करुणानिधी को नौ मंत्रालय चाहिये। मलाईदार मंत्रालय चाहिये। परिवारवालों के लिये मंत्रालय चाहिये। बालू और राजा जैसे पुराने चाटुकारों के लिये मंत्रालय चाहिये। सत्ता का केन्द्र अपने आस पास रहे ताकि उसका मन मुताबिक इस्तेमाल किया जा सके। मलाई काटी जा सके। कांग्रेस ने कुछ मांगे नहीं मानीं तो चेन्नई सुपर किंग करुणानिधी दिल्ली छोड़ गये ये धमकी देकर कि अब यूपीए को बाहर से ही समर्थन देंगे।
फारूख अब्दुल्ला को जब मनमोहन मंत्रीमंडल में अपनी खिचड़ी पकती नहीं दिखी तो वो साउथ अफ्रीका चले गये ये कह कर कि आईपीएल फाइनल का टिकट वो पहले ही बुक कर चुके थे। नतीजा ये रहा कि मनमोहन ने कुछ कैबिनेट साथियों के साथ ही मंत्रीमंडल की शपथ ले ली। अब मंत्रिमंडल विस्तार तब होगा जब रूठों को मना लिया जायेगा।
पहले परिवारवाद के नाम पर कांग्रेस को खूब कोसा जाता था। परिवारवाद के वायरस से अब कोई पार्टी अछूती नहीं रही। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने बेटे को टिकट दिलवाया। जसवंत सिंह बाड़मेर सीट बेटे मानवेंद्र को सौंप कर खुद दूर दार्जिलिंग की पहाड़ियों में गुरखाओं की नुमाइंदगी करने पहुंच गये। पिता प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री तो बेटे अनुराग को संसद पहुंचा के ही दम लिया। आडवाणी प्रधानमंत्री बनते तो परिवार के ये सभी वारिस मंत्री बनने की कतार में जरूर होते।
शरद पवार बेटी सुप्रिया सुले को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपना चाहते हैं। पवार 8 की जगह 12-14 सीटें जीत कर लाते तो मनमोहन सिंह से सुप्रिया के लिये भी मंत्रीमंडल में जगह मांगते। फिलहाल तो 2 बर्थ से ही काम चलाना पड़ रहा। पूर्णो सांगमा बेटी अगाथा को कैबिनेट बर्थ दिलवाने में जी जान से जुटे हैं।
मुलायम यूपीए में रह कर लड़ते तो इस बार बेटे श्री अखिलेश को भी केन्द्र सरकार में मंत्री बनवाते। भाई, बेटा और भतीजा तीनो दोनो सांसद तो हैं ही। पासवान हार गये मगर बेटे को तैयार कर रहे हैं। हाजीपुर में पासवान कम उनका लंबी जुल्फो वाला बेटा जरूर वोटरों से रू-ब-रू होता दिखा। लालू पत्नी राबड़ी को मुख्यमंत्री बना चुके हैं, साले को सांसद। अभी ये नहीं समझ पा रहे कि बेटे तेजस्वी को राजनीति में लायें या उसे क्रिकेट ही खेलने दें। आखिर वहां भी तो मलाई है, आईपीएल है।
संविधान के रचनाकारों ने शायद इसकी कल्पना नहीं की थी कि देश के चुने हुये नुमाइंदे लोगों की नुमाइंदगी कम अपने परिवार के हितों की नुमाइंदगी ज्यादा करेंगे। इसकी कल्पना की होती तो क्या संविधान में परिवारवाद या वंशवाद को बढ़ाने की शर्तें रखी गयी होती? ये शर्ते पूरी होने पर ही कोई सांसद या मंत्री अपने बेटे, बहू, पत्नी, भाई, बेटी, दामाद, पोता, पोती को चुनाव लड़वा सकता या मंत्री बना सकता।
लेकिन ऐसा होता भी तो संविधान संशोधन के जरिये वो शर्तें किसी न किसी सरकार ने अब तक जरूर हटा दी होती। भारतीय संविधान में 94 संशोधन हो चुके है, परिवारवाद के नाम पर एक और हो जाता।
संविधान में तो \'काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स\' का जिक्र है, मलाईदार मंत्रालयो या मंत्रियों का नहीं। तो क्या जनता नेताओं को मलाई खाने के लिये चुन कर संसद भेजती है। मुंबई के सैलाब में सैंकड़ो बह गये, हजारो बेघर हो गये मगर कोई तो था जो मुंबई को शंघाई बनाने के नाम पर करोड़ों की मलाई डकार के मस्त था। हजारों किसानों ने कर्ज के बोझ के तले आत्महत्या कर ली। कोई तो होगा जो किसानों के विकास का नारा देकर अपने निजी जमीन को मलाई से सींच रहा होगा। कोई किसानों की जमीन का मुनासिब दाम लगाये बिना SEZ की मलाई खा रहा। फ्लाइओवर के नाम पर घटिया डिजाइन तैयार हुयी। उसी फ्लाइओवर पर रोज किसी न किसी चालक की मौत हो रही। लेकिन कोई तो होगा जो मलाई और मलाईचाप दोनों गड़प कर चैन की नींद ले रहा है।
हिंदुस्ताना में राजा वो नहीं जो वोट डालता है। राजा वो है जो चुनाव जीतता है। जीतने के बाद अपने परिवार के हितों की रक्षा करना ही उसका सबसे बड़ा धर्म होता है। उस परिवार के लिये ज्यादा से ज्यादा मलाई बटोरना ही उसका धर्म है। डीएमके भी इस धर्म से डिगना नहीं चाहता। छोटे बेटे स्टालिन को चेन्नई की गद्दी के लिये तैयार कर ही चुके हैं। अब परिवार के दूसरे सदस्यों के लिये केन्द्र में मंत्रालय की सौदेबाजी कर रहे। परिवारवाद की यही है चरम सुखद परिणीति।
राहुल गांधी को फिलहाल मंत्रालय की दरकार नहीं। लेकिन उन्हें इस बात का इत्मीनान जरूर होगा कि मनमोहन के बाद पार्टी उन्हे ही प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुनेगी। पार्टी में राहुल ब्रिगेड की चलती तो मनमोहन की जगह राहुल का राजतिलक कर देते। अब जब राहुल सांसद हैं तो प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते। और वो नहीं बनेंगे तो डाइनेस्टी कैसे चलेगी। यही सवाल तो करुणानिधी भी पूछ रहे। कांग्रेस को इस पर कोई ऐतराज नहीं होना चाहिये। क्योंकि हमाम में सब नंगे हैं।








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