मनमोहन सिंह की जीत के बाद राजनैतिक पंडितों के अपने-अपने आंकलन होंगे। ये कांग्रेस सरकार के काम की जीत है। ये राहुल गांधी के करिश्मे का कमाल है। ये क्षेत्रीय दलों से जनता की विरक्ति है। और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन नतीजे आने के सिर्फ 12 घंटे बाद जो सबसे बेहतरीन आंकलन मैंने सुना, वह था एक आइसक्रीम वाले का- अरे साहब 'कचर-पचर' से मुक्ति मिल गई। चुनावी नतीजों की रात उस आइक्रीम वाले से यूं ही सवाल पूछ लिया था- क्या भाई! जानते हो अब इलेक्शन के बाद नया प्रधानमंत्री कौन होगा? एक सेकंड भी सोचे बिना उसका जवाब था- 'कचर-पचर' से आज़ादी मिल गई। जब उससे पूछा गया कि 'कचर-पचर' का मतलब? तो फिर दो टूक जवाब- अरे साहब, उन लोगों की छुट्टी हो गई जो बिना बात के चूं-चूं पीं-पीं करते रहते हैं।
कचर-पचर। ये हिन्दी का न कोई शब्द है। ना ही मुहावरा। लेकिन हिन्दीभाषी इलाकों में खूब इस्तेमाल होता है। जो पहली बार सुनता है वो भी समझ जाता है कि इसका मतलब क्या है? मनमोहन सिंह की सरकार पिछले पांच साल इसी कचर-पचर के साथ चली। यह बात एक आइसक्रीम बेचने वाला भी समझता है। इससे बड़ी बात हो ही नहीं सकती। सोचिए, कितना समझदार हो गया है इस देश का वोटर। उसने हर उस शख्स का गिरेबां पकड़कर संसद से बाहर कर दिया जो 'कचर-पचर' करता था। और मेरा दावा है कि ऐसा भारत के 62 साल के संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ है।
शुरुआत करते हैं लेफ्ट पार्टियों से। याद कीजिए। पांच साल इन पार्टियों ने क्या किया। सरकार को कितना रुलाया। नतीजा सिर्फ 25 सीटें। यह 25 सीटें पूरे लेफ्ट के लिए चुल्लूभर पानी मे डूबने से कम नहीं हैं क्योंकि 1984 में जब पूरे देश मे इंदिरा की हत्या के बाद राजीव गांधी के लिए लहर थी, तब भी लेफ्ट ने 28 सीटें बचा ली थीं। इतना बुरा हाल लेफ्ट का कभी नहीं हुआ। सोचिए लेफ्ट पार्टियों के इतिहास का सबसे शर्मनाक प्रदर्शन इस बार देखने को मिला। अब बात करते हैं किंग और किंगमेकर की। सिर्फ नाम ही काफी हैं- शरद पवार, मायावती, प्रकाश करात, जयललिता, लालू यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह, अमर सिंह, देवेगौड़ा, चंद्रबाबू नायडू। 15 मई की रात तक ये सभी किंग या किंगमेकर बनने वाले थे। लेकिन सिर्फ एक रात में ये सारे के सारे अगले पांच साल तक भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक हो गए हैं। यह सही है कि ये सभी पिछले 20 वर्षों में किसी न किसी वक्त किंगमेकर ज़रूर रहे हैं लेकिन इसी दौरान ये भूल गए कि किंगमेकर और ब्लैकमेलर के बीच महीन-सा फर्क क्या होता है? वोटर ने इस बार इस फर्क को समझ लिया और वो कर दिखाया जो पहले कभी नहीं हुआ। एक साथ सभी को 'फिक्स' कर डाला। कभी-कभी सोचने पर यकीन नहीं होता कि एक साथ दस बड़े कद्दावर नेताओं का जनता ने 'काम' लगा दिया। इनमें दो-तीन तो ऐसे थे जो प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे।
