सुनने में यह बात कितनी अजीब लगती है कि एक विकास पुरुष का स्वयं के गृह जिले में, अपने ही विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में बहुप्रचारित विकास के मुद्दे पर लोगों ने बॉयकाट कर दिया। 'पुल नहीं तो वोट नहीं' के नारे के साथ लोगों ने उन्हें वोट की उम्मीद न रखने को कहा। जमकर नारे लगाए गए और यहां तक कह डाला कि हम आपको हराएंगे क्योंकि पिछले चुनाव के दौरान आपके द्वारा किए वादे अभी तक पुरे नहीं हुए। तुर्रा ये कि आप विकास के नाम पर वोट मांगने आए हैं।
आपने ये खबर हो सकता है न सुनी या फिर देखी होगी क्योंकि हमारा देश इतना पॉजिटिव थिंकिंग में यकीन करने लगा है कि मीडिया विकास विरोधी किसी भी ख़बर को ज्यादा तवज्जो नहीं देती। ऐसी खबरें या तो ली ही नहीं जातीं और ली भी जाती हैं तो टिकर डेस्क से आगे नहीं बढ़तीं। नहीं तो एंटी-एस्टैबलिश्मेंट मीडिया के लिए इससे बड़ी खबर और क्या हो सकती थी कि तमाम विकास के बड़े दावों के बीच एक मुख्यमंत्री को उन्हीं के गांव में भारी विरोध का सामना करना पड़े। ऐसा विरोध कि मुख्यमंत्री फिर उस गांव में न जाने की ठान लें।
खैर, जो भी कारण रहे हों, हम आपको संक्षेप में खबर बता देते हैं क्योंकि जो मैं कहना चाहता हूं उसे समझने के लिए इस घटना का जिक्र जरूरी है। हुआ यह कि गत 29 अप्रैल को विकासशील देश भारत के एक अत्यंत ही तीव्र गति से विकसित हो रहे विकासशील राज्य बिहार के विकास पुरुष मुख्यमंत्री अपने गृह जिले नालंदा में अपने विधानसभा क्षेत्र हरनौत के अपने ही समर्थकों के गांव में लोकसभा चुनाव में गठबंधन के उम्मीदवार के लिए वोट मांगने गए। सब कुछ ठीक चल रहा था। भाषण भी हुआ, विकास के दावे भी खुब किए गए लेकिन स्थिति उस समय बिगड़ गई जब उस सभा में मौजूद लोगों ने अपने क्षेत्र में एक महज छोटे से पुल के लिए मुख्यमंत्री को उनके द्वारा ही पिछले चुनाव के दौरान किया गया वादा याद दिलाया जिस पर जवाब में स्थानीय नेताओं द्वारा कहा गया कि पूरे बिहार में विकास हो रहा है और यहां भी होगा।
लेकिन जनता बेचारी का तो मानो सब्र का बांध टूटा जा रहा था और अब तो उम्मीदों के टूटने कि बात थी। सब्र का बांध इसलिए टूट रहा था कि पछले 15 सालों में उनकी मांग सुनी नहीं गई और जब अपने क्षेत्र के विधायक को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होता देखा तो उम्मीदें बंधीं कि अब तो पुल बन ही जाएगा। रोज अख़बारों और प्रसार माध्यमों में हो रहे राज्य के चहर्मुखी विकास और जमीनी हकीकत में अंतर आखिर कब तक कोई बर्दाश्त करता। अख़बार और चैनलों के माध्यमों से आभामंडल ऐसा फैलाया गया कि मानो यदि कोई अपने क्षेत्र में बिजली और पुल न होने कि बात करता तो उस अमुक व्यक्ति कि बातों पर गौर फरमाने कि बजाय उसे नीतीश विरोधी या फिर लालू का प्लांट ठहराकर बातों को अनसुनी कर दिया जाने लगा था।
ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री के विरोध से मैं अति प्रसन्न हो गया हूं और एक ख़ुशी के मारे एक ब्लॉग लिख दिया। हां, यह सच है कि मुझे इस बात की ख़ुशी है लोग सच और प्रोपेगेंडा में अंतर करना अभी नहीं भूले हैं। ख़ुशी इस बात की कि जनता अब जाग चुकी है। अपनी उपेक्षा पर अब वह चुप नहीं रहेगी और न ही जो कुछ दिखाया या फिर पढ़ाया जा रहा उसके बहकावे में कतई आएगी।
