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विनोद कापड़ी
Wednesday, December 16, 2009 at 11 : 01

अखंड भारत की खंड तस्वीर


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जो 40 साल में नहीं हुआ, वह चार घंटे में हो गया। तेलंगाना अलग राज्य बनेगा। आंध्र प्रदेश विधान सभा को प्रस्ताव लाने के लिए कहा गया है। इतना दम ठोक कर तेलंगाना बनाने की बात आज तक किसी सरकार ने नहीं की। उस वक़्त भी नहीं जब 1969 में पहली बार तेलंगाना राज्य के लिए आंदोलन ने इतना ज़ोर पकड़ा कि 350 से ज़्यादा लोगों को अलग राज्य का सपना देखते हुए हुए जान देनी पड़ी। लेकिन 9 दिसम्बर 2009 को शाम 7 बजे से रात 11 बजे के बीच सिर्फ़ चार घंटे में ऐसा क्या हुआ कि रात 11.30 बजे गृह मंत्री चिदम्बरम को कहना पड़ा कि तेलंगाना राज्य बनेगा। 9 दिसम्बर को कांग्रेस कोर कमेटी की उन तीन बैठकों में आखिर क्या हुआ कि आज़ाद भारत के इतिहास के सबसे विवादित बंटवारे के बीज ने जन्म ले लिया है। विवादित बंटवारा इसलिए कहना सटीक है क्योंकि आने वाले वक़्त में तेलंगाना पर जो तनाव होने वाला है, उसकी कल्पना न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की होगी और न ही उन्हें सलाह देने वाली कांग्रेस कोर कमेटी के नेताओं ने।

सिर्फ़ चार घंटों में सरकार ने जो 'ऐतिहासिक' फ़ैसला किया है उसके नतीजे दूरगामी नहीं, भयानक होने वाले हैं। के. चंद्रशेखर राव की एक ब्लैकमेलिंग और देश एक झटके में 56 साल पीछे चला गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शायद भूल गए कि 1953 में क्या हुआ था। तब भी एक भीषण भूल हुई थी, जिसे अंग्रेज़ी में 'ब्लंडर' कहते हैं। पहली बार भाषा के आधार पर अलग राज्य आंध्र प्रदेश बनाने के लिए आंदोलन शुरू हुआ। मद्रास में पोट्टि श्रीरामुलू की भूख हड़ताल। जैसी भूख हड़ताल पर के. चंद्रशेखर राव बैठे थे। तब प्रधानमंत्री थे जवाहरलाल नेहरू और 58 दिन की भूख हड़ताल के बाद पोट्टि श्रीरामुलू की मौत हो गई। आख़िरकार सरकार को झुकना पड़ा। मद्रास राज्य से 1953 में आंध्र प्रदेश को अलग कर दिया गया। भाषा के आधार पर पहला राज्य बना आंध्र प्रदेश। इसके बाद तो राज्यों की मांगों की बाढ़-सी आ गई। मराठी, मलयाली और कन्नड़भाषी इलाक़ों में भी अलग राज्य के लिए आंदोलन शुरू हो गए। नतीजा ये हुआ कि राज्य पुनर्गठन आयोग बना और पहली बार माना गया कि भाषा के आधार पर राज्यों का बंटवारा किया जा सकता है।

1953 में आंध्र प्रदेश के बनने और 2009 में तेलंगाना की घोषणा को आख़िर क्यों जोड़कर देखा जाना चाहिए? यही आज सबसे बड़ा सवाल है। कोई भी यह कह सकता है कि तेलंगाना के बंटवारे का आधार भाषा नहीं है। फिर परेशान होने वाली बात ही क्या है? परेशान होने वाली बात सिर्फ़ इतनी है कि जिस तरह आंध्र प्रदेश के गठन के बाद भाषा के आधार पर एक-एक करके गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, पंजाब और कर्नाटक बन गए उसी तरह डर यह है कि तेलंगाना बनने के बाद गोरखालैंड, पूर्वांचल, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, विदर्भ, रायलसीमा कतार में खड़े हैं। तेलंगाना के बाद इन लोगों को भी गुरुमंत्र मिल गया है कि 10-11 दिन की भूख हड़ताल पर एक राज्य ले जाओ। यही वजह है कि तेलंगाना का फ़ैसला आने के 24 घंटे के अंदर गोरखालैंड के नेताओं ने आमरण अनशन की घोषणा कर दी। सरकार की आलोचना करने वाले मज़ाक में यह भी कहने लगे हैं कि 10-11 दिन की भूख हड़ताल पर राज्य और 20-22 दिन के आमरण अनशन पर आधा देश ले लो।

