गुजरात का रामालिंगा राजू। जी, आपको यह सुनकर कुछ अटपटा लग सकता है लेकिन यह है सौ फीसदी सच। यह सच है उस गुजरात का जिसे आज भारत का सबसे विकसित, वाइब्रेंट गुजरात, व्यापर के हिसाब से मोस्ट फेवर्ड स्टेट और न जाने किन-किन नामों से जाना जाता है लेकिन क्या यह सच है ? क्या सबकुछ वैसा है जैसा दिखता है या फिर जैसा हमारे कानों को सुनाई पड़ता है?
अगर हम सुचना के अधिकार के तहत निकाली गई जानकारी पर गौर करें तो गुजरात का यह सच धूमिल नजर आता है। विश्वास तो नहीं होता है लेकिन करना पड़ेगा क्योंकि यह आंकड़े न ही कांग्रेस ने निकाले और न ही इसमें किसी मियां मुशर्रफ़ का हाथ है। ये आंकड़े हैं सरकार के, सरकार भी कहें तो केन्द्र के कांग्रेस सरकार नहीं, गुजरात सरकार के जिसके मुखिया हैं नरेंद्र मोदी जिन्होंने प्रचार और प्रसार माध्यमों से स्वर्णिम और वाइब्रेंट गुजरात का नारा बुलंद किया।
आरटीआई के तहत गुजरात सरकार के ही उद्योग विभाग द्वारा मुहैया करायी गई जानकारी उसी राज्य के मुख्यमंत्री के दावों की पोल खोलती है। इससे यह भी पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी हिंदू-मुस्लिम राजनीति के बाजीगर ही नहीं वह तो आंकडों के बाजीगर भी हैं जिस तरह सत्यम के मुखिया ने आंकडों से बाजीगरी की।
नरेन्द्र मोदी के अनुसार राज्य में वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स सम्मिट (वीजीजीआईएस) के दौरान प्राप्त हुए निवेश प्रस्ताव और उन प्रस्तावों का कार्यान्वन दर 63.5 प्रतिशत रहा जबकि असलियत में यह औसत 30 प्रतिशत को छू तक नहीं पाया। आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार यह आंकडा महज 25 प्रतिशत रहा। और भी कई ऐसे सच उजागर हुए हैं जो गुजरात के विकास के दावों के बिल्कुल उलट स्तिथि बयां करते है जो आपने विभिन्न समाचार पत्रों में पढ़े ही होंगे।
सिर्फ़ यही नहीं, बहुत सारे कारनामे ऐसे हैं जिसे यह बाजीगर अपनी उपलब्धि बतौर प्रस्तुत करता है जो सच्चाई से कोसों दूर हैं लेकिन इन्हें लगता है इनकी बात ही सही है और जन मानस को इनकी बात मानकर इन्हे प्रधानमंत्री कि कुर्सी तक पहुंचा दे।
आपको याद तो होगा ही जब गुजरात में धड़ाधड़ बम विस्फोट हो रहे थे। धड़ाधड़ बम मिले जा रहे थे। एक जगह बम को डिफ्यूज किया नहीं कि किसी दुसरी जगह बम मिलने की ख़बर आ रही थी। वो भी मोदी के गुजरात में। मानो दीवाली मनाने के लिए पटाखे रूपी बम का सेल का सेल लगा हो। सब एक से बढ़कर एक।
वो दिन गए जब बम भीड़भाड़ भरे इलाकों में ही सिर्फ़ प्लांट किए जाते थे। समय बदल चुका है और बदले ज़माने में बम भीड़भाड़ वाले इलाकों से निकल कर इन दिनों पेड़ की टहनियों से लेकर फ्लाईओवर पर फैले लंबे चौडे व आकर्षक होर्डिंग्स तक जा पहुंचा है।
भारत का हीरों की राजधानी कहे जाने वाले सूरत शहर में ही सिर्फ़ दो दिनों में 21 जिन्दा बम मिले। गौरतलब है अहमदाबाद में 17 बम धमाकों ने 53 लोगों जान लील ली जबकि 200 से ज्यादा जख्मी हुए और यह सब हुआ भारत के उस राज्य में जहां के "हिंदू ह्रदय सम्राट" मुख्यमंत्री गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने का दंभ भरते हैं।
तो क्या अब इन बम धमाकों के बाद हम कहें इनों जिस गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाया गया वहीं गांधी कि जन्मस्थली इंडियन मुजहिदीन जैसे संगठनों की भी प्रयोगशाला बन चुका है। अहिंसा के पुजारी के इस धरती पर हिंसा फैलाने के नए-नए तरीकों का प्रयोग हो रहा है। एक तरफ़ मोदी जी प्रयोग कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे कुछ संगठन।