कहते हैं इस बार बिहार में सिर्फ विकास ही मुद्दा है और जाति व धर्म जैसे तमाम मिथक टूट गए हैं। सिर्फ विकास के नाम पर ही वोट मांगे जा रहे हैं और डाले जा रहे हैं। अगर ऐसा ही है तो छपरा के बावजूद आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव बाहुल्य पाटलीपुत्र सीट से क्यों चुनाव लड़ रहे हैं। चलो लालू को तो मान भी लेते हैं कि उन्हें डर हो सकता है अपने पंद्रह साल के राज का तो फिर विकासमुखी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष शरद यादव और ललन सिंह को क्यों अपनी जाति बाहुल्य लोकसभा क्षेत्र की ओर मुंह करना पड़ रहा है।
अगर विकास ही मुद्दा है और राज्य में धुंआधार विकास हुआ तो इन नेताओं को जाति और धर्म समीकरण को तोड़ते हुए कहीं से भी चुनाव लड़ लेना चाहिए। प्रदेश अध्यक्ष लालन सिंह अब भूमिहार बाहुल्य बने मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से और उसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव यादव बाहुल्य मधेपुरा से चुनाव लड़ रहे हैं।
जोर्ज फर्नांडिस को छोड़कर कोई भी ऐसा नेता आप बता दें जिसका न कोई खास जातीय आधार हो बिहार जैसे राज्य में लेकिन फिर भी अपने सिद्धांतों के बूते कम से कम किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ने का दम-ख़म तो रखते ही हैं और मुजफ्फरपुर से लड़ भी रहे हैं। भले ही परिणाम जो कुछ भी हों। सिद्धांतों के साथ चलने का क्या अंजाम होता है, सबको पता है।
सच्चाई तो यह है खुद सत्ताधारी पार्टी नहीं चाहती की विकास एक मुद्दा बने। अगर सच में यह मुद्दा बन गया तो हरनौत जैसी स्थिति राज्य के अन्य क्षेत्रों में भो होने लगेगी। जैसा की पिछले कुछ महीने में देखने को मिला। राज्य में 'सरकार आपके द्वार' कार्यक्रम के तहत मुख्यमंत्री के ग्रामीण इलाकों के दौरे के दौरान राज्य सरकार के छपरा के विधायक और काबीना मंत्री के साथ धक्कामुक्की, सहरसा में एक अन्य मंत्री बिजेंद्र यादव, जो सिचाई मंत्री हुआ करते थे जब कोसी बांध टुटा था, को जमकर लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ा था। अभी तो उस मंत्री को अपने प्रचार के दौरान कोई बड़ा नेता अपने साथ ले जाना नहीं चाहता।
इन सब के बावजूद अख़बारों में राज्य का विकास हो रहा है। अगर विकास को ही मुद्दा बनाया जाए तो कौन इस बात से इनकार करेगा इन 5 सालों में जितनी केन्द्रीय सहायता राज्य को मिली वो पहले कभी नहीं। युपीए के पहले एनडीए सरकार पर काबिज थी और कितना मिला बिहार को सब पता है वो भी ग्यारह मंत्रियों के बिहार से होने के बावजूद।
इतना तो सच है कि एनडीए के शासनकाल में बिहार से 11 मंत्री रहने के बावजूद बिहार को बाढ़ रहत के नाम पर 50 करोड़ मिलता था जबकि तेलगु देशम पार्टी आंध्र प्रदेश में बाढ़ के नाम पर 350 करोड़ ले जाती थी। अब यह किसे बताने कि जरूरत है उस 350 करोड़ की जरूरत बाढ़ की भयावह स्थिति के हिसाब से किसे थी - बिहार या फिर आन्ध्र प्रदेश को।
लालू समर्थकों के दावे सिर्फ इसलिए धरे के धरे रह जाते हैं क्योंकि उन्होंने पिछले पंद्रह सालों में विकास नहीं कर पाए लेकिन सचाई तो है। क्या कोई नेता सिर्फ अपने बूते और सिर्फ अपने विभाग से 65000 करोड़ का निवेश करा सकता है क्या?
रोज रोज अख़बारों में पुरे पन्ने पर और नेताओं द्वारा बार-बार राज्य के विकास के दावे पर अब जनता भी सवाल उठा रही है। आखिर ऐसा क्या हो गया बिहार में इन चार सालों में, कौन सा विकास, कैसा विकास और किसका विकास, चुनाव के पहले दिखाए गए सपनों के न पूरा होने पर लोग अब अपने आक्रोश का खुलकर इजहार कर रहे हैं।
सपने भी ऐसे थे जो शुरुआत में ही विश्वास के लायक नहीं थे लेकिन लोग विकास चाहते थे और उन्होंने उन सपनों को चुना। उदहारण के तौर पर, शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री ने सबसे पहले पूरे राज्य का तूफानी दौरा कर विभिन्न योजनाओं की नींव रखी। औसतन, एक जिले में साढ़े चार सौ करोड़ की योजनाओं के लिए आधारशिला रखी गई। वहीं अपने चिर प्रतिद्वंदी लालू के गृह जिले गोपालगंज में 600 करोड़ की योजनाओं के लिए शिलान्यास किया लेकिन अब चार साल पुरे होने को हैं और योजनाएं बस शिलालेख तक ही सिमट कर रह गईं। आखिर हों भी क्यों न। अब इन पैसों को जोड़ा जाय तो कुल 38 जिलों में चार सौ करोड़ की योजनाओं को पूरा करने के लिए 16000 करोड़ रुपये चाहिए थे। आखिर ये पैसे आते कहां से?
सो योजनाएं वहीं के वहीं रह गईं। सच्चाई तो यह है कि राज्य के पास पैसे ही नहीं हैं और सच्चाई भी यही है कि जो भी काम हो रहा वो केंद्र के पैसे से। इसलिए तो आरजेडी और कांग्रेस के नेता अपनी तारीफ करते अघाते नहीं कि कितना केन्द्रीय मदद उन्होंने राज्य को दिलवाया। लालू की तारीफ करते नहीं थकते उनके नेता यहां तक कह डालते हैं कि बिहार में शायद ही कोई नेता हो जिसने सिर्फ अपने विभाग से 65000 करोड़ का निवेश बिहार में किया।
अभी भी बिहार वैसा ही है जैसा पहले था। अगर बदला कुछ है तो वह वहां के सियासी हुक्मरान और पहले सत्ता को अपने जूते कि नोंक पर रखने वाले साधु-सुभाष की जगह अब अनंत और गोपाल ने ले ली है और क्या बदला है, क्या राज्य में बिजली रहने लगी है। लोगों को अगर अपना इंतजाम नहीं हो तो क्या साफ़ पानी पीने को मिलने लगा है? और तो और बिना केंद्र के पैसे के कौन सी सड़कें बन गईं। अगर ऐसा ही होता तो कम से कम हरनौत में तो अब तक पुल बन ही जाता और मुख्य मंत्री को अपमान सहन नहीं करना पड़ता।
कहने को तो सालों से जातीय व्यवस्था में जकड़े बिहार में चुनाव इस बार जातिगत आधार पर नहीं बल्कि विकास के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है लेकिन सिवाय अनपढ़ और गरीब लोग, जिन्हें अपने घर परिवार के लिए महज दो जून की रोटी की जुगाड़ की चिंता से फुर्सत नहीं होती छोड़कर सभी को बखुबी पता है आखिर नीतिश कुमार के इस विकास के मुद्दे के असल में मायने क्या हैं?
विकास को तो बस चालाकी से एक ऐसा लबादा ओढ़ा दिया गया है जिसके पीछे आज भी वही जातिवादी राजनीती काम कर रही है। बस अंतर है तो सिर्फ इतना की इसे इतने अच्छे चालाकी से प्रोजेक्ट किया गया है कि अगर विकास करना है तो आपको अमुक गठबंधन या अमुक पार्टी को वोट करना है जैसा एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था 'यु आर आइदर विथ अस और विथ टेररिज्म'














कमेंट्स
9