वैसे तो महाराष्ट्र की राजनीति ने कई ऐसे बदलाव की बयार को छुआ है जो अप्रत्याशित थी और अकाल्पनिक थी। यानी जो कल्पना के परे थे और किसी ने सोचा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। 60 के दशक में जब यशवंतराव चव्हाण को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त महाराष्ट्र का पहला मुख्यमंत्री बनने के दो साल के भीतर ही दिल्ली में बुला लिया तो कई राजनीतिक पंडितों ने इसे चव्हाण की राजनीतिक हत्या तक करार दे दिया था। भारत-चीन सीमा विवाद बढ़ने के बाद 1962 में तात्कालीन रक्षामंत्री कृष्णा मेनन को इस्तीफा देना पड़ा और पंडित नेहरू ने यशवंतराव को केन्द्र में रक्षामंत्री बना दिया लेकिन जब 1966 में वे केन्द्र में गृहमंत्री बने तो ये लगा कि उनका निर्णय सही था।
महाराष्ट्र की राजनीति को हिला देनी वाली दूसरी बड़ी घटना तब घटी जब 1978 में यशवंतराव चव्हाण ने कर्नाटक के दिग्गज कांग्रेसी देवराज यूआरएस के साथ मिलकर इन्डियन कांग्रेस एस पार्टी बना ली। इस पार्टी को इन्दिरा गांधी विरोधी करार दिया गया जिसमें ए के एंटनी,शरद पवार और ब्रह्मानंद रेड्डी जैसे नेता थे। 1978 से 1980 तक यशवंतराव जहां चौधरी चरण सिंह की सरकार में पहली बार देश के उपप्रधानमंत्री बने तो वहीं शरद पवार पहली बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री लेकिन 1980 में इन्दिरा कांग्रेस की आम चुनाव में देशभर में हुई जोरदार वापसी ने जहां यशवंतराव को एक साल के राजनीतिक वनवास पर भेज दिया वहीं शरद पवार को महाराष्ट्र में नेता विपक्ष के तौर पर संतोष करना पड़ा।
जो यशवंतराव नेहरू-गांधी परिवार के आंख-कान माने जाते थे उन्हें नेहरू परिवार से दगा करने के चलते एक साल घर बैठकर बिताना पड़ा और महाराष्ट्र को गैर मराठी मुख्यमंत्री का दंश झेलना पड़ा। इसके बाद भी कई ऐसे दौर आए जब महाराष्ट्र ने अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम देखे। 1980 के दशक में शिवसेना के कद्दावर नेता छगन भुजबल का कई विधायकों के साथ पार्टी छोड़ना रहा हो या फिर मुंबई में हुए दंगे और धमाकों के बाद 1995 में आई शिवसेना-बीजेपी की सरकार,विलासराव देशमुख को मुख्यमंत्री पद की गद्दी से 2000 की शुरुआत में हटाकर दलित नेता सुशील कुमार को सीएम बनाना रहा हो या अशोक चव्हाण को हटाकर पृथ्वीराज चव्हाण को सीएम बनाना रहा हो।
राज ठाकरे का अपने चाचा बाल ठाकरे को छोड़कर नई पार्टी बनाने का मामला भी सूबे की सबसे बड़ी राजनीतिक खबर रही थी लेकिन जो घटनाक्रम महाराष्ट्र ने 19 जनवरी 2012 को और 20 जनवरी 2012 को हुआ, उससे राजनीति का खेल कितना गंदा-मतलबपरस्त है इसका एक और जीता जागता प्रमाण मिल गया। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता गोपीनाथ मुन्डे के सगे बड़े भाई पंडित मुन्डे को शरद पवार के भतीजे अजीत पवार एनसीपी में खींच लाए। इस दलबदलाव के लिए अजीत ने जगह भी चुनी उसी परळी तहसील की जहां गोपीनाथ मुन्डे का जन्म हुआ। जहां प्रमोद महाजन ने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। पूरे तामझाम और मराठवाड़ा के कई जिलों के विधायकों-सांसदों और पार्टी कार्यकर्ताओं को बुलाकर एनसीपी नेता अजीत पवार से पहले तो गोपीनाथ के भाई पंडित अन्ना और भतीजे धनंजय मुन्डे के जरिए जमकर गोपीनाथ के खिलाफ जहर उगलवाया और फिर खुद सरकारी आश्वासनों की बौछार कर ये भी जता दिया कि वह सूबे के उपमुख्यमंत्री हैं।