गुजरात अब स्कुल और कॉलेज का प्रयोगशाला नहीं रहा जहां हम कभी गांधी के संदेशों और उनके बताये रास्तों पर चिंतन मनन कर देश और राज्य के विकास के बारे में प्रयोग किए जाते थे, वहां तो अब मजहबी आधार पर जान लेने और बख्शने का प्रयोग हो रहा है।
खैर गुजरात को प्रयोगशाला बनाने के दावे और प्रतिदावे का सच जो भी हो, सच तो यह है समाज के दो भाइयों के बीच नरेन्द्र मोदी और इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे नेताओं और आतंकी संगठनों ने नफरत की दीवार खड़ीकर कभी सांप्रदायिक सदभाव की मिसाल कायम करने वाले दोनो समुदाय के लोगों को एक दूसरे से हाथ छुड़ाकर अलग-अलग चलने के लिए मजबूर कर दिया।
मोदी जी एक बार तो आपने गुजरात में गोधरा का प्रयोग तो कर लिया लेकिन अब ये मेरी आपसे दरख्वास्त है अब ऐसा कोई और घिनौना प्रयोग करने की न सोचें। क्या हुआ आपके उन सशक्त और मजबूत गुजरात के दावों का। सोहराबुद्दीन का झूठा एनकाउंटर करने वाली नरेन्द्र मोदी की बहादुर गुजरात पुलिस के तो मानों हाथ पांव ही फूल गए। हो भी क्यों न। यह शायद पहली बार ही हुआ कि भारत के राष्ट्रपिता, जिसने आजादी की लड़ाई अहिंसा के पथ पर चलकर लड़ी और शक्तिशाली अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया, की धरती पर इतने बड़े पैमाने आतंकवादियों ने खुल्लम खुल्ला मौत का खेल खेला और मोदी जी के पास मृतकों के आश्रितों को मुआवजे का एलान के सिवा कुछ नहीं बचा।
और कर भी क्या सकते थे। भाजपा के दूसरे लौह पुरुष की इज्जत तो तार-तार उनके सूरत दौरे के दौरान ही हो गई। नहीं तो ऐसा कैसे हो सकता था कि हिंदू ह्रदय सम्राट के सूरत शहर में रहने के बावजूद कई जिन्दा बम मिले तो जरूर लेकिन फटे नहीं। अब भले ही गुजरात पुलिस कहती रहे कि ये बम चिप में आई कुछ तकनीकी कामियों की वजह से विस्फोटित नहीं हो पाए।
मोदी को कभी यहां कभी वहां बेखौफ बम रखकर शायद गुजरात दंगों के दौरान किसी संप्रदाय विशेष का कत्लेआम याद दिलाना चाह रही हो। वो याद दिलाना चाह रहे हों उस व्यक्ति के रोते हुए चेहरे की जिसकी छपाई कर अख़बार वालों ने खूब कमाई की तो कई चैनल टीआरपी रेटिंग में नम्बर एक हो गए। शायद याद दिलाना चाह रहे हों कि उन गर्भवती महिलाओं की जिनसे बेशर्मी के साथ बलात्कार और निर्ममता पूर्वक पेट से बच्चा खींचकर निकाल लिया गया था।
जिस तरह से सारे सूरत में विभिन्न स्थानों पर बम पाए गए , मेरी यही प्रार्थना है नरेन्द्र मोदी के भगवान से कि गुजरात दंगों के बाद अपनी पार्टी भाजपा द्वारा हिंदू सम्मान से सम्मानित राज्य के मुख्यमंत्री को कुछ याद आए और अपनी गलतियों का अहसास हो।
शायद उनको वह मौत का मंज़र भी याद आया हो। कैसे आती हैं मौत और क्या होता है मौत का नज़ारा। कैसा होता है कल तक अपने रहे और आज गैर बन चुके को खोने का ग़म।
मेरी इन बातों को इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठनों इनों तरफदारी न समझा जाय बल्कि इस बात पर चर्चा होनी चाहिए। आख़िर गुजरात को इन हालात में पहुंचाने का ज्यादा जिम्मेदार कौन है। हमारे "हिंदू ह्रदय सम्राट" और "हिंदू शिरोमणि" नरेन्द्र मोदी या फिर इंडियन मुजाहिद्दीन? अब इंडियन मुजाहिद्दीन जैसा आतंकी संगठन शान्ति की बात तो करेगा नहीं लेकिन शान्ति और अहिंसा के पुजारी की धरती पर पैदा हुए इस "इंसान" का क्या?














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