लालकृष्ण आडवाणी। बड़े नेता हैं। बहुत सम्मानित। लेकिन इस बार उन्होंने क्या किया? पूरा का पूरा चुनाव प्रचार मनमोहन को निकम्मा, कमज़ोर और नाकाम बताने में निकाल दिया। और यही दांव आडवाणी को उल्टा पड़ गया। देखिए बहुत सीधा-सा हिसाब है। एक भ्रष्ट, चालाक, शातिर आदमी को आप गाली देंगे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन एक सीधे, शरीफ़ इंसान को गाली पड़ेगी तो आज का वोटर शायद ही ये बर्दाश्त कर सकता है। मनमोहन सिंह भले ही सब कुछ दस जनपथ से पूछकर करते हों। सोनिया गांधी के सामने भले ही उनकी आवाज़ नहीं निकलती हो लेकिन इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि वो एक ईमानदार, विनम्र और काम करने वाले आदमी हैं। ऐसे प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले होंगे तो नतीजा क्या होगा। नतीजा ये है कि हार का पता चलने के 36 घंटे से भी ज्यादा वक्त तक आडवाणी सामने नहीं आए। ये पंक्तियां लिखे जाने तक आडवाणी घर में ही कैद थे। इस बार के वोट ने इतने बड़े नेता को राजनीति से ही नहीं, सामान्य जीवन से भी संन्यास लेने के लिए मजबूर कर दिया। सोचिए ऐसा इससे पहले कब हुआ?
एक और छोटी-सी मिसाल। यूपी के रामपुर में देखिए। क्या हुआ? जया प्रदा को रामपुर से नहीं जीतना था। जनता उनसे सच में नाराज़ थी कि जया प्रदा ने काम नहीं किया। वोटर ने उन्हें हराने का मन बना लिया था लेकिन जिस तरह से जया प्रदा का चरित्र हनन किया गया, जिस तरह से उनके अश्लील पोस्टर, सीडी बंटवाई गई- वोटर समझ गया कि जो लोग आज एक औरत की इज़्ज़त को हवा में उड़ा रहे हैं कल वो हमारा सम्मान भी बचाने नहीं आएंगे। नतीजा- जया प्रदा जीत गईं और आज़म ख़ान को समाजवादी पार्टी का महासचिव पद छोड़ना पड़ा। आप खुद सोचिए ऐसा पहले कब हुआ?
थोड़ी देर के लिए बिहार चलिए। बिहार में क्या हुआ। लालू, पासवान और राबड़ी को पिछले दो साल में नीतीश कुमार को भला-बुरा कहते ही सुना गया। इन चुनाव में सारी हदें पार हो गईं। गालियां और अपशब्द राबड़ी देवी जैसी गांव की महिला भी शालीनता की सीमा पार करने में पीछे नहीं रहीं। यहां तक कह दिया कि वो नीच प्रधानमंत्री तो छोड़िए मुख्यमंत्री बनने के लायक भी नहीं है। नतीजा देखिए- पासवान जी बिल्कुल साफ हो गए और लालू जी 24 से घटकर तीन तक पहुंच गए। ये हालत हो गई कि जिस कांग्रेस पर गरिया रहे थे, अब उसी की पूंछ किसी तरह पकड़े रहना चाहते हैं।
इन नतीजों को ऐतिहासिक कहने की एक और बहुत बड़ी वजह है। साधु यादव, पप्पू यादव, डीपी यादव, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, ददन पहलवान, अफजल अंसारी, मुन्ना शुक्ला और शहाबुद्दीन- ये नाम आपने खूब सुने होंगे। और सुनते ही ज़ेहन में आता है- बाहुबली और आपराधिक रिकॉर्ड। इस बार के चुनावों मे ये सभी या तो खुद चुनाव लड़े या इन्होंने अपनी पत्नी या मां को मैदान में उतारा। पत्नी या मां को चुनाव इसलिए लड़वाना पड़ा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया था। अब नतीजा देखिए। एक भी बाहुबली नहीं जीता। सोचिए इनमें से एक भी इस बार संसद में नहीं घुस सकेगा। यहां तक वोटर ने इनकी मां-बहन-पत्नी को भी नकार दिया। बिहार में बाहुबली शहाबुद्दीन, आनंद मोहन और सूरजभान ने अपनी पत्नियों को उतारा था। पप्पू यादव ने तो पत्नी के अलावा मां को भी चुनाव लड़वाया था लेकिन मतदाता ने मां से भी कह दिया- नहीं मां, अब आप भी नहीं। ये भी पहली बार हुआ है कि मतदाताओं ने सारे के सारे बाहुबलियों को एक साथ निपटा दिया। क्या ये ऐतिहासिक लम्हा नहीं है?