तेलंगाना का यह फ़ैसला मज़ाक न बन जाए। तेलंगाना का यह फ़ैसला ग़ैर-ज़रूरी मांगों के लिए भी मिसाल न बन जाए। यही सबसे बड़ा डर इस वक़्त है। अलग राज्य की मांग करने वाले या अलग राज्य का सपना देखने वाले जितने नेता 2001 के बाद से सोए हुए थे, वे सब के सब अचानक जाग गए हैं। जसवंत सिंह गोरखालैंड की मांग कर रहे हैं। अजित सिंह ने फिर से हरित प्रदेश का राग अलापा है। मायावती ने तो उत्तर प्रदेश के तीन टुकड़े करने के लिए प्रधानमंत्री को ख़त भी लिख दिया है। तेलंगाना पर घोषणा होने के 48 घंटे के अंदर 9 नए राज्यों की मांग। सरकार इन राज्यों की मांग पर अब क्या बोलेगी? प्रधानमंत्री इन नेताओं को क्या जवाब देंगे? वे इन नेताओं को कैसे समझाएंगे कि देखिए तेलंगाना की मांग जायज़ थी लेकिन आपकी नहीं।

कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब सरकार के पास इस वक़्त बिल्कुल भी नहीं हैं और कुछ मुद्दे ऐसे भी हैं जिनके बारे में फ़ैसला लेने से पहले बिल्कुल सोचा नहीं गया। यही वजह है कि आंध्र प्रदेश की सभी पार्टियां भले ही अलग तेलंगाना के पक्ष में हों लेकिन इन पार्टियों के सांसदों और विधायकों ने साफ़ कर दिया है कि वे आंध्र प्रदेश को टूटने नहीं देंगे। सत्तारूढ़ यूपीए के ही घोषणापत्र में देखें तो उसमें तेलंगाना राज्य के बारे में साफ़ लिखा है कि सभी पक्षों से सलाह-मशविरा करके और आम सहमति बनाकर ही नए राज्य को बनाया जाएगा। लेकिन कोर कमेटी की बैठक को ही अगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आम सहमति मान लिया है तो इसकी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी।

कोर कमेटी में कांग्रेस के सभी बड़े नेता थे। प्रणब मुखर्जी, ए.के.एंटोनी, पी.चिदम्बरम, अहमद पटेल, वीरप्पा मोइली। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी। फ़ैसला सुनाने से दो घंटे पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के. रोसैया को भी प्रधानमंत्री निवास पर बुलाया गया। क्या इतने दिग्गजों में से किसी को भी यह समझ नहीं आया कि एक चंद्रशेखर राव को चुप करने के लिए सरकार दस चंद्रशेखर राव को मुंह खोलने का मौक़ा दे रही है?

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकट अपनी ही पार्टी से खड़ा हो सकता है। यह बहुत ही हैरान करने वाली बात है कि कांग्रेस ने इस संकट का अंदाज़ा क्यों नहीं लगाया? आंध्र प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के 156 सदस्य हैं, जिसमें से 106 विधायक रायलसीमा और तटीय आंध्र से आते हैं। ये आंध्र प्रदेश के वे इलाक़े हैं जो तेलंगाना को राज्य से अलग नहीं होने देना चाहते। ऐसे में कांग्रेस कैसे आंध्र प्रदेश विधानसभा में तेलंगाना राज्य के लिए प्रस्ताव पारित करवा पाएगी? हालांकि कांग्रेस के इन्हीं विधायकों ने सोनिया गांधी को तेलंगाना पर कोई भी फ़ैसला लेने के लिए अधिकृत कर दिया था। लेकिन जब चंद्रशेखर राव की ब्लैकमेलिंग के सामने केंद्र सरकार को झुकते देखा तो इन विधायकों के होश उड़ गए। अब तो सवाल सबसे बड़ा यही है कि कांग्रेस पार्टी विधानसभा में प्रस्ताव ला भी पाएगी या नहीं? प्रस्ताव पास करने के लिए अपने ही विधायकों से ज़ोर-जबर्दस्ती कितनी महंगी पड़ेगी उसका अंदाजा कोई नासमझ भी लगा सकता है। यहां यह याद दिलाना भी जरूरी है कि वाई.एस.आर के सुपुत्र जगमोहन इस सबसे बीच चुप तो बिल्कुल नहीं बैठे होंगे।

