चुकी थी। शाम हो गई-तमाम सेना-बीजेपी के नेताओं ने अपनी हार स्वीकार ली लेकिन न तो उद्धव ठाकरे कुछ बोले और न ही बालासाहेब। सरकार राज के सरकार बनाने का सपना उनके प्यारे राज ने ध्वस्त कर दिया था। उस राज ने जिन्हें उंगली पकड़कर 70 के दशक से बालासाहेब ने राजनीति करना सिखाया था। 26 अक्टूबर को मैं दोबारा शिवसेना भवन में उस नेता से टकराया। 26 अक्टूबर को पहली बार हार का कारण बताने के लिए उद्धव मीडिया के सामने आए थे। काउंटिग के 4 दिन बाद मैंने उस नेता से सवाल पूछा। क्यों सर आखिर कहां चूक हो गई? उन्होंने चौंककर मुझे देखा, फिर न चाहते हुए भी जवाब दिया। पूरी पार्टी ढूंढ रही है और मैं भी इसी काम में लगा हूं कि आखिर इतनी मेहनत के बाद भी हार कैसे हुई। वो भले ही खुलकर कुछ न कह पाए हों लेकिन उनकी आंखों ने सब कुछ बता दिया। सही समय पर सही निर्णय न लेना और सही व्यक्ति को सही जिम्मेदारी न देना ही शिवसेना की पराजय का कारण बना है। दरअसल ये लोकसभा के चुनावी नतीजों के बाद ही बालासाहेब को समझ जाना चाहिए था कि राज ठाकरे उनके 1995 के बाद दुबारा सत्ता पाने के मंसूबो पर पानी फेरने वाले हैं।

विधानसभा चुनाव के 4 महीने पहले ही आए लोकसभा चुनाव के नतीजों में मुंबई की सभी 6 सीटें, रायगढ़, नासिक, ठाणे,नवी मुंबई की 10 सीटों पर राज फैक्टर ने शिवसेना-बीजेपी को पटखनी दे दी थी। इस चुनाव में एमएनएस 9 विधानसभा सीटों पर पहले नंबर पर रही और 11 सीटों पर दूसरे नंबर पर। यानी आगाज साफ था कि विधानसभा में भी राज ठाकरे की सेना कम से कम इन सीटों पर शिवसेना को जरूर भारी पड़ेगी और हुआ भी वैसा ही -शिवडी, मागाठणे, विक्रोली, माहिम जैसी मराठी बहुल सीटों पर एमएनएस ने एकतरफा कब्जा जमा लिया। मराठी युवा शक्ति ने राज को एकतरफा सपोर्ट दे दिया। वो सपोर्ट जो कल तक बालासाहेब के साथ था लेकिन आज उद्धव के साथ नहीं जा सका।

लाख टके का सवाल है कि आखिर क्यों बालासाहेब के आदेश पर मर मिटने वाली मराठी शहरी जनता ने उनके भावनात्मक आदेश के बाद भी उद्धव को नहीं अपनाया। वो राज की तरफ झुक गए। कारण जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। 1978 से अपने चाचा के साथ महाराष्ट्र भर के दौरे पर शौकवश जाने वाले राज ठाकरे ने 1985 से एक्टिव पॉलिटिक्स में कदम रखकर ये जता दिया था कि बालासाहेब का करिश्मा अगर किसी में आगे देखने को मिलेगा तो वो राज ही होंगे।

राज लगातार अपने चाचा से सीखते जा रहे थे। हूबहू उन्हीं की तरह भाषण देने की शैली, बात करने का अंदाज, शब्दों को हवा में उछालने का अंदाज, कार्टूनिस्ट का अंदाज, चलने-देखने का अंदाज और यहां तक की उन्हीं के शौक को राज ने पूरी तरह से अपने में रचा बसा लिया। बाल ठाकरे जहां मराठी कोर ग्रुप और बुजुर्गों में लोकप्रिय हो रहे थे तो राज के साथ युवा पीढ़ी कदमताल करती नजर आने लगी थी। महाराष्ट्र का कोंकण इलाका हो या विदर्भ, उत्तर महाराष्ट्र हो या पश्चिम महाराष्ट्र या फिर मराठवाड़ा। राज्य के किस जिले, तालुका या कई जगहों पर गांव में कौन शिवसेना का नेता-कार्यकर्ता है उन्हें राज नाम से, चेहरे से जानने लगे। राज सभी के लिए एक्सेसेबल रहते। 1986 में मुंबई महानगरपालिका में ज्यादा से ज्यादा युवा कार्पोरेटर्स को जिता के लाने से लेकर नाशिक, पुणे, जलगांव, कणकवली, सिन्धुदुर्ग, कोल्हापुर, नगर, अमरावती, औरंगाबाद नगरपालिका में शिवसेना को बहुमत में लाने में राज ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। 1995 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना को सत्ता में बिठाने और 30 निर्दलीयों और काग्रेंसी बागियों को तोड़कर शिवसेना के समर्थन में लाने और यहां तक कि तमाम विरोध के बावजूद मनोहर जोशी को सीएम बनवाने में राज ठाकरे का बड़ा अहम रोल रहा।

राज ही पहले शख्स हैं जिन्होंने एसआरए योजना, शिवशाही पुनर्वसन प्रकल्प, 55फ्लाईओवर ब्रिज की परिकल्पना और देश में पॉप स्टार माइकल जैक्सन का पहला लाइव शो करवाने में सफल रहे। ये शिवसेना का सरकार राज था। 1995 से 1999 तक लेकिन पार्टी के इसी सुनहरे दौर में ठाकरे परिवार में एक और नेता का जन्म हुआ उद्धव ठाकरे। बाल ठाकरे के अपने सगे बेटे। 1997 से उद्धव बालासाहेब के साथ रैलियों-पदयात्राओं में नजर आने लगे। पार्टी के अंदरूनी मामलो में दखल देने लगे। कार्पोरेटर की टिकट बांटने से लेकर सरपंच बनवाने तक में अपनी चलाने लगे। राज ठाकरे को लोगों को नजरअंदाज किए जाने की शुरुआत यहीं से हुई। सब कुछ देखते, जानते हुए भी पार्टी के बड़े नेताओं ने चुप्पी साध ली। भला बड़े साहेब के बेटे के खिलाफ कौन बोले। 1998 से राज धीरे-धीरे पार्टी की मुख्य धारा से खुद को जानबूझकर दूर करने लगे। 1999 के विस चुनाव में भी उन्होंने ठीक से हिस्सा नहीं लिया। उनके ज्यादातर समर्थकों को टिकट नहीं मिला था। नतीजा पार्टी दुबारा सत्ता में नहीं आ पाई जबकि कांग्रेस से अलग होकर शरद पवार ने खुद की पार्टी बना ली थी लेकिन शिवसेना बीजेपी मिलकर भी इन दोनों को हरा नहीं पाई।

कांग्रेस ने नई नवेली एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली। राज 3 साल तक अज्ञातवास में चले गए। शिवसेना के किसी भी एजेंडे में उनका कोई एक्टिव योगदान नहीं रहता था। शिवसेना में सभी ने कहा कि राज ठाकरे के ना रहने के कारण नुकसान हुआ लेकिन उद्धव की हठधर्मिता जारी रही। बालासाहेब का उन्हें खुला सपोर्ट मिलता गया। 2004 के विस के चुनाव में फिर वही गलती हुई। शिवसेना-बीजेपी फिर हार गईं। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे बीमार रहने लगे। उद्धव ने कमान पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली और राज फिर दो साल के लिए अज्ञातवास में चले गए।

2006 में राज ने अपनी पार्टी बनाई। नाम दिया महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना। सबसे पहले राज की पार्टी में युवा मराठी लड़कों ने प्राथमिक सदस्यता ली और बाकी लोगों को भी सदस्य बनाने लगे। शिवसेना वालों ने कहा कि राज की सेना बंदरो की सेना है लेकिन यही बंदरो की सेना धीरे-धीरे इतनी बड़ी हो गई कि 2009 के लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में शिवसेना की हार का सबसे बड़ा कारण बनी। आगे राज ठाकरे की ये सेना और क्या-क्या तबाही मचाएगी और 40 साल से बुर्ज सेना के किले में और कितनी सेंध लगाएगी इसका अंदाजा खुद बीजेपी को भी है। कांग्रेस-एनसीपी को भी और राजनैतिक पंडितो को भी लेकिन शायद शिवसेना के नेता अभी और काफी समय तक हार का कारण ही ढूंढने में अपने आप को बिजी रखेंगे और ये उनके लिए जरूरी भी है क्योंकि बाकी काम तो खुद राज कर ही रहे है।

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