मायावती और मुलायम सिंह यादव दोनों लोकसभा चुनावों के नतीजों के आने के बाद से बौखलाए हुए हैं। आत्मचिंतन का दौर शुरू हो चुका है क्योंकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों ये जान चुके हैं कि उनका परंपरागत वोट बैंक बड़ी खामोशी से उन्हें छोड़ गया है।
उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के सबसे बड़े हिमायती कहे जाने वाले मुल्ला मुलायम सिंह ने इस बार 11 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। ये थे सहारनपुर से रशीद मसूद, संभल में इकबाल महमूद, अमरोहा से महबूब अली, अलीगढ़ से जफर आलम, पीलीभीत से रियाज अहमद, लखनऊ से नफीसा अली, श्रावस्ती से रूआब शाहीदा, घोसी से अरशद जमाल, कैराना से सादान मसूद, मुरादाबाद से हाजी रिजवान और मेरठ से शाहिद मंजूर।
लेकिन उन्हें समझ में तब आया जब उनमें से एक भी नहीं जीता यानी 11 के 11 को हार का मुंह देखना पड़ा। अब पार्टी में इस बात को लेकर मंथन तेज है कि क्या सपा ने कल्याण सिंह से हाथ मिलाकर अबतक की सबसे बड़ी राजनैतिक गलती की!
वहीं इन दिनों उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो की नींद भी उड़ी हुई है। उन्हें साफ दिख रहा है कि जिस दलित वोट के दम पर वो राजनैतिक जोड़तोड़ का हिसाब लगाती थीं, उसने उनको अंगूठा दिखा दिया है।
उत्तर प्रदेश में कुल 17 सुरक्षित सीटें हैं जिसको लेकर बसपा काफी उत्साहित रहती थी। लेकिन इस बार बसपा को 17 में से सिर्फ 2 सीटें ही मिल पाईं। आठ सीटें गईं मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के खाते में जोकि अप्रत्याशित है।
मतलब साफ है- बसपा के पैर के नीचे से जमीन सरक गई और अब उसे मालूम चला कि दलित वोटर की सोच बदल गई है। यानी अब उनके वोट पर किसी की बपौती नहीं चलेगी। चाहे वो हाथी ही क्यों न हो। मुसलमान वोटरों ने भी बसपा को झटका दिया और 14 उम्मीदवारों में से सिर्फ चार लोकसभा पहुंच पाए। ये हाल तब है जब माया सरकार ने मुसलमानों को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसकी आखिरी कड़ी थी वरुण पर भड़काऊ भाषण को लेकर रासुका तामील करना।
माया तिलमिलाई हैं और एक ही झटके में उन्होंने प्रदेश भर के कुल 150 निगमों, आयोगों, बोर्ड के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों को चलता कर दिया। उत्तर प्रदेश की राजनीति के इन दो सूरमाओं के पत्ते इस बार उलटे पड़े और हुआ वो जो किसी ने सोचा नहीं था। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए राहुल गांधी ने धुआंधार प्रचार किया और कल तक प्रदेश में अधमरी सी दिख रही कांग्रेस को पिछली बार के 9 के मुकाबले इस बार 12 ज्यादा यानी 21 सीटें मिलीं। इससे साफ हो गया है कि हर वर्ग का वोटर इस पुरानी पार्टी की ओर वापस आता दिख रहा है और ये मुलायम और माया दोनों के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं।








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