राजनीतिक पंडितों और विशेषज्ञों का कहना है कि अजीत पवार ने इसलिए गोपीनाथ मुन्डे के खिलाफ इतनी बड़ी राजनीतिक चाल चली ताकि वो मुन्डे के बहाने अपनी ही पार्टी के ओबीसी नेता छगन भुजबल को ये मैसेज दे सकें कि राजनीति में कभी भी कुछ भी स्थिर और सगा नहीं होता। भुजबल ने पिछले विस चुनाव में राज्यभर में ओबीसी उम्मीद्वारों के लिए टिकट को लेकर पार्टी की कोर कमिटी जिसमें अजीत पावर और खुद शरद पवार थे काफी परेशान किया था। विस चुनाव के पहले सभी पार्टी के ओबीसी नेताओं की एक रैली की घोषणा की थी जिसमें मंच पर ओबीसी नेता बीजेपी गोपीनाथ मुन्डे भी आनेवाले थे। उस वक्त तो भुजबल-मुन्डे द्वारा एक नई ओबीसी पार्टी बनाने तक की बात होने लगी थी। मुन्डे भी अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी से नाराज चल रहे थे। गडकरी ने महाराष्ट्र के उनके कई समर्थकों के पर कतर दिए थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद तो गडकरी और मुन्डे का विवाद और भी चरम पर पहुंच गया। एनसीपी को पता था कि अगर भुजबल-मुन्डे ने नई पार्टी बनाई तो इसका नुकसान सबसे ज्यादा एनसीपी को होगा। मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र में पार्टी और कमजोर हो जाएगी।
राजनीतिक पंडित मानते हैं कि इसी वजह से एक एजेन्डे के तहत गडकरी-पवार ने 'समझौता' किया और एनसीपी ने भुजबल की उस वक्त सारी शर्तें मान कर उनके कई उम्मीद्वारों को टिकट भी दिया लेकिन कहीं ना कहीं तब से ही अजीत पवार भुजबल के साथ मुन्डे का राजनैतिक कद भी कम करने में जुट गए। राजनीतिक पंडितों का ये भी मानना है कि इसके बाद ही तेलगी कान्ड और भ्रष्टाचार की बात कर भुजबल का उपमुख्यमंत्री पद भी उनसे ले लिया और मुन्डे के भतीजे धनंजय से अपने मैसेन्जरों के जरिए नजदीकियां बढ़ानीं शुरू कर दीं।
सूत्रों की मानें तो इस काम में खुद बीजेपी के कुछ लोगों ने पवार की मदद की जिसका अंत आखिरकार खुद धनंजय और उनके पिता पंडित अन्ना मुन्डे को अपने पाले में लाकर हुआ। हालांकि अभी तक धनंजय अपने पिता की तरह खुलकर एनसीपी के साथ नहीं जुड़ पाए हैं क्योंकि वो विधान परिषद के सदस्य हैं और उनके खिलाफ पार्टी कार्रवाई कर सकती है। ऐसे में धनंजय चाह रहे हैं कि पार्टी उन्हें खुद बीजेपी की सदस्यता से बर्खास्त कर दे ताकि उनका विधायक पद बना रहे। यही वजह है कि धनंजय ने फरवरी में बीड और मराठवाड़ा के कई जिलों में बीजेपी के जिला परिषदों को नहीं बल्कि एनसीपी के जिला परिषद उम्मीद्वारों को जिताने की रणनीती बनाई है और इशारों में वो इसका संकेत भी लगातार अपने हर भाषणों और कार्यक्रम में देने लगे हैं। वहीं इस झटके को गद्दारी का नाम देते हुए गोपीनाथ मुन्डे ने अजीत पवार और अपने भतीजे धनंजय पर खुला हमला बोल दिया है।
हालांकि गोपीनाथ मुन्डे ने अपने बड़े भाई के खिलाफ एक भी बुरा शब्द नहीं कहा लेकिन मुन्डे परिवार में आग लगाने के लिए अजीत पवार और जिला परिषद और विधायक बनाने के बाद भी 'पाला बदल' करने को लेकर धनंजय को परळी की जनता कभी माफ नहीं करेगी ऐसा आरोप लगाना शुरू कर दिया है। ऐसे में अब परळी, बीड और मराठवाड़ा में गोपीनाथ मुन्डे को जिला परिषद में बीजेपी की ज्यादा सीटें लाना नाक और प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।
