चांद और फ़िज़ा ने समाज के एक हिस्से को हिलाकर रख दिया है। ये वो तबका है जो या तो प्यार करता है या फिर प्यार और रिश्ते पर यक़ीन करता है। विश्वास और अविश्वास की बहस प्यार और सेक्स की बहस बन गई है। क्या फ़िज़ा और चांद के बीच सच में प्यार था? या फिर सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण और कुछ पल के आनंद को दोनों ने प्यार का नाम दिया?
सवाल में ही कई जवाब छिपे हैं। ज़्यादा दूर मत जाइए- याद कीजिए वो प्रेस कॉफ़्रेंस। कम से कम चार टीवी चैनल पर फ़िज़ा उर्फ़ अनुराधा बाली अपने 'पति' चंद्रमोहन उर्फ़ चांद मोहम्मद के एसएमएस 'लाइव' दिखा रही थी। ये वो एसएमएस थे जब दोनों का प्यार परवान चढ़ रहा था। एसएमएस में क्या था? यहां पर उसका ज़िक्र करना ज़रूरी नहीं है। लेकिन हर एसएमएस के खुलासे के साथ एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था कि क्या ये प्यार है? क्या फ़िज़ा और चांद के बीच कभी प्यार था।
फ़िज़ा और चांद की कहानी घर-घर में बड़ों के बीच सुनी-सुनाई जा रही है। अनुमान लगाए जा रहे हैं कि क्या हुआ होगा? किसने धोखा दिया होगा? कोई चांद की ग़लती मानता होगा तो कोई फ़िज़ा को ज़िम्मेदार ठहराता होगा। अंदर क्या हुआ कोई नहीं जानता लेकिन बाहर जो हो रहा है, उसे देखकर कोई भी कह सकता है कि ये प्यार नहीं था। साठ दिन के इस तमाशे में फ़िज़ा और चांद ने भले ही सब कुछ गवां दिया हो लेकिन इस समाज ने जो खोया है, वो है प्यार और रिश्तों पर से विश्वास। हम सब के जीवन में प्यार और रिश्ते से बड़ा क्या है? मन के अंदर से अगर सवाल पूछेंगे तो जवाब आएगा- कुछ नहीं। लेकिन प्यार के इन दो नए 'प्रतीकों' ने कहीं न कहीं ऐसे विश्वास को छलनी कर दिया है।
एक गीतकार हैं। किशन सरोज। उनकी सिर्फ़ दो पंक्तियां पढ़िए और समझ में आ जाता है कि प्यार क्या है? प्यार का मर्म क्या है? प्यार किसे कहते हैं? किशन सरोज जी लिखते हैं- कर दिए लो गंगा में प्रवाहित, सब तुम्हारे पत्र- सारे चित्र, तुम निश्चिंत रहना
कितनी बड़ी बात कह गए सरोज जी। प्रेमी-प्रेमिका के बीच संबंध टूट गए हैं और प्रेमी अपनी प्रेमिका को भरोसा दिला रहा है कि तुम निश्चिंत रहना। हमारा प्यार इतना पवित्र था कि मैंने तुम्हारे पत्र-चित्र सब गंगा में बहा दिए हैं। अब तुम ये सोचकर परेशान मत रहना कि तुम नहीं मिली तो मैं भविष्य में इन्हें तुम्हारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल करूंगा। कहां से कहां तक पहुंच गए हैं हम? एक प्रेमी पहले पत्र-चित्र गंगा में बहा देता है और दूसरा प्रेमी पुराने प्रेम एसएमएस टीवी कैमरों के सामने 'लाइव' दिखाता है और दावा भी होता है कि जब हमारे बीच प्यार था, ये तब के एसएमएस हैं।
सिर्फ़ एक सवाल- क्या प्यार भी किसी ख़ास वक़्त पर होता है? क्या प्यार में कोई ये कह सकता है कि मैं उसे कल प्यार करता था जी पर आज नहीं करता। क्या मोहब्बत किसी समय-सीमा की मोहताज हो सकती है? प्यार का सिर्फ़ एक ही फ़ार्मूला है- प्यार होता है या प्यार नहीं होता। अगर कोई ये कहे कि मैं उसे पहले प्यार करती थी, अब नहीं करती तो इसका मतलब साफ़ है कि वो तब भी प्यार नहीं करती थी। प्यार कोई आलू-टमाटर नहीं है कि कल थे जी और आज ख़त्म हो गए।
फ़िज़ा और चांद झूठ बोलते हैं अगर वो ये दावा करते हैं कि दोनों एक दूसरे से प्यार करते थे। प्यार में 'थे' शब्द हो ही नहीं सकता। अगर दो लोगों के बीच सच में प्यार रहा और रिश्ता नहीं बन पाया तो आपको कभी ये नहीं सुनने को मिलेगा कि ''हम बहुत प्यार करते थे लेकिन आगे नहीं बढ़ पाए''। बल्कि ये सुनाई देगा कि ''हमारा रिश्ता नहीं चला लेकिन प्यार हम आज भी करते हैं''। प्यार वो अहसास है जो एक-दो दिन या एक-दो साल के लिए हो ही नहीं सकता। प्यार है तो उसका सिर्फ़ एक लक्षण है- वो ताउम्र आपकी सांसों के साथ रहेगा।
फ़िज़ा के एसएमएस खुलासे की कहानी जब टीवी पर चल रही थी तब एक दोस्त का फ़ोन आया- ''यार! उसके मोबाइल पर मेरे भी बहुत सारे एसएमएस हैं। अभी तो सब ठीक है लेकिन कल बात बिगड़ गई तो कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं होगी''। उस दोस्त को बहुत समझाया कि कुछ नहीं होगा लेकिन हमारी बातचीत उस दोस्त के इस एलान के साथ ख़त्म हुई कि ''जब भी अगला मौक़ा मिलेगा, सबसे पहले मैं अपने एसएमएस डिलीट कर दूंगा''। ये सवाल अपने आप में अलग है कि 'डिलीट' एसएमएस होंगे या प्यार होगा?
चांद और फ़िज़ा ! आपने प्यार के लिए अपने-अपने धर्म बदले हों। आपने मोहब्बत के लिए अपनी बड़ी-बड़ी कुर्सियां छोड़ दी हों। आपने इश्क़ में परिवारों से नाता तोड़ लिया हो। आपने टीवी कैमरों पर 'लाइव' आई लव यू कहा हो। आपने बांहों में बांहे डाले खुलेआम रॉक गार्डन की सैर की हो। आपने भले ही ख़ून से दो सौ पन्नों का लैटर लिखने का दावा किया हो। लेकिन सच ये है कि आप में और लड़कियों के चेहरों पर ऐसिड डालने वाले 'गुंडे-प्रेमियों' में कोई फ़र्क नहीं है। चांद ने पांच दिन तक शराब के नशे में फ़िज़ा की ज़िंदगी मे ऐसिड डाला और फ़िज़ा ने एसएमएस का खुलासा करके चांद के जीवन में तेज़ाब घोल दिया। और इन दोनों की ही वजह से समाज पर अविश्वास का जो ऐसिड गिरा है वो लंबे अरसे तक प्यार के चेहरे को बदसूरत बनाकर रखेगा।
(लेखक पत्रकारिता जगत से एक लंबे समय से जुड़े हुए हैं और इस समय इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर हैं)














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