अब बड़ा सवाल। वोटर ने वोट आखिर दिया किसे? पूरे चुनाव के नतीजे खंगालकर देख लीजिए। इस बार वोट गया है काम को। जिसने काम किया उसे वोट मिला है, जिसने बदतमीजी की है, अहंकार दिखाया, वोटर का अपमान किया उसे वोट नहीं मिला। मनमोहन सिंह, नरेंद्र मोदी, वाईएस रेड्डी, शीला दीक्षित, शिवराज सिंह, रमन सिंह, नीतीश कुमार- हर किसी को वोट मिला। सोचने वाली बात है। केंद्र की सरकार के लिए चुनाव हो रहे हैं और कांग्रेस के पक्ष में हवा है। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, शिवराज सिंह और रमन सिंह को वोट मिले। इस देश के वोटर ने केंद्र सरकार के लिए लालकृष्ण आडवाणी और बीजेपी को सिरे से नकार दिया लेकिन काम करने वाले एनडीए के मुख्यमंत्रियों को हाथों-हाथ लिया। उत्तराखंड में बीसी खंडूरी ने काम नहीं किया। नतीजा बीजेपी 5-0 से साफ हो गई।
इस बार के जनादेश के ऐसे और भी बहुत सारे सच हैं। लेकिन सबसे बड़ा सच यही है कि पहली बार वोटर ने राजनीति की 'दुष्ट आत्माओं' का नाश किया है। ऐसी आत्मा जो काम नहीं होने देती, जो निराशा फैलाती है। ऐसी आत्मा जो बेलगाम है, बदज़ुबान है। ऐसी आत्मा जो खून ख़राबा करती है। ऐसी हर आत्मा, ऐसे हर जिन्न को इस बार वोटर ने पकड़कर बोतल में बंद कर दिया है और साथ ही कह दिया है- पांच साल से पहले बाहर निकले तो खैर नहीं। और बाहर भी सुधरकर नहीं आए तो हमेशा के लिए सर्वनाश कर दूंगा। दशहरा हर साल अक्टूबर में आता है लेकिन इस साल लगता है कि दशहरा मई में ही आ गया और रावण-वध 16 मई को हो गया। बुराई पर अच्छाई की इतनी बड़ी जीत चुनावों में पहली बार देखने को मिली है। इतना सही इंसाफ़ पहले कभी नहीं हुआ। कांग्रेस हो या बीजेपी, समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाज पार्टी, साधु हो या फकीर- वोटर ने सबको एक ही तराजू में तौला है। यूपीए, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि पांच साल तक विनम्रता से- ईमानदारी से सरकार नहीं चलाई तो अगली बार वह इनको भी बोतल में बंद कर देगा क्योंकि इस देश का वोटर सही मायने में जाग गया है।
इस जनादेश को हर किसी को अमृत मानकर पी जाना चाहिए। यहां तक कि लालकृष्ण आडवाणी को भी और मायावती को भी। क्योंकि समुद्र-मंथन अब हर चुनाव में होगा। आपके काम का और आपकी ज़ुबान का हिसाब हर बार मांगा जाएगा। इस बार के विष को जिसने अमृत समझकर नहीं पीया उसे अगली बार भी ज़हर ही मिलेगा। वोटर का आखिरी कमाल देखिए। बीजेपी पूरे चुनाव में आडवाणी के पोस्टर चिपकाकर चीखती रही- मज़बूत नेता, निर्णायक सरकार। वोटर ने उसी पोस्टर पर कांग्रेस के मनमोहन सिंह को पांच साल के लिए चिपका दिया। ऐसे वोटर की जय हो!






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