दूसरा बड़ा संकट है हैदराबाद का। हैदराबाद कहां जाएगा? तेलंगाना में या आंध्रप्रदेश में? भौगोलिक दृष्टि से देखें तो हैदराबाद तेलंगाना में आता है। उसे तेलंगाना में ही होना चाहिए। लेकिन एक शहर जितना दुनिया में नाम है, एक शहर जिसे आंध्र-प्रदेश ने पाल पोस कर बड़ा किया, एक शहर जो सिर्फ शहर नहीं पूरे आंध्र-प्रदेश का चेहरा है ऐसा शहर आसानी से तेलंगाना को मिल जायेगा यह भी एक सपना ही है। कितना अजीब संयोग है कि जिस पोट्टि श्रीरामुलू ने आंध्र प्रदेश के लिए मद्रास में रहकर 58 दिन तक भूख हड़ताल करते हुए जान दे दी, उन्हें आख़िरकार आंध्र प्रदेश तो मिला लेकिन मद्रास नहीं मिला। उसी तरह जिस चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना के लिए हैदराबाद में रहकर 11 दिन तक आमरण अनशन किया उन्हें भी शायद तेलंगाना मिल जाए लेकिन हैदराबाद से हाथ धोना पड़ेगा। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि आम सहमति बनीं नहीं और फ़ैसला ले लिया गया।

वैसे बात अब भी बहुत बिगड़ी नहीं है। अब तक जो हुआ, सरकार उसे भूल जाए और नए सिरे से राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने की घोषणा करे। इस देश में नए राज्य बनाने पर किसी को भी विरोध नहीं होना चाहिए। छोटे राज्यों से देश छोटा नहीं होगा। आज हमारे पास 28 राज्य हैं। यह बढ़कर 50 भी हो जायें तो देश की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बल्कि एक आम हिंदूस्तानी को सुविधा ही होगी क्योंकि हमारे कई राज्य इतने-इतने विशाल हैं कि एक महाराष्ट्र में यूरोप के 17 देश आ सकते हैं। एक यूपी में यूरोप के 15 देश समा सकते हैं। सवाल सिर्फ इन राज्यों के बंटवारे के तरीके पर है। इसलिए राज्य पुनर्गठन आयोग की सख्त जरूरत है। 1956 में बने राज्य पुनर्गठन आयोग ने भाषा के आधार पर जो समाधान दिया था वह कम से कम सबको स्वीकार्य तो था। अब जो नया राज्य पुनर्गठन आयोग बने- वह लोगों की अपेक्षाओं, ज़रूरतों और क्षेत्रीय संतुलन को ईमानदारी से समझते हुए अपनी सिफ़ारिशें देगा तो फिर चंद्रशेखर राव, जसवंत सिंह, अजित सिंह और मायावती सरीखे राजनेताओं को बंटवारे के तवे में अपनी रोटी सेंकने का मौक़ा नहीं मिलेगा। एक महान भारत के छोटे-छोटे टुकड़े करने से पहले सरकार को यह छोटा क़दम तो तुरंत उठा लेना चाहिए। जितनी जल्दी चंद्रशेखर राव के लिए दिखाई, उतनी जल्दी भारत के लिए भी नज़र आएगी तो इस देश की आत्मा कम से कम रोएगी नहीं।

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