इसी तरह 20 जनवरी को भी महाराष्ट्र की जनता ने राजनीति के इस खेल का एक और दृश्य अपनी आंखों से देखा। बीजेपी का घर तोड़ने का आरोप जहां भतीजे अजीत पवार पर लगा वहीं चाचा शरद पवार पर अपने सबसे करीबी मित्र के दिल को छलनी करने का। शरद पवार ने 20 जनवरी को उस वक्त सभी मीडियाकर्मियों को पत्रकार वार्ता में चौंका दिया जब उन्होंने मंच पर अपने साथ शिवसेना के कल्याण से लोकसभा सांसद आनंद परांजपे को ला खड़ा किया। हंसते-बेबी फेस लुक वाले आनंद परांजपे ने बड़ी ही मासूमियत से जब ये कहा कि शिवसेना में अब वो धार नहीं रही जो कुछ साल पहले हुआ करती थी। शिवसेना अब विकास की नहीं बल्कि मौकापरस्ती की बात करती है और किसी भी हाल में सत्ता पाने को बेकरार हो गई है। आनंद परांजपे ने सीधे-सीधे उद्धव ठाकरे पर ही इन नाकामियों का सेहरा बांध दिया। उस वक्त जिस-जिस ने टीवी पर ये खबर देखी और सुनी वो चौंके बिना नहीं रह सका। इसका कारण ये कि जिस ठाणे के कल्याण लोकसभा सीट से आनंद दो बार सांसद बने वो इलाका और वहां के लोग खुद शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के दिल से 40 साल से भी ज्यादा समय से जुड़े रहे।
ठाकरे को 1969 में पहली बार पार्षद और विधायक बनवाने का श्रेय इसी ठाणे ने दिया। खुद आनंद के स्वर्गीय पिता प्रकाश परांजपे ठाणे से वो पहले शिवसैनिकों में से रहे जिन्होंने कांग्रेस और वामपंथियो का किला तोड़कर शिवसेना की ताकत मजबूत की। 1971 से लेकर लगातार 30 साल प्रकाश परांजपे शिवसेना के पार्षद-विधायक और सांसद रहे। बाल ठाकरे और प्रकाश परांजपे के बीच दोस्ताना संबंध थे और हर चुनाव में ठाणे-कल्याण और नवी मुंबई में टिकट बंटवारा कमिटी में वो प्रकाश को जरूर रखते थे। उन्ही प्रकाश परांजपे के निधन के बाद उनके बेटे आनंद को बाल ठाकरे के कहने पर ही लोकसभा का टिकट दिया गया जबकि उस वक्त इस टिकट पर विधायक और दबंग नेता एकनाथ शिन्दे सहित कइयों की आंखें लगीं थीं लेकिन ठाकरे परिवार ने अपने करीबी परांजपे परिवार का भरोसा नहीं तोड़ा और खुद एकनाथ शिन्दे को आनंद को जितवाने का जिम्मा भी सौंप दिया।
आनंद को ठाणे के शिवसैनिकों ने एक नहीं दो बार जितवाया वो भी बड़े मार्जिन से लेकिन अचानक आनंद परांजपे के एनसीपी के मंच पर बैठ जाने से ऐसे तमाम शिवसैनिकों को गहरा सदमा लगा। वो भी ऐसे वक्त में जब बालासाहेब का जन्मदिन करीब था याने 23 जनवरी को था 20 जनवरी को आनंद को अपनी ओर खींचकर शरद पवार ने एक तरह से बाल ठाकरे को जन्मदिन का राजनीतिक तोहफा ही दे डाला। पूरा महाराष्ट्र जानता है कि बाल ठाकरे और शरद पवार के बीच में कितनी गहरी दोस्ती है। जब अन्ना हजारे ने पवार पर थप्पड़ मारे जाने पर अपनी प्रतिक्रिया में ये कह दिया था कि-सिर्फ एक ही झापड़ मारा तो अपने मुखपत्र सामना में बाल ठाकरे ने अन्ना को जमकर खरी खोटी सुनाई थी लेकिन आज उन्हीं पवार ने बाल ठाकरे को बड़ा झटका दे दिया।
23 जनवरी को जब शिवसेनिक बाल ठाकरे को उनके 85वीं जन्मदिन पर मातोश्री बंगले पर रुद्राक्ष से तौल रहे थे तो सभी ये जानने को उत्सुक थे कि ठाकरे पवार को लेकर क्या प्रतिक्रिया देते हैं लेकिन बाल ठाकरे ने बड़ी ही शालीनता से ये कहकर चौंका दिया कि शरद पवार आज भी उनके अभिन्न मित्र हैं और उन्होंने आनंद को क्यों तोड़ा ये उनसे ही पूछा जाए। जाहिर है ठाकरे पवार के खिलाफ कोई भी बयान देकर इस मसले को ठंडा होने देना नहीं चाहते क्योंकि शिवसेना आनंद परांजपे को गद्दार घोषित कर इस मुद्दे का भावनात्मक लाभ लेना चाहती है। ठाकरे ना तो आनंद को चुनाव खत्म होने तक पार्टी से निकालेंगे और ना ही उन्हें प्रचार में शामिल करेंगे। बस जनता को ये बताने की कोशिश करेंगे कि जिस आनंद को शिवसेना ने सबकुछ दिया वो अपने स्वार्थ के लिए एनसीपी में चला